नियुक्तिकरण प्रक्रिया का अर्थ-
नियुक्तिकरण प्रक्रिया उन मानव शक्ति की आवश्यकताओं के निर्धारण की प्रक्रिया है जो संस्था के उद्देश्यों का पूर्ति करती है। इसके अनुसार इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रत्याशियों का मूल्यांकन एवं चयन और नये तथा वर्तमान कर्मचारियों का अनुस्थापन, प्रशिक्षण एवं विकास किया जाता है।
इस प्रकार नियुक्तिकरण प्रक्रिया में संगठन ढाँचे में अंकित कार्यों को करने के लिए लोगों के उचित एवं प्रभावपूर्ण चुनाव, मूल्यांकन एवं विकास के द्वारा पदों पर उनकी नियुक्ति की जाती है। नियुक्तिकरण संगठन से जुड़ा हुआ है अर्थात् कार्य एवं पदों का सोच-समझ कर ढाँचा तैयार किया जाता है। प्रबन्ध के एक कार्य के रूप में नियुक्तिकरण का सम्बन्ध किसी व्यावसायिक इकाई में विभिन्न कार्यों एवं उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए कर्मचारियों को उपलब्ध कराने से है।
डेल योडर के अनुसार, "नियुक्तिकरण प्रक्रिया प्रबन्ध का वह भाग है, जो मानवीय शक्ति का अन्य शक्ति-स्रोतों से भिन्न प्रभावशाली नियन्त्रण व उपभोग से सम्बन्ध रखती है।"
नियुक्तिकरण प्रक्रिया के विभिन्न चरण
1. मानव शक्ति आवश्यकताओं का आकलन करना-व्यावसायिक संस्था में प्रत्येक कार्य-पद के निष्पादन के लिए कर्मचारी की नियुक्ति की आवश्यकता पड़ती है, जिसके पास विशिष्ट योग्यता, कौशल तथा पूर्व-अनुभव इत्यादि हैं। इस प्रकार मानव शक्ति आवश्यकताओं को समझना केवल यह जानना नहीं है कि कितने व्यक्तियों की आवश्यकता है, वरन् यह जानना भी है कि किस प्रकार के कर्मचारियों की आवश्यकता है। क्रियात्मक रूप से मानव शक्ति आवश्यकताओं को समझने के लिए एक तरफ कार्य भार विश्लेषण की आवश्यकता है तो दूसरी तरफ कार्य शक्ति विश्लेषण की आवश्यकता है। कार्य-विश्लेषण विभिन्न कार्यों के निष्पादन तथा सांगठनिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कितनी संख्या में तथा किस प्रकार के मानव संसाधनों की आवश्यकता पड़ेगी इत्यादि के निर्धारण को सम्भव बनाती है। कार्य-शक्ति विश्लेषण से पता चलता है कि कितनी संख्या में तथा किस प्रकार के मानव-संसाधन उपलब्ध हैं। वास्तव में इस प्रकार के प्रयोग/अभ्यास यह प्रकट करते हैं कि संस्था में आवश्यकता से कम नियुक्तियाँ हैं अथवा ज्यादा हैं अथवा उपयुक्त हैं। कम नियुक्तिकरण की स्थिति में ही भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की आवश्यकता पड़ती है।
2. भर्ती-सम्भावित कर्मचारियों को ढूंढने की प्रक्रिया तथा उन्हें संगठन में रिक्त पदों के लिए आवेदन करने के लिए प्रेरित करने को भर्ती कहते हैं। इस चरण में, संभावित प्रत्याशियों को खोजना तथा वे स्रोत जहाँ से सम्भावित प्रत्याशी लिये जा सकते हैं, पता लगाना सम्मिलित है। भर्ती के लिए आन्तरिक स्रोतों का प्रयोग एक सीमित रूप में किया जा सकता है। नये प्रतिभावान व्यक्तियों के लिए तथा विस्तृत विकल्प के लिए बाह्य स्रोतों का प्रयोग किया जाता है।
3. चयन-चयन एक ऐसी प्रक्रिया है जो भर्ती के समय बनाये गये सम्भावित पद-प्रत्याशियों के निकाय में से कर्मचारियों को चुनती है। चयन में विभिन्न प्रकार की परीक्षाएँ आयोजित करना तथा साक्षात्कार लेना सम्मिलित है। जो व्यक्ति परीक्षा तथा साक्षात्कार में सफल होते हैं, उन्हें रोजगार अनुबन्धन प्रस्ताव दिया जाता है। यह एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें रोजगार का प्रस्ताव तथा अवधि व शर्ते और किस दिन संस्था में कार्य-भार सँभालना है इत्यादि का उल्लेख होता है।
4. अनुस्थापन तथा अभिविन्यास-कार्यस्थल पर कर्मचारियों के समाजीकरण का प्रारम्भ कर्मचारियों के पद सम्भालते ही हो जाता है। कर्मचारियों को कम्पनी के बारे में एक संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण दिया जाता है तथा उनके उच्च अधिकारियों, अधीनस्थ तथा सहकर्मियों से उनका परिचय कराया जाता है। कार्य-स्थल पर उन्हें ले जाया जाता है। फिर उन्हें जिस पद के लिए चयन किया जाता है, उसका.कार्य-भार दिया जाता है। अभिविन्यांस की प्रक्रिया कर्मचारियों को अन्य कर्मचारियों से मिलवाने का अवसर देती है तथा उन्हें संस्था के नियमों तथा नीतियों से अवगत कराती है। अनुस्थापन से तात्पर्य कर्मचारी के पद-भार सम्भालने से है जिसके लिए उसका चयन हुआ है।
5. प्रशिक्षण तथा विकास-संगठन में प्रत्येक व्यक्ति को उच्च पदों पर पहुँचने का अवसर प्राप्त होना चाहिए। इसके लिए कर्मचारियों को सीखने की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए। संगठन के पास या तो अपने संस्थान में ही प्रशिक्षण केन्द्र होता है या उन्हें अपने कर्मचारियों के सतत प्रशिक्षण हेतु अन्य प्रशिक्षण तथा शैक्षणिक संस्थाओं के साथ सम्बन्ध बनाने होते हैं। इस प्रक्रिया से न केवल संस्थान लाभान्वित होता है वरन् कर्मचारी का मनोबल बढ़ता है व कार्यक्षमता भी बढ़ती है। वे उपयुक्त ढंग से कार्य का निष्पादन करते हैं। इस प्रकार प्रशिक्षण एवं विकास संगठन की कार्यकुशलता तथा उसे प्रभावपूर्ण बनाने में योगदान देते हैं।
6. निष्पादन मूल्यांकन-निष्पादन मूल्यांकन का उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि कर्मचारी अपने पदों की माँगों की पूर्ति करने में कितना सफल है। सुधार के लिए पुनर्निवेशन का होना आवश्यक है। इन मूल्यांकनों का उपयोग प्रशिक्षण, पदोन्नति एवं पारिश्रमिक से सम्बन्धित विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है
7. पदोन्नति एवं भविष्य नियोजन-संगठन में लोगों के उच्च पदों की ओर प्रगति की निरन्तर आवश्यकता होती है। कई कर्मचारी अपने वर्तमान पद के लिए अयोग्य सिद्ध हो रहे हैं इसलिए उनका उनके कौशल एवं रुचि के अनुसार पदों पर हस्तान्तरण कर दिया जाये। इस चरण में व्यक्तियों की पदोन्नति, हस्तान्तरण एवं अवनति से जुड़ी क्रियायें सम्मिलित हैं।
8. पारिश्रमिक-संस्था में मजदूरी अथवा वेतन का ढाँचा ऐसा होना चाहिए कि वह उचित हो एवं कर्मचारियों को आकर्षित कर सके। पारिश्रमिक एक ऐसा शब्द है जिसमें कर्मचारियों की सेवाओं के बदले, नियोक्ता द्वारा दिया जाने वाला भुगतान, प्रलोभन एवं सुविधाएँ सम्मिलित हैं। इनके अतिरिक्त कर्मचारियों को कुछ कानूनी औपचारिकताएं पूरी करनी आवश्यक हैं जो कर्मचारियों को भौतिक एवं वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती हैं।
इस प्रकार नियुक्तिकरण एक प्रक्रिया के रूप में किसी भी संस्थान के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संसाधन जो मानवीय पूँजी हैं, उनका अधिग्रहण, प्रशिक्षण तथा विकास करती है।