प्रवर्तन मिश्र का अर्थ-प्रवर्तन मिश्र से अभिप्राय व्यावसायिक संगठन द्वारा अपने सम्प्रेषण के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सभी प्रवर्तन तकनीकों को मिलाकर प्रयोग करने से है। विपणनकर्ता अपनी संस्था या कम्पनी के उत्पादों के सम्बन्ध में ग्राहकों को सूचित करने एवं खरीदने के लिए तैयार करने के लिए सम्प्रेषण की विभिन्न तकनीकों का प्रयोग करता है। दूसरे शब्दों में, प्रवर्तन मिश्र से तात्पर्य उन सभी क्रियाओं से है जिनसे किसी संस्था तथा उसके उत्पादों के प्रति ग्राहकों एवं भावी ग्राहकों में अनुकूल एवं सम्मोहन विचार उत्पन्न किये जाते हैं। इसके अन्तर्गत विज्ञापन, वैयक्तिक विक्रय, विक्रय संवर्द्धन एवं प्रचार सम्मिलित हैं। कोई भी व्यावसायिक संस्था इन तत्त्वों या अवयवों को किस प्रकार से और कितनी मात्रा में उपयोग कर सकेगी यह अनेक तत्त्वों पर निर्भर करेगा जैसे बाजार की प्रकृति, वस्तु की प्रकृति, प्रवर्तन का बजट, प्रवर्तन के उद्देश्य आदि।
प्रवर्तन मिश्र के मुख्य अवयव
प्रवर्तन मिश्र के मुख्य अवयव निम्नलिखित हैं-
1. विज्ञापन-विज्ञापन प्रवर्तन के लिए सबसे सामान्य रूप से उपयोग में लायी जाने वाली तकनीक है। यह अवैयक्तिक सम्प्रेषण होता है जिसका भुगतान विपणनकर्ता (प्रायोजक) कुछ वस्तु एवं सेवाओं के प्रवर्तन के लिए करते हैं। दूसरे शब्दों में, विज्ञापन से आशय ऐसे दृश्य, लिखित या मौखिक अवैयक्तिक सन्देशों से है जो जनता को क्रय के लिए प्रेरित करने हेतु जनसंचार माध्यमों द्वारा जन सामान्य को प्रसारित किये जाते हैं। विज्ञापन के सर्वसाधारण माध्यम समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, टेलीविजन एवं रेडियो हैं।
विशेषताएँ-विज्ञापन की प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं-
विज्ञापन किसी भी सन्देश का सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण है।
विज्ञापन से अव्यक्तिगत प्रस्तुतीकरण ही सम्भव है।
विज्ञापन का एक निश्चित प्रायोजक भी होता है।
विज्ञापन के लिए प्रायोजक द्वारा भुगतान किया जाता है। प्रायोजक का विज्ञापन पर पूर्ण नियन्त्रण रहता है।
विज्ञापन में विज्ञापक सन्देश विनयपूर्वक आग्रह के रूप में प्रस्तुत करता है न कि एक आदेश के रूप में।
विज्ञापन विज्ञापक या प्रायोजक के पक्ष को प्रस्तुत करता है अतः यह न तो तटस्थ होता है और न ही पक्षपातरहित।
विज्ञापन निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है।
विज्ञापन का क्षेत्र व्यापक है। इसके द्वारा सन्देश कहीं भी पहुँचाये जा सकते हैं।
विज्ञापन सार्वभौमिक है।
2. वैयक्तिक विक्रय-वैयक्तिक विक्रय में बिक्री के उद्देश्य से एक या एक से अधिक सम्भावित ग्राहकों से बातचीत के रूप में सन्देश का मौखिक प्रस्तुतीकरण समाहित है। यह सम्प्रेषण का वैयक्तिक स्वरूप है। वस्तुतः वैयक्तिक विक्रय किसी विक्रयकर्ता या विक्रय प्रतिनिधि द्वारा किसी उत्पाद, सेवा या विचार के सम्बन्ध में किसी ग्राहक या सम्भावित ग्राहक के समक्ष व्यक्तिगत रूप से आमने-सामने प्रस्तुतीकरण है।
पैट्रीशिया फ्रिप के अनुसार, "यदि आप दीर्घ अवधि के लिए सफल उद्यम का निर्माण करना चाहते हैं तो आप बिक्री को बंद नहीं समझें बल्कि संबंधों की शुरुआत समझें।"
इस प्रकार वैयक्तिक विक्रय दो व्यक्तियों द्वारा आमने-सामने सन्देशों का आदान-प्रदान है जिसमें विक्रेता सम्भावित क्रेताओं को अपनी संस्था के उत्पाद या सेवा को क्रय करने या किसी विचार को अपनाने हेतु सविनय प्रेरित एवं प्रोत्साहित करता है।
विशेषताएँ-विक्रय की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
वैयक्तिक विक्रय एक प्रक्रिया है जिसमें सम्भावित ग्राहक एवं विक्रेता आपस में सन्देशों का आदान-प्रदान करते हैं।
इसमें विक्रयकर्ता एवं सम्भावित क्रेता आमने-सामने विचार-विनिमय करते हैं।
इसमें विक्रेता सम्भावित ग्राहक को उत्पाद या सेवा क्रय करने या विचार अपनाने का सविनय आग्रह करता है।
वैयक्तिक विक्रय सशुल्क वैयक्तिक सम्प्रेषण है जिसके लिए विक्रयकर्ता को उसके सेवायोजक द्वारा भुगतान किया जाता है।
सभी संस्थाओं के वैयक्तिक कार्य में भिन्नता होती है।
वैयक्तिक विक्रय प्रवर्तन मिश्र का एक प्रमुख पूरक घटक है।
वैयक्तिक विक्रय सम्भावित ग्राहकों की आवश्यकताओं को निर्धारित करने तथा उन्हें सन्तुष्ट करने में योगदान देता है।
यह सम्भावित ग्राहकों की समस्याओं का समाधान ढूँढ़ने में योगदान देता है।
3. विक्रय संवर्द्धन-यह प्रवर्तन मिश्र का एक मुख्य घटक है। विक्रय संवर्द्धन से तात्पर्य लघु अवधि प्रेरणाओं से है, जो क्रेताओं को वस्तु अथवा सेवाओं के तुरन्त क्रय करने के लिए प्रेरित करने के लिए होती है। इनमें विज्ञापन, वैयक्तिक विक्रय एवं प्रचार को छोड़कर व्यावसायिक संस्था द्वारा अपनी बिक्री बढ़ाने की अन्य सभी प्रवर्तन तकनीक सम्मिलित होती हैं। यथार्थ में विक्रय संवर्द्धन में विज्ञापन, वैयक्तिक विक्रय व प्रचार के अतिरिक्त वे सभी अल्पकालीन क्रियाएँ तथा तकनीकें सम्मिलित हैं जिनसे उपभोक्ताओं, व्यापारियों या मध्यस्थों, विक्रय दल के सदस्यों, संस्थागत क्रेताओं को प्रोत्साहित एवं प्रेरित किया जा सके तथा उत्पाद या सेवा के तत्काल विक्रय को सम्भव बनाया जा सके। विक्रय संवर्द्धन तकनीकों में मुफ्त नमूने, प्रीमियम, भेंट, पुरस्कार, छूट, प्रदर्शन, सजावट, क्रियात्मक प्रदर्शन आदि सम्मिलित हैं।
विशेषताएँ-विक्रय संवर्द्धन की प्रमुख विशेषताएँ हैं-
यह प्रवर्तन मिश्र का एक मुख्य घटक है।
विक्रय संवर्द्धन में विज्ञापन, वैयक्तिक विक्रय एवं प्रचार के अतिरिक्त सभी क्रियाएँ सम्मिलित हैं।
विक्रय संवर्द्धन क्रियाएँ अनावर्ती होती हैं अर्थात् ये निरन्तर नहीं की जाती हैं।
विक्रय संवर्द्धन क्रियाएँ साधारण दिनचर्या में सम्मिलित नहीं होती हैं।
विक्रय संवर्द्धन क्रियाएँ विज्ञापन एवं वैयक्तिक विक्रय की प्रभावशीलता में वृद्धि करती हैं।
विक्रय संवर्द्धन क्रियाओं का अन्तिम उद्देश्य उपभोक्ताओं या ग्राहकों को माल क्रय करने तथा मध्यस्थों या व्यापारियों को माल बेचने के लिए प्रेरित करना होता है।
विक्रय संवर्द्धन एवं विज्ञापन में अन्तर होता है।
विक्रय संवर्द्धन कला एवं विज्ञान दोनों है।
विक्रय संवर्द्धन एवं वैयक्तिक विक्रय में अन्तर होता है।
4. प्रचार-प्रवर्तन मिश्र की एक तकनीक के रूप में प्रचार विज्ञापन के समान ही गैर-वैयक्तिक सम्प्रेषण है, किन्तु यह विज्ञापन के विपरीत बिना किसी भुगतान के सम्प्रेषण है।
जब भी किसी उत्पाद या सेवा के सम्बन्ध में जन समाचार माध्यमों के पक्ष में समाचार आता है तो इसे प्रचार कहते हैं । अन्य शब्दों में, जब वस्तुओं की माँग या संस्था की ख्याति में वृद्धि करने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ तथा सन्देश लोगों तक अवैयक्तिक रूप से पहुँचाये जाते हैं तथा सन्देश से सम्बन्धित व्यक्ति या संस्था द्वारा कोई भुगतान नहीं किया जाता है, तो वह प्रचार कहलाता है।
प्रचार के लिए रेडियो, टीवी, समाचार-पत्र, रंगमंच आदि किसी भी साधन का उपयोग किया जा सकता है।
विशेषताएँ-प्रचार की मुख्य विशेषताएँ निम्न हैं-
प्रचार वैयक्तिक एवं अवैयक्तिक दोनों ही प्रकार का हो सकता है।
प्रचार दृश्य, श्रव्य तथा मुद्रित अथवा इनके संयुक्त रूप में हो सकता है।
प्रचार का कोई निश्चित प्रायोजक नहीं होता है वरन् प्रचारकर्ता स्वयं अपने ही ढंग से प्रचार करता है।
प्रचार की विषय-वस्तु या प्रचारित सन्देश पर सम्बन्धित संस्था का कोई नियन्त्रण नहीं होता है।
प्रचारक को सामान्यतः कोई भुगतान भी प्राप्त नहीं होता है।
प्रचार प्रचारकर्ता या प्रकाशक की इच्छा से होता है।
प्रचार का क्षेत्र व्यापक होता है क्योंकि यह संचार माध्यमों से जुड़ा होता है।
प्रचार सामग्री को अनेक रूपों एवं तरीकों से प्रस्तुत किया जा सकता है।