‘शिक्षा’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘शिक्ष्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है – सिखना। मनुष्य जन्म से मृत्यु पर्यंत कुछन-कुछ सीखता रहता है। यह प्रक्रिया विश्वव्यापी है। दुनिया में कहीं भी जाएँ शिक्षा का महत्त्व सर्वोपरि है। कहा जाता है कि शिक्षा ही ऐसी वस्तु है; जिसे न तो चोर चुरा सकता है, न ही यह किसी को बाँटी जा सकती है, न ही राजा द्वारा छीनी जा सकती है और न ही भार लगने वाली है। इसे जितना खर्च किया जाए, उतनी ही बढ़ती है। इसके द्वारा दुनिया में प्रत्येक स्थान पर सम्मान प्राप्त किया जा सकता है। कहा गया है “स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान सर्वत्र पूज्यते।”