वसन्त आया-'वसन्त आया' कविता का केन्द्रीय भाव यह बताता है कि आज मनुष्य का रिश्ता प्रकृति से टूट गया है। वसन्त ऋतु के आने पर पहले लोगों में आशा, उत्साह, माधुर्य का समावेश स्वतः हो जाता था पर अब उसे कलेण्डर से जाना जाता है। वसंत आने पर पत्ते झड़ते हैं, कोंपलें फूटती हैं, हवा बहती है, ढाक के जंगलों में लाल-लाल फूल अंगारे जैसे दहकते हैं, कोयल की कूक और भ्रमरों की गुंजार भी सुनाई देती है पर हमारी दृष्टि ही उन पर नहीं जाती। हम प्रकृति से तटस्थ एवं निरपेक्ष बने रहते हैं। वस्तुत: इस कविता के माध्यम से कवि ने आज के मनुष्य की आधुनिक जीवन-शैली पर व्यंग्य किया है।
कवि ने देशज, तद्भव शब्दों का भरपूर प्रयोग कविता में किया है। अशोक, मदन महीना, पंचमी, नन्दन वन जैसे . परम्परा में रचे-बसे शब्दों वाली जीवनानुभवों की भाषा ने इस कविता में बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से वसन्त के चित्रण में सफलता पाई है। कवि यह बता पाने में सफल हुआ है कि हमारी तथाकथित आधुनिकता ने हमें उन सुखों एवं स्फुरणों से वंचित कर दिया है जो प्रकृति के सान्निध्य में हमें सहज ही उपलब्ध होते थे। मुक्त छन्द में लिखी इस कविता का कथ्य अत्यन्त सशक्त है।