कुक्कुट आवास की प्रणालियाँ
कुक्कुट आवास की चार प्रमुख प्रणालियाँ हैं जिनका संक्षिप्त विवेचन निम्न प्रकार है-
(1) घर के पीछे मुर्गीपालन- (Back yard System)- हमारे देश में गरीब व्यक्ति आमतौर पर अपने परिवार के व्यक्तियों के अण्डों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए 5-7 मुर्गियाँ घर के पीछे पाल लेते हैं। घर में बची खाद्य सामग्री इन मुर्गियों को खिला दी जाती है तथा इनके लिए आस-पास उपलब्ध सामग्री का प्रयोग करके सस्ते घर बना दिये जाते हैं।
(2) विस्तृत प्रणाली- (Extensive System)-इसे भू-प्रधान रीति भी कहा जाता है। इस प्रणाली से मुर्गीपालन करने में खुला चारण क्षेत्र होता है जहाँ पक्षी बिना नियंत्रण घास के मैदानों में घूमते रहते हैं। मुर्गीपालक सड़कों तथा खतरे वाले स्थानों पर तार की जाली लगा कर उसे सुरक्षित बना देते हैं। इसी क्षेत्र में एक रैन बसेरा (मुर्गीघर) जमीन से थोड़ा ऊपर उठा हुआ, बाँस या लकड़ियों के फर्श वाला बना दिया जाता है। इसमें केवल रात्रि विश्राम के लिए ही पक्षी बैठता है अतः प्रति पक्षी एक वर्ग फुट स्थान ही दिया जाता है। इस प्रणाली से एक हेक्टेयर में 125 पक्षी, लेकिन अनुकूल मौसम में 250 तक पक्षी पाले जा सकते हैं।
मुर्गीपालक को दाना, पानी रैन बसेरे के पास ही रख देने चाहिए। अण्डे देने हेतु अलग से घोंसले बना देने चाहिए, जिन्हें रात्रि को सुरक्षा के उद्देश्य से बन्द करने की व्यवस्था होनी चाहिए।
(3) अर्द्ध-सघन प्रणाली- (Semi Intensive System)-इस प्रणाली में मुर्गियों को निम्नलिखित दो प्रकार से पाला जाता है-
(i) पोल्ट्री घेरा प्रणाली (Poultry Run ( System)-इस प्रणाली में एक मुर्गीघर के साथ मुर्गियों के विचरण के लिए थोड़ा खुला क्षेत्र भी होता है। दिन में पक्षी खुले क्षेत्र में घूमते हैं तथा रात के समय मुर्गीधर में चले जाते हैं। टाने तथा पानी के पात्र खले स्थान तथा मुर्गीघर में भी रखे जा सकते हैं। खुले क्षेत्र को तार या लोहे की चद्दरों (पत्तरों) या लकड़ी की खपच्चियों आदि से निर्मित जालियों से घेर कर सुरक्षित बना दिया जाता है। इनका फर्श पक्का या जालीदार होता है। इसमें 50 पक्षियों तक प्रति पक्षी 270 वर्ग फुट स्थान परन्तु अधिक पक्षी होने पर 160 वर्ग फुट स्थान दिया जाता है।
(ii) उठाऊ मकान प्रणाली (Folding System)-इस पद्धति में भी मुर्गीघर तथा विचरण स्थान एक साथ ही होते हैं परन्तु इसमें यह सम्पूर्ण भाग एक ढाँचे द्वारा ढक दिया जाता है। इस विधि में प्रति पक्षी 5 वर्ग फुट स्थान की आवश्यकता पड़ती है। एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर मकान को ले जाने की सुविधा के लिए इसका आकार सामान्यतः 20 x 5 फुट रखते हैं जिसमें 18-20 मुर्गियों को पाला जा सकता है। मकान के पास में ही दाने व पानी के पात्र तथा अण्डा देने हेतु बिछावन युक्त घोंसलों की व्यवस्था करना आवश्यक है।
(4) सघन प्रणाली (Intensive System)- इसमें मुख्य रूप से निम्न चार प्रणालियाँ शामिल हैं-
(i) गहरी बिछाली प्रणाली (Deep Litter System)-इस कुक्कुट आवास की बाहरी दीवार 4 फुट ऊँची होती है जिसके ऊपर जाली लगी होती है। इसके अन्दर पक्षियों के आराम हेतु कई मंजिल वाला दड़बा एवं पर्याप्त संख्या में अण्डा देने वाले घोंसले होते हैं। इस प्रणाली में 100 मुर्गियों के लिए लम्बाई 20 फुट, चौड़ाई 15 फुट व ऊँचाई 10 फुट होगी। इसी प्रकार 200 मुर्गियों के लिए यह 30 फुट x 20 फुट x 10 फुट, 500 मुर्गियों के लिए 60 फुट x 25 फुट x 10 फुट तथा 1000 मुर्गियों के लिए 100 फुट x 30 फुट x 10 फुट आकार का मुर्गीघर बनाया जाता है।
(ii) बिछावत अहाता प्रणाली (Straw Yard System)-यह गहरी बिछाली तथा पोल्ट्री घेरा प्रणाली दोनों को मिलाकर विकसित की गई प्रणाली है। इसमें रैन बसेरे के साथ लगा एक अहाता होता है जिसमें बिछाली बिछी होती है तथा अहाते के ऊपर जाली लगी होती है। फर्श पक्का एवं ढलानयुक्त होता है। इस रैन बसेरे में 50 मुर्गियों तक प्रति पक्षी 3 वर्ग फुट तथा 50 से अधिक होने पर 2 वर्गफुट स्थान होता है जबकि अहाते में 50 मुर्गियों के लिए प्रति पक्षी 8 वर्ग फुट, 100 पक्षियों के लिए 6 वर्ग फुट एवं 100 से अधिक पक्षियों के लिए 4 वर्ग फुट प्रति पक्षी स्थान उपलब्ध होता है।
(iii) तार फर्श वाला घर प्रणाली (Wire Floored System)-इस प्रणाली में फर्श से लगभग 3 फुट ऊपर जाली का फर्श बनाया जाता है। जाली का आकार 12' x 6' या 15' x 6' होता है। इस प्रणाली में 100 पक्षियों तक प्रति पक्षी 2 वर्ग फुट तथा अधिक पक्षी होने पर प्रति पक्षी 1 वर्ग फुट स्थान रहता है। आवास में दाने व पानी के पात्रों तथा अण्डे देने के घोंसलों की व्यवस्था होती है।
(iv) पिंजरा क्रम प्रणाली या बैटरी प्रणाली (Battery System)-इसमें पक्षियों के लिए जालीदार पिंजरे तैयार किए जाते हैं। इसमें 1 या 3 से 5 पक्षी रखे जाते हैं। एक पक्षी वाले पिंजरे का आकार 25 × 45 सेमी. होता है। इसमें पिंजरे का फर्श ढालू होता है। इस पद्धति में पिंजरों को कतारों या क्रम में रखने के कारण पिंजरा क्रम प्रणाली कहते हैं। इस प्रणाली में प्रत्येक पिंजरे के बाहर की ओर दाने एवं पानी के पात्रों की व्यवस्था की जाती है।