Question
जैविक खाद तथा उर्वरकों में भेद स्पष्ट कीजिए।

Answer

No.जैविक या कार्बनिक खादउर्वरक
1.ये पेड़-पौधों व जन्तुओं के भागों तथा अवशेष पदार्थों को सड़ाकर बनाये जाते हैं।ये अनेक रासायनिक क्रियाओं द्वारा तत्वों अथवा खखनिज पदार्थों से कारखानों में तैयार किए जाते हैं।
2.इनमें पौधों के सभी आवश्यक तत्व उपस्थित रहते हैं, परन्तु पोषक तत्वों की मात्रा सघन नहीं होती।इनमें पोषक तत्वों की मात्रा काफी सघन होती है, परन्तु इनमें एक या दो आवश्यक पोषक तत्व ही मिलते हैं।
3.पौधों को पोषक तत्वों की प्राप्यता धीरे-धीरे होती रहती है। इनका प्रभाव प्रायः 1-2 वर्ष तक बना रहता है।इनके पोषक तत्व पौधों को लगभग एक सप्ताह में ही प्राप्त होनेलगते हैं और इनका प्रभाव मृदा में अधिक समय तक नहीं रह पाता।
4.इन खादों को फसल की बुवाई से काफी पहले प्रयोग करना पड़ता है, क्योंकि इनके प्रयोग करने के काफी समय पश्चात्, जब ये सड़ जाते हैं तब पौधों को प्राप्त होते हैं।इनमें सभी तत्व विलेय अवस्था में तथा शीघ्र पौधों को उपलब्ध होते हैं। अतः इनका प्रयोग फसल की बुवाई के समय अथवा खड़ी फसल में किया जाता है।
5. इनसे मृदा की जल धारण क्षमता बढ़ जाती है।इनके प्रयोग से मृदा जल की धारणा क्षमता नहीं बढ़ती।
6.इनके प्रयोग से मृदा का वायु संचार सुधरता है।उर्वरकों का मृदा वायु संचार पर कोई प्रभाव नहीं होता।
7.इनसे सभी आवश्यक तत्व प्राप्त होने के कारण पौधों की सन्तुलित वृद्धि होती है।उर्वरकों के प्रयोग से पौधों की संतुलित वृद्धि नहीं होती, क्योंकि इनसे सभी तत्व पौधों को प्राप्त नहीं होते
8.इसके प्रयोग से मृदा में कार्बन नाइट्रोजन अनुपात सन्तुलित रहता है तथा मृदा ताप पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।यह अनुपात संतुलित नहीं रहता है तथा मृदा ताप पर प्रभाव नहीं पड़ता।
9.इनके प्रयोग से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाने से उसके अपरदन में कमी हो जाती है।इनसे मृदा अपरदन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
10.अत्यधिक मात्रा में भी प्रयोग करने से मृदा पर हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है।अधिक मात्रा में प्रयोग करने से फसल तथा मृदा दोनों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
11.खादों के प्रयोग से मृदा में उपस्थित अविलेय तत्व विलेय रूप में परिवर्तित हो जाते हैं, क्योंकि कार्बनिक पदार्थों के सड़ने से कार्बनिक अम्ल बनते हैं।इनमें ऐसा नहीं होता है।
12.इनके प्रयोग से फसलों की जल माँग घटती है तथा मृदा की प्रत्यारोधन क्षमता बढ़ जाती है।इनके प्रयोग से फसलों की जल माँग बढ़ती है तथा मृदा की प्रत्यारोधन क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

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