Question
मातृप्रेम $–$ वात्सल्य मूर्ति माँ

Answer

प्रत्येक महापुरुष के जीवन्नोनती में माता का ही अमूल्य देन है | वह बालक की प्रेरणादात्री है | नेपोलियन ने उचित ही कहा है की, “एक माता सौ शिक्षक के समान है | “ शिक्षक की तरह माता ही अपने बच्चों के चरित्र को बनती है | राष्ट्र निर्माण में माता का ही प्रदान है | मिनलदेवी ने सिद्धराज में और जिजाबाई ने शिवाजी में राष्ट्रभावना के बिज बोए थे | गुजराती में कहा गया है ,”जननी नी जोड़ सखी नहीं जेड रे लोल |”
      माता त्यागमूर्ति है | वह जगत जननी है | वह बालक की जीवन नैया का नाविक है | मातृदेवो भव: माता ही देव है | माता की गोद में बेठने का सुख स्वर्ग का सुख है | स्वर्ग का सुख माता के चरणों में ही है | मा का दूध देवो को भी दुर्लभ है | मा का प्रेम शुद्ध ,सात्विक ,और निस्वार्थ है | संस्कृत में कहा है की $–$ “पुत्र: कुपुत्र: जायते माता कुमाता न भवति| “वात्सल्य मूर्ति माता का स्न्नेह अनुपम है | दिव्य मूर्ति माता में माया ममता का कोई छोर नहीं होता |
        माता की तुलना किससे नहीं की जा सकती | माता का स्नेहा स्वाभाविक होता है| पशु पक्षियों में भी अनन्या मां तू प्रेम के आना उदाहरण मिलते हैं| बंदरिया अपने बच्चे को सदा पेट से चिपकाए रहती है तो बिल्ली अपने बच्चे को मुंह में दबाकर सुरक्षित स्थान में ले जाती हैं |यही नहीं कई बार पशु पक्षी बच्चों की रक्षा के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं |मातृप्रेम की तुलना में संसार के सारे प्रेम और रिश्ते नाते फीके पड़ जाते हैं|मां बच्चे की मुस्कुराहट को देखकर स्वर्गीय सुख का अनुभव करती है | जब बच्चा रोता है बिल खाता है |या कभी ठोकर खाकर भूमि पर गिर पड़ता है तब मां उसे कितने दुलार से उठाती है और उसका मन बहलाती है | चाहे बच्चा निकम्मा , मूर्ख, बुद्धि  क्यों ना हो फिर भी उनके प्रति माता के प्रेम में कभी$-$कभी कमी नहीं आती |बालक के रोग ग्रस्त होने पर माता इनकी देखभाल में दिन रात एक कर देती है|
        माता का चुकाया नहीं जा सकता |माता पूजनीय और आदरणीय है| माता की निस्वार्थ और स्वाभाविक प्रेम से बच्चे में अनेकों सद्गुणों का विकास होता है | माता के सदाचरण, सद्भाव, और सदा प्रवृत्ति की अमिट छाप बालक के मन में पड़ती है | माता का स्नेह बालक को मनुष्य बनाता है |माता का एक बार का प्रोत्साहन ध्रुव के लिए ध्रुव पद की प्राप्ति का हेतु बन गया था| यदि जीजाबाई ना होती तो छत्रपति शिवाजी भी ना होते |मोहन को महात्मा गांधी बनाने वाली भी उनकी माता पुतलीबाई ही तो थी |सचमुच वात्सल्य मूर्ति माताओं ने नवरत्नों का निर्माण किया है |माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान है |विद्वान ने उचित ही कहा है कि हजारों पिता की अपेक्षा माता का गौरव ऊंचा है |
 ग्रीष्म का दोपहर
        ग्रीष्म ऋतु गर्मी की ऋतु है |यह हमें काफी हैरान$-$परेशान करती है| क्योंकि चिलचिलाती धूप भला किसे पसंद आएगी | इस ऋतु में सुबह से ही गर्मी का असर शुरू हो जाता है| जैसे जैसे दिन बढ़ता रहता है | गर्मी बढ़ती ही जाती है | दोपहर के समय इसकी पराकाष्ठा आ जाती है सूर्य का प्रखर ताप शुरू हो जाता है और सब की बेचैनी बढ़ती जाती है|
        ग्रीष्मा के दोपहर में सूर्य मानो अंगारे बरसाता हो ऐसा लगता है | चिलचिलाती धूप अपना असर फैला देती है | साईं साईं करती लू चलने लगती है | लू  के कारण कोई बाहर निकलना पसंद नहीं करता है| सड़कें और रास्ते तवे की तरह ताप जाते है|  चारों ओर सन्नाटा छा जाता है | रास्ते सुनसान और निर्जन हो जाते हैं | सूर्य और लू के सिवा सारी प्रकृति मानो विराम करती हो ऐसा लगता है |
सुखी, धनवान और आराम प्रिय लोगो बाहर निकलना पसंद नहीं करते | वे दोपहर के समय पर घर में ही आराम करना पसंद करते हैं|धनवान वातानुकूलित मकान या कमरे में रहते हैं |मध्यम वर्ग के कई लोग कमरे में एयर कूलर लगा देते हैं| बिजली के पंखे लगातार चलते ही रहते हैं | कई लोग दरवाजे और खिड़कियां पर खस की टट्टी लगा देते हैं | शीतल जल ,बर्फ के गोले, आइसक्रीम, गन्ने का रस आदि का बोलबाला हो जाता है | गरीब ,मजदूर ,बेघर और किसान लोगों की परिस्थिति इससे विपरीत होती है |उनके नसीब में ऐसी सुविधाएं कहा ? ऐसे लोगों के लिए गर्मी की दोपहर ऐसे लोगों के लिए गर्मी की दोपहर आफत रुप बन जाती है | मजदूर लोगों को ऐसी दोपहर ओं में भी काम करना पड़ता है | बेघर लोगों के लिए गर्मी से बचने के लिए कोई उपाय नहीं होता | किसानों को भी काम करना पड़ता है |नदी तालाब, आदि सूख जाते हैं | पशु पंखी भी हैरान परेशान हो जाता है | कई पेड़ पौधे सूख जाते हैं | कवि बिहारी ने इसे क्षमता की भावना पैदा करने वाला कहां है |
यथा :
“कहलाने एकै बसे,अहि, मयूर,सृग ,बाघ |
जगत तपोवन $–$ सा किया ,दीरघ दाघ निगाध |”
      सांप और मोर दुश्मन है | मोर सांप को मार डालता है |मृग  बाघ का खुराक है | फिर भी ग्रीष्म के भयानक दोपहर ने इन सब को भयभीत कर दिए हैं | अतः समान भय के कारण सबसे अपने हिंसक भावना छोड़ दी है | तपोवन में भी ऐसी और हिंसक भावना होती है | प्रकृति के भयानक प्रकोप में ऐसा ही होता है |

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