नियोजन का महत्त्व
नियोजन के महत्त्व को हम निम्न बिन्दुओं की सहायता से समझा जा सकते हैं-
1. नियोजन निर्देशन की व्यवस्था करता हैनियोजन कार्य कैसे किया जाता है, इसका पहले से मार्गदर्शन कराकर निर्देशन की व्यवस्था करता है। नियोजन उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से बतलाकर यह आश्वासन देता है कि वे एक मार्गदर्शक के रूप में यह बतलाते हैं कि किस दिशा में क्या कार्य करना है।
2. नियोजन अनिश्चितता की जोखिम को कम करता है-नियोजन एक ऐसी क्रिया है जो भविष्य में किये जाने वाले क्रियाकलापों का निश्चय करके, अनिश्चित घटनाओं तथा परिवर्तनों से व्यवहार करने का कार्य प्रशस्त करती है। परिवर्तनों तथा घटनाओं को रोका नहीं जा सकता लेकिन वे प्रत्याशित होती हैं तथा उनके लिए प्रबन्धकीय प्रतिक्रियाएँ विकसित की जा सकती हैं।
3. नियोजन अतिव्यापित तथा अपव्ययी क्रियाओं को कम करता है-नियोजन विभिन्न मण्डलों, विभागों तथा व्यक्तियों के क्रियाकलापों में सामंजस्य स्थापित करने का आधार प्रदान करता है। यह मतभेदों तथा शंकाओं को दूर करने में सहायता करता है। नियोजन में व्यर्थ एवं अनावश्यक क्रियाएँ या तो कम हो जाती हैं या समाप्त हो जाती हैं।
4. नियोजन, नव-प्रवर्तन विचारों को प्रोत्साहित करता है-नियोजन का महत्त्व इस रूप में भी है कि यह नव-प्रवर्तन विचारों को प्रोत्साहित करता है। यह प्रबन्ध के लिए प्रतियोगात्मक रुचि पैदा करने वाला कार्य है। यह व्यवसाय की उन्नति, विकास एवं भविष्य की कार्यवाहियों के लिए गाइड का काम करता है।
5. नियोजन निर्णयन को सरल बनाता हैनियोजन प्रबन्ध को भविष्य के विषय में जानकारी प्राप्त करने तथा तदनुसार कार्य करने की विभिन्न वैकल्पिक दशाओं में से चुनाव करने की स्वीकारोक्ति देने में सहायता प्रदान करता है। प्रबन्ध विभिन्न विकल्पों का मूल्यांकन करके उनमें से सर्वोत्तम चुनाव करता है। इस प्रकार नियोजन निर्णयन को सरल बनाता है।
6. नियोजन नियन्त्रण के मानकों का निर्धारण करता है-नियोजन लक्ष्यों या मानकों की व्यवस्था करता है जिससे वास्तविक निष्पादन का आकलन सम्भव होता है। वास्तविक निष्पादन को मानकों से तुलना करने पर हम यह जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि क्या वास्तव में हमने लक्ष्यों की प्राप्ति कर ली है? यदि कुछ भिन्नता है तो नियन्त्रण की आवश्यकता हो सकती है। अत: यह कहा जा सकता है कि नियोजन, नियन्त्रण से पूर्व की आवश्यकता है।