सन् 1791 ई. में नेशनल एसेम्बली ने संविधान का प्रारूप तैयार किया। इसमें शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त को अपनाया गया। यद्यपि लुई सोलहवाँ ने इस सिद्धान्त को मान लिया, परन्तु मिराव्या की मृत्यु के बाद देश में हिंसात्मक विद्रोह की शुरुआत हो गयी। इसमें समानता के सिद्धान्त की अवहेलना की गई बहुसंख्यकों को मतदान से वंचित रखा गया था सिर्फ धनी लोगों को ही यह अधिकार दिया गया । इस तरह बुर्जुआ वर्ग का प्रभाव बढ़ा इस बढ़ते असंतोष की अभिव्यक्ति नागरिक राजनीतिक क्लबों में जमा होकर करते थे। इन लोगों ने अपना एक दल बनाया जो ‘जैकोबिन दल’ कहलाया इन लोगों ने अपने मिलने का स्थान पेरिस के ‘कॉन्वेंट ऑफ सेंट जेक्ब’ को बनाया । यह आगे चलकर ‘जैकोबिन क्लब’ के नाम से जाना जाने लगा। इस क्लब के सदस्य थे-छोटे दुकानदार, कारीगर, मजदूर आदि । इसका नेता मैक्स मिलियन रॉब्सपियर था। इसने 1792 ई. में खाद्यानों की कमी एवं महंगाई को मुद्दा बनाकर जगह-जगह विद्रोह करवाए ।
जैकोबिन के कार्य-रॉब्सपियर वामपंथी विचारधारा का समर्थक था। इसने आंतक का राज्य स्थापित किया चौदह महीने में लगभग 17 हजार व्यक्तियों पर मुकदमे चलाये गए और उनहें फाँसी दे दी गई।
प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का पोषक रॉब्सपियर प्रजातंत्र का पोषक था । 21 वर्ष से अधिक उम्र वालों को मतदान का अधिकार देकर, चाहे उनके पास सम्पत्ति हो या न हो, चुनाव कराया गया । 21 सितम्बर, 1792 ई. को नव निर्वाचित एसेम्बली को कन्वेंशन नाम दिया गया तथा राजा की सत्ता को समाप्त कर दिया गया । देशद्रोह के अपराध में लुई सोलहवाँ पर मुकदमा चलाया गया और 21 जनवरी, 1793 ई. को उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया।
रॉब्सपियर का अंत-रॉब्सपियर का आतंक राज्य 1793 ई. तक उत्कर्ष पर था । राष्ट्र का कलेन्डर 22 सितम्बर, 1792 को लागू किया गया । इन सभी को रॉब्सपीयर ने सर्वोच्च सता की प्रतिष्ठा के रूप में स्थापित किया लेकिन सभी अस्थाई सिद्ध हुए । उनकी हिंसात्मक कार्रवाइयों की वजह से विशेष न्यायालय ने जुलाई 27, 1794 को उसे मृत्यु दंड दिया गया । इस तरह ‘जैकोबिन का फ्रांस की क्रान्ति पर प्रभाव देखने को मिलता है।