यह एक अन्य प्रकार का द्रव है, जो वहन में भी सहायता करता है। इसे लसिका या ऊतक तरल कहते हैं। कोशिकाओं की भित्ति में उपस्थित छिद्रों द्वारा कुछ प्लाज्मा, प्रोटीन तथा रुधिर कोशिकाएँ बाहर निकलकर ऊतक के अंतकर्कोशिकीय अवकाश में आ जाते हैं तथा ऊतक तरल या लसिका का निर्माण करते हैं। यह रुधिर के प्लाज्मा की तरह ही है, लेकिन यह रंगहीन तथा इसमें अल्पमात्रा में प्रोटीन होते हैं। लसिका अंतकोशिकीय अवकाश से लसिका कोशिकाओं में चला जाता है जो आपस में मिलकर बड़ी लसिका वाहिका बनाती है और अंत में बड़ी शिरा में खुलती है। पचा हुआ तथा क्षुद्रांत्र द्वारा अवशोषित वसा का वहन लसिका द्वारा होता है और अतिरिक्त तरल को बाह्य कोशिकीय अवकाश में वापस रुधिर में ले जाता है।