हमारे देश के अखबार चोरी, डकैती, तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचारों से भरे रहते हैं। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोपप्रत्यारोप लगाते रहते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे देश में कोई ईमानदार ही नहीं रह गया। लोग हर व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। जो जितने ऊंचे पद पर हैं, उनमें उतने ही अधिक दोष दिखाए जाते हैं। सब अपने-अपने स्वार्थों में लिप्त हैं। देश के हित की बातें बहुत कम हो रही हैं। देश और समाज की ऐसी दशा देखकर लेखक का मन बैठ जाता है।