वृक्ष और पंछी के बीच का संवाद निम्नलिखित रूप में है:
वृक्षः हे पंछी! अब मैं तुम्हें छाँव देने लायक नहीं रहा। मेरे सारे पत्ते झड़ गए हैं। मेरी टहनियों को निष्ठुर मानव ने अपने स्वार्थवश काट डाला है।
पंछी: मैं जानता हूँ वृक्षराज! यह मानव बहुत ही निर्दयी है। आखिर एक दिन उसे अपने किए की सजा जरूर मिलेगी।
वृक्षः नहीं नहीं, हे पंछी! तुम ऐसा मत सोचो। मुझे तो मानव की करतूतों पर तरस आ रहा है।
पंछी: आपके साथ इतना कुछ बुरा होने के बाद भी आप उस मानव के लिए अच्छा ही सोच रहे हैं। यह तो आपकी उदारता है।
वृक्षः सोचूँ नहीं तो क्या करूँ? शहरीकरण की इस प्रक्रिया में उसने तो वन-जंगलों को काटने का काम शुरू कर दिया है।
पंछीः मानव को भविष्य में इसका बहुत ही बड़ा परिणाम भुगतना पड़ेगा।
वृक्षः हाँ, इस बात को मैं जानता हूँ। लेकिन उसे कौन समझाएगा?
पंछीः इस मानव ने तो हमें भी बेघर कर दिया है । मेरे सारे भाई-बहन न जाने कहाँ चले गए हैं?
वृक्षः सच कह रहे हो तुम। यदि इस प्रकार पर्यावरण का विनाश हो रहेगा, तो इस सुंदर धरती का संपूर्ण अस्तित्व खतरे में जाएगा।
पंछी: अब तो मानव को सीख लेनी चाहिए और उसे अत्यधिक संख में वृक्ष लगाने चाहिए।