महाकवि भास रचित नाटक 'कर्णभार' नामक रूपक का नाटयांश 'कर्णस्य दानवीरता' पाठ में वर्णित है। महाभारत में कौरव-पांडवों की लड़ाई में पांडवों की विजय सुनिश्चित तभी हो सकती थी जब कर्ण की मृत्यु हो, जो उसकेशरीरस्थ कवच-कुंडल के रहते सम्भव नहीं थी। देवराज इंद्र ब्राह्मण याचक का वेश बनाकर सूर्योपासना के समय कर्ण के पास जाते हैं। कर्ण अनेक प्रस्ताव देता है, परन्तु शक्र इंकार कर देते हैं और जैसे ही वह कवच-कुंडल देने की बात कहता है तो वह तुरन्त तैयार हो जाते हैं। तब कर्ण की घोषणा होती है कि दान की महिमा अपरम्पार है। समय के साथ प्रदत्त शिक्षा नष्ट हो जाती है, बड़े-बड़े वृक्ष उखड़कर समाप्त हो जाते हैं, जलाशय सूख जाते हैं परन्तु दिया गया दान सदैव स्थिर रहता है। स्पष्ट है कि कर्ण ने 'दानवीर' होने की संज्ञा को सही साबित कर दिया।