धातुओं में विस्थापन अभिक्रियाएँ:
हम जानते हैं कि एक धातु दूसरी धातु को उसके यौगिक के जलीय विलयन से विस्थापित करती है किन्तु यह क्रिया सामान्य नहीं है। इसमें अधिक अभिक्रियाशील धातु कम अभिक्रियाशील धातु को प्रतिस्थापित कर सकती है किन्तु कम अभिक्रियाशील धातु अधिक अभिक्रियाशील धातु को प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। इसे हम अग्र प्रकार समझ सकते हैं।
100 मिली. के पाँच बीकर लेकर उन्हें A, B, C, D और E द्वारा चिन्हित कर लेते हैं। प्रत्येक बीकर में लगभग 50 ml जल लेते हैं। बीकर A में एक चम्मच कॉपर सल्फेट तथा जिंक का टुकड़ा; बीकर B में कॉपर सल्फेट तथा लोहे की कील; बीकर C में जिंक सल्फेट + ताँबे की छीलन; बीकर D में आयरन सल्फेट + ताँबे की छीलन तथा बीकर E में जिंक सल्फेट तथा लोहे की कील डालकर इन्हें चम्मच से घोलकर कुछ समय के लिए रख देते हैं। अवलोकन करने पर हम देखते हैं कि बीकर A में जिंक, कॉपर सल्फेट विलयन से कॉपर को विस्थापित करता है। इसी कारण कॉपर सल्फेट का नीला रंग अंदृश्य हो जाता है तथा बीकर के पैंदे पर कॉपर का लाल चूर्ण जमा हो जाता है। इसी प्रकार बीकर ' B ' में भी कॉपर सल्फेट का नीला रंग अदृश्य हो जाता है। इनकी क्रियाएँ निम्न प्रकार होती हैं
CuSO4 + Zn → ZnSO4 + Cu (लाल)
CuSO4 + Fe → FeSO4 + Cu (लाल)

किन्तु बीकर C, D व E में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता है। बीकर C में Cu जिंक सल्फेट से जिंक को प्रतिस्थापित करने में सक्षम नहीं है जबकि जिंक कॉपर को प्रतिस्थापित कर देता है। इसका कारण यह है कि जिंक कॉपर व आयरन से अधिक अभिक्रियाशील है। एक अधिक अभिक्रियाशील धातु कम अभिक्रियाशील धातु को प्रतिस्थापित कर सकती है किन्तु कम अभिक्रियाशील धातु अधिक अभिक्रियाशील धातु को विस्थापित नहीं कर सकती है। यही कारण हैं कि बीक व D , E में भी विस्थापन अभिक्रियाएँ संपन्न नहीं हुईं।