Question
हृद चक्र तथा हृद निकास को परिभाषित करें।

Answer

हृद चक्र (Cardiac Cycle) - हृदय के एक स्पन्दन प्रारम्भ होने से लेकर अगले स्पन्दन के प्रारम्भ होने तक हृदय के विभिन्न भागों में होने वाले परिवर्तनों के क्रम को हृद चक्र कहते हैं। इस प्रकार हृद के एक स्पन्दन पूर्ण होने के समय हृदय में होने वाली घटनाओं को हृद चक्र कहा जाता है। सामान्य हृदय चक्र पूर्ण होने में 0.8 सेकण्ड लगते हैं। एक चक्र में दो प्रावस्थाएँ होती हैं। विश्रान्ति की प्रावस्था को अनुशिथिलन (Diastole) कहते हैं तथा संकुचन की प्रावस्था को प्रकुंचन (Systole) कहते हैं। हृदय स्पन्दन के पूरे चक्र में दोनों आलिन्दों एवं दोनों निलयों का संकुचन एवं विश्रान्ति सम्मिलित होते हैं। हृद चक्र की प्रमुख घटनाएँ हैं- महाधमनियों, निलयों एवं आलिन्दों के दाब में परिवर्तन, निलयों के आयतन में परिवर्तन, विभिन्न कपाटों का बन्द होना एवं खुलना तथा हृदय के कक्षों का भरना एवं रिक्त होना। हृद चक्र के समय इसके कक्षों में भरने वाले रुधिर को निश्चित दिशा में पम्प किया जाता है।
हृद निकास/कार्डियक आउटपुट (Cardiac Output) - हृदय के बायें निलय से प्रति मिनट निकलने वाले रक्त की मात्रा को हृदय निकास अथवा कार्डियक आउटपुट कहते हैं।
कार्डियक आउटपुट = धड़कनों की संख्या प्रति मिनट x स्ट्रोक आयतन
बायें निलय से प्रति सिस्टोल निकलने वाले रक्त को स्ट्रोक आयतन (Stroke Volume) कहते हैं जो 70 मिली. होता है।
कार्डियक आउटपुट = 72 × 70 5040 प्रति मिनट
= 5 लीटर प्रति मिनट
कार्डियक आउटपुट में से 10% रक्त हृदय पेशियों को, 15% रक्त मस्तिष्क को, 20% रक्त वृक्कों को, 25% पाचन तन्त्र को तथा 30% रक्त शरीर के दूसरे अंगों को जाता है।

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