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गद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दें। [10M][UNSEEN]

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11 questions · self-marked practice — reveal the answer and mark yourself.

Question 110 Marks
शिक्षा को महत्त्वाकांक्षा से मुक्त होना ही चाहिए। महत्त्वाकांक्षा ही तो राजनीति है। महत्त्वाकांक्षा के कारण ही तो राजनीति सबके ऊपर, सिंहासन पर विराजमान हो गई है। सम्मान वहाँ है, जहाँ पद है। पद वहाँ है, जहाँ शक्ति है। शक्ति वहाँ है, जहाँ राज्य है। इस दौड़ से जीवन में हिंसा पैदा होती है। महत्त्वाकांक्षी चित्त हिंसक चित्त है। अहिंसा के पाठ पढ़ाए जाते हैं। साथ ही महत्त्वाकांक्षा भी सिखाई जाती है। इससे ज्यादा मूढ़ता और क्या हो सकती है?
अहिंसा प्रेम है। महत्त्वाकांक्षा प्रतिस्पर्धा है। प्रेम सदा पीछे रहना चाहता है। प्रतिस्पर्धा आगे होना चाहती है। क्राइस्ट ने कहा है-‘धन्य हैं वे, जो पीछे होने में समर्थ हैं।’ मैं जिसे प्रेम करूँगा, उसे आगे देखना चाहूँगा और यदि मैं सभी को प्रेम करूंगा तो स्वयं को सबसे पीछे खड़ाकर आनंदित हो उलूंगा। लेकिन प्रतिस्पर्धा प्रेम से बिल्कुल उलटी है। वह तो ईर्ष्या है। वह तो घृणा है। वह तो हिंसा है। वह तो सब भाँति सबसे आगे होना चाहती है।
इस आगे होने की होड़ की शुरूआत शिक्षालयों में ही होती है और फिर कब्रिस्तान तक चलती है। व्यक्तियों में यही दौड़ है। राष्ट्रों में भी यही दौड़ है। युद्ध इस दौड़ के ही तो अंतिम फल हैं। यह दौड़ क्यों है ? इस दौड़ के मूल में क्या है ? मूल में है—-अहंकार! हंकार सिखाया जाता है, अहंकार का पोषण किया जाता है।
छोटे-छोटे बच्चों में अहंकार को जगाया और जलाया जाता है। उनके निर्दोष और सरल चित्त अहंकार से विषाक्त किए जाते हैं। उन्हें भी प्रथम होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। स्वर्ण पदक और सम्मान और पुरस्कार बाँटे जाते हैं। फिर यही अहंकार जीवन-भर प्रेत की भाँति उनका पीछा करता है और उन्हें मरते दम तक चैन नहीं लेने देता। विनय के उपदेश दिए जाते हैं और सिखाया अहंकार जाता है। क्या वह दिन मनुष्य जाति के इतिहास में सबसे बड़े सौभाग्य का दिन नहीं होगा जिस दिन हम बच्चों को अहंकार सिखाना बंद कर देंगे? अहंकार नहीं, प्रेम सिखाना है। और प्रेम वहीं होता है, जहाँ अहंकार नहीं है।
‘इसके लिए शिक्षण की आमूल पद्धति ही बदलनी होगी। प्रथम और अंतिम की कोटियाँ तोड़नी होंगी। परीक्षाओं को समाप्त करना होगा। और इन सबकी जगह जीवन के उन मूल्यों की स्थापना करनी होगी जो कि अहंशून्य और प्रेमपूर्ण जीवन को सर्वोच्च जीवन-दर्शन मानने से पैदा होते हैं।
(i) महत्त्वाकांक्षा और राजनीति के बीच क्या संबंध है?
(ii) महत्त्वाकांक्षा और अहिंसा में क्या अंतर है?
(iii) लेखक के अनुसार शिक्षा में किस चीज़ को समाप्त करना चाहिए और क्यों?
(iv) बच्चों में अहंकार कैसे उत्पन्न होता है और इसका क्या प्रभाव होता है?
(v) लेखक के अनुसार मनुष्य जाति के लिए सबसे बड़ा सौभाग्य क्या होगा?
Answer
(i) महत्त्वाकांक्षा राजनीति का मूल आधार है। महत्त्वाकांक्षा के कारण राजनीति सभी पर हावी हो जाती है। सम्मान, पद, शक्ति और राज्य की दौड़ में हिंसा उत्पन्न होती है।
(ii) अहिंसा प्रेम है जो पीछे रहने की सीख देती है, जबकि महत्त्वाकांक्षा प्रतिस्पर्धा है जो आगे रहने की चाह रखती है। अहिंसा शांतिपूर्ण है, पर महत्त्वाकांक्षा हिंसक और ईर्ष्यालु होती है।
(iii) लेखक के अनुसार शिक्षा में प्रतियोगिता और प्रथम-آخر की कोटियाँ समाप्त करनी चाहिए क्योंकि ये अहंकार और हिंसा को जन्म देती हैं। इसके स्थान पर प्रेम और अहंशून्य जीवन के मूल्यों को स्थापित करना चाहिए।
 (iv) बच्चों में पुरस्कार, स्वर्ण पदक और प्रथम स्थान पाने के लिए प्रोत्साहित करने से अहंकार उत्पन्न होता है। यह अहंकार जीवन भर उनका पीछा करता है और उन्हें मानसिक शांति नहीं देता।
(v) सबसे बड़ा सौभाग्य तब होगा जब हम बच्चों को अहंकार सिखाना बंद कर देंगे और उनके मन में प्रेम स्थापित करेंगे, जिससे एक अहंशून्य और प्रेमपूर्ण जीवन का विकास होगा।
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Question 210 Marks
पश्चिमी सभ्यता का एक नया आदर्श-पश्चिमी सभ्यता मुख मोड़ रही है। वह एक नया आदर्श देख रही है। अब उसकी चाल बदलने लगी है। वह कलों की पूजा को छोड़कर मनुष्यों की पूजा को अपना आदर्श बना रही है। इस आदर्श के दर्शाने वाले देवता रस्किन और टाल्स्टॉय आदि हैं। पाश्चात्य देशों में नया प्रभात होने वाला है। वहाँ के गंभीर विचार वाले लोग इस प्रभात का स्वागत करने के लिए उठ खड़े हुए हैं। प्रभात होने के पूर्व ही उसका अनुभव कर लेने वाले पक्षियों की तरह इन महात्माओं को इस नए प्रभात का पूर्व ज्ञान हुआ है। और, हो क्यों न? इंजनों के पहिए के नीचे दबकर वहाँ वालों के भाई-बहन-नहीं नहीं उनकी सारी जाति पिस गई; उसके जीवन के धुरे टूट गए, उनका समस्त धन घरों से निकलकर एक ही दो स्थानों में एकत्र हो गया।
साधारण लोग मर रहे हैं, मजदूरों के हाथ-पाँव फट रहे हैं, लहू चल रहा है! सर्दी से ठिठुर रहे हैं। एक तरफ दरिद्रता का अखंड राज्य है, दूसरी तरफ अमीरी का चरम दृश्य। परंतु अमीरी भी मानसिक दुःखों से विमर्दित है। मशीनें बनाई तो गई थी मनुष्यों का पेट भरने के लिए मजदूरों को सुख देने के लिए-परंतु काली-काली मशीनें ही काली बनकर उन्हीं मनुष्यों का भक्षण कर जाने के लिए मुख खोल रही हैं। प्रभात होने पर ये काली-काली बलाएँ दूर होंगी। मनुष्य के सौभाग्य का सूर्योदय होगा।
शोक का विषय है कि हमारे और अन्य पूर्वी देशों में लोगों को मजदूरी से तो लेशमात्र भी प्रेम नहीं, पर वे तैयारी कर रहे हैं पूर्वोक्त काली मशीनों का आलिंगन करने की। पश्चिम वालों के तो ये गले पड़ी हुई बहती नदी की काली कमली हो रही हैं। वे छोड़ना चाहते हैं, परंतु काली कमली उन्हें नहीं छोड़ती। देखेंगे पूर्व वाले इस कमली को छाती से लगाकर कितना आनंद अनुभव करते हैं। यदि हममें से हर आदमी अपनी दस उँगलियों की सहायता से साहसपूर्वक अच्छी तरह काम करे तो हम मशीनों की कृपा से बढ़े हुए परिश्रम वालों को वाणिज्य के जातीय संग्राम में सहज ही पछाड़ सकते हैं। सूर्य तो सदा पूर्व ही से पश्चिम की ओर जाता है। पर, आओ पश्चिम में आने वाली सभ्यता के नए प्रभात को हम पूर्व से भेजें।
इंजनों की वह मजदूरी किस काम की जो बच्चों, स्त्रियों और कारीगरों को ही भूखा-नंगा रखती है, और केवल सोने, चाँदी, लोहे आदि धातुओं का ही पालन करती है। पश्चिम को विदित हो चुका है कि इनसे मनुष्य का दुःख दिन-पर-दिन बढ़ता है। भारतवर्ष जैसे दरिद्र देश में मनुष्य के हाथों की मजदूरी के बदले कलों से काम लेना काल का डंका बजाना होगा। दरिद्र प्रजा और भी दरिद्र होकर मर जाएगी। चेतन से चेतन की वृद्धि होती है। मनुष्य को तो मनुष्य ही सुख दे सकता है। परस्पर को निष्कपट सेवा ही से मनुष्य जाति का कल्याण हो सकता है।
(i) पश्चिमी सभ्यता किस नई सोच की ओर बढ़ रही है और इसके प्रमुख प्रतिनिधि कौन हैं?
(ii) लेखक ने पश्चिमी देशों के मजदूरों की क्या स्थिति बताई है और इससे समाज को क्या खतरा है?
(iii) लेखक के अनुसार पूर्वी देशों के लोग मशीनों के प्रति कैसी मानसिकता रखते हैं और यह उनकी किस समस्या का कारण बन सकता है?
(iv) लेखक मशीनों की तुलना किससे करता है और वह इससे मनुष्यों को क्या चेतावनी देता है?
(v) इस लेख में मनुष्य और मशीन के संबंध में लेखक का मुख्य संदेश क्या है?
Answer
(i) पश्चिमी सभ्यता कलाओं की पूजा छोड़कर मनुष्यों की पूजा को अपना नया आदर्श बना रही है। इसके प्रमुख प्रतिनिधि रस्किन और टाल्स्टॉय जैसे विचारक हैं, जो इस नए प्रभात का संदेश दे रहे हैं।
(ii) पश्चिमी देशों के मजदूर बहुत मेहनत के बावजूद भूखे-प्यासे, घायल और ठंड से ठिठुर रहे हैं। उनकी हालत देखकर लगता है कि मशीनें, जो उनके लिए बनी थीं, अब उनकी भक्षण करने वाली काली बलाएँ बन गई हैं, जिससे समाज में असमानता और दुख बढ़ रहा है।
(iii) पूर्वी देश मशीनों से प्रेम नहीं रखते, पर फिर भी वे उसे अपनाने की तैयारी कर रहे हैं। इससे वे अपनी दरिद्रता और दुर्बलता बढ़ा सकते हैं क्योंकि मशीनों के आलिंगन में वे अपनी असली क्षमता और मेहनत को खो सकते हैं।
(iv) लेखक मशीनों की तुलना ‘काली कमली’ से करता है, जो मनुष्यों को पकड़कर नहीं छोड़ती। वह चेतावनी देता है कि मशीनों के कारण मनुष्य का दुःख बढ़ रहा है और मनुष्य को केवल मशीनों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी मेहनत और साहस से आगे बढ़ना चाहिए।
(v) लेखक का संदेश है कि मनुष्य की खुशहाली और कल्याण केवल मनुष्य की मेहनत, साहस और परस्पर सेवा से संभव है। मशीनें मनुष्यों की जगह नहीं ले सकतीं और मनुष्य को मशीनों की बजाय अपनी नैसर्गिक शक्ति और परस्पर सहयोग पर भरोसा करना चाहिए।
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Question 310 Marks
एक बार मैंने एक बुड्ढे गड़रिये को देखा। घना जंगल है। हरे-हरे वृक्षों के नीचे उसकी सफेद ऊन वाली भेड़ें अपना मुँह नीचे किए हुए कामल-कोमल पत्तियाँ खा रही हैं। गड़रिया बैठा आकाश की ओर देख रहा है। ऊन कातता जाता है। उसकी आँखों में प्रेम-लाली छाई हुई है। वह निरोगता की पवित्र मदिरा से मस्त हो रहा है। बाल उसके सारे सफेद हैं। और क्यों न सफेद हों? सफेद भेड़ों का मालिक जो ठहरा। परंतु उसके कपोलों से लाली फूट रही है। बरफानी देशों में वह मानो विष्णु के समान क्षीरसागर में लेटा है। उसकी प्यारी स्त्री उसके पास रोटी पका रही है। उसकी दो जवान कन्याएँ उसके साथ जंगल-जंगल भेड़ चराती घूमती हैं। अपने माता-पिता और भेड़ों को छोड़कर उन्होंने किसी और को नहीं देखा। मकान इनका बेमकान है, घर इनका बेघर है, ये लोग बेनाम और बेपता हैं।
इस दिव्य परिवार को कुटी की जरूरत नहीं। जहाँ जाते हैं, एक घास की झोपड़ी बना लेते हैं। दिन को सूर्य रात को तारागण इनके सखा हैं।।
गड़रिये की कन्या पर्वत के शिखर के ऊपर खड़ी सूर्य का अस्त होना देख रही है। उसकी सुनहली किरणें इसके लावण्यमय मुख पर पड़ रही हैं। यह सूर्य को देख रही है और वह इसको देख रहा है।
हुए थे आँखों के कल इशारे इधर हमारे उधर तुम्हारे।
चले थे अश्कों के क्या फव्वारे इधर हमारे उधर तुम्हारे।।
बोलता कोई भी नहीं। सूर्य उनकी युवावस्था की पवित्रता पर मुग्ध है और वह आश्चर्य के अवतार सूर्य की महिमा के तूफान में पड़ी नाच रही है।
इनका जीवन बर्फ की पवित्रता से पूर्ण और वन की सुगंधि से सुगंधित है। इनके मुख, शरीर और अंत:करण सफेद, इनकी बर्फ, पर्वत और भेड़ें सफेद। अपनी सफेद भेड़ों में यह परिवार शुद्ध सफेद ईश्वर के ‘दर्शन करता है।
जो खुदा को देखना हो तो मैं देखता हूँ तुमको
मैं तो देखता हूँ तुमको जो खुदा को देखना हो।
भेड़ों की सेवा ही इनकी पूजा है। जरा एक भेड़ बीमार हुई, सब परिवार पर विपत्ति आई। दिन-रात उसके पास बैठे काट देते हैं। उसे अधिक पीड़ा हुई तो इन सब की आँखें शून्य आकाश में किसी को देखने लग गई। पता नहीं ये किसे बुलाती हैं। हाथ जोड़ने तक की इन्हें फुरसत नहीं। पर हाँ, इन सब की आँखें किसी के आगे शब्द-रहित संकल्प-रहित मौन प्रार्थना में खुली हैं। दो रातें इसी तरह गुजर गई। इनकी भेड़ अब अच्छी है। इनके घर मंगल हो रहा है। सारा परिवार मिलकर गा रहा है।
इतने में नीले आकाश पर बादल घिर और झम-झम बरसने लगे। मानां प्रकृति के देवता भी इनके आनंद से आनंदित हुए। बूढा गड़रिया आनंद-मत्त होकर नाचने लगा। वह कहता कुछ नहीं, रग-रग उसकी नाच रही है। पिता को ऐसा सुखी देख दोनों कन्याओं ने एक-दूसरं का हाथ पकड़कर राग अलापना आरंभ कर दिया जाता। साथ ही धम-धम थम-थम नाच की उन्होंने धूम मचा दी। मेरी आँखों के सामने ब्रह्मानंद का समाँ बाँध दिया।
(i) गड़रिये की भेड़ों का वर्णन कैसे किया गया है?
(ii) गड़रिये का व्यक्तित्व और उसकी मनोदशा कैसी है?
(iii) गड़रिये के परिवार का जीवन किस प्रकार का है?
(iv) जब एक भेड़ बीमार हुई तो परिवार ने क्या किया?
(v) बरसात होने पर गड़रिये और उसकी कन्याओं का क्या भाव था?
Answer
(i) गड़रिये की भेड़ें सफेद ऊन वाली हैं, घने जंगल में हरे-भरे पेड़ों के नीचे कमल-कोमल पत्तियाँ खा रही हैं।
(ii) गड़रिया प्रेम-लाली और निरोगता की पवित्र मदिरा से मस्त है, उसका बाल और भेड़ें सफेद हैं, पर उसके कपोलों से लाली फूट रही है।
(iii) गड़रिये का परिवार बेमकान, बेघर और प्राकृतिक वातावरण में रहता है, जो घास की झोपड़ी में रहता है और दिन-रात सूर्य और तारों के साथ जीवन व्यतीत करता है।
(iv) परिवार के सभी सदस्य दिन-रात उसकी सेवा में लगे रहे, उसे काटते रहे और अपनी आंखें शब्द-रहित मौन प्रार्थना में खुली रखीं।
(v) बरसात में गड़रिया आनंद-मत्त होकर नाचा, और उसकी कन्याओं ने हाथ पकड़कर राग अलापना और नाच कर खुशी मनाई।
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Question 410 Marks
शास्त्री जी की एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि ‘वे एक सामान्य परिवार में पैदा हुए थे, सामान्य परिवार में ही उनकी परवरिश हुई और जब वे देश के प्रधानमंत्री जैसे महत्त्वपूर्ण ‘ पद प पहुंचे, तब भी वह सामान्य ही बने रहे।’ विनम्रता, सादगी और सरलता उनके व्यक्तित्व में एक विचित्र प्रकार का आकर्षण पैदा करती थी। इस दृष्टि से शास्त्री जी का व्यक्तित्व बापू के अधिक करीब था और कहना न होगा कि बापू से प्रभावित होकर ही सन् 1921 में उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ी थी। शास्त्री जी पर भारतीय चिंतकों, डॉ. भगवानदास तथा बापू का कुछ ऐसा प्रभाव रहा कि वह जीवन-भर उन्हीं के आदर्शों पर चलते रहे तथा औरों को इसके लिए प्रेरित करते रहे। शास्त्री जी के संबंध में मुझे बाइबिल की वह उक्ति बिल्कुल सही जान पड़ती है कि विनम्र ही पृथ्वी के वारिस होंगे।
शास्त्री जी ने हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम में तब प्रवेश किया था, जब वे एक स्कूल में विद्यार्थी थे ओर उस समय उनकी उम्र 17 वर्ष की थी। गाँधी जी के आह्वान पर वे स्कूल छोड़कर बाहर आ गए थे। इसके बाद काशी विद्यापीठ में उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की। उनका मन हमेशा देश की आजादी और सामाजिक कार्यों की ओर लगा रहा। परिणाम यह हुआ कि सन् 1926 में वे ‘लोक सेवा मंडल’ में शामिल हो गए, जिसके वे जीवन-भर सदस्य रहे। इसमें शामिल होने के बाद से शास्त्री जी ने गाँधी जी के विचारों के अनुरूप अछूतोद्धार के काम में अपने आपको लगाया। यहाँ से शास्त्री जी के जीवन का एक नया अध्याय प्रारंभ हो गया।
सन् 1930 में जब ‘नमक कानून तोड़ो आंदोलन’ शुरू हुआ, तो शास्त्री जी ने उसमें भाग लिया जिसके परिणामस्वरूप उन्हें जेल जाना पड़ा। यहाँ से शास्त्री जी की जेल-यात्रा की जो शुरूआत हुई तो वह सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन तक निरंतर चलती रही। इन 12 वर्षों के दौरान वे सात बार जेल गए। इसी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनके अंदर देश की आजादी के लिए कितनी बड़ी ललक थी। दूसरी जेल-यात्रा उन्हें सन् 1932 में किसान आंदोलन में भाग लेने के लिए करनी पड़ी। सन् 1942 की उनकी जेल-यात्रा 3 वर्ष की थी, जो सबसे लंबी जेल-यात्रा थी।
इस दौरान शास्त्री जी जहाँ एक ओर गांधी जी द्वारा बताए गए रचनात्मक कार्यों में लगे हुए थे, वहीं दूसरी ओर पदाधिकारी के रूप में जनसेवा के कार्यों में भी लगे रहे। इसके बाद के 6 वर्षों तक वे इलोहाबाद की नगरपालिका से किसी-न-किसी रूप में जुड़े रहे। लोकतंत्र की इस आधारभूत इकाई में कार्य करने के कारण वे देश की छोटी-छोटी समस्याओं और उनके निराकरण की व्यावहारिक प्रक्रिया से अच्छी तरह परिचित हो गए थे। कार्य के प्रति निष्ठा और मेहनत करने की अदम्य क्षमता के कारण सन् 1937 में वे संयुक्त प्रांतीय व्यवस्थापिका सभा के लिए निर्वाचित हुए। सही मायने में यहीं से शास्त्री जी के संसदीय जीवन की शुरूआत हुई, जिसका समापन देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने में हुआ।
(i) शास्त्री जी का व्यक्तित्व बापू के करीब क्यों माना गया है?
(ii) शास्त्री जी ने स्वतंत्रता संग्राम में कब और कैसे भाग लिया?
(iii) ‘लोक सेवा मंडल’ में शास्त्री जी की भूमिका क्या थी?
(iv) शास्त्री जी की जेल यात्राएँ किस बात का प्रमाण हैं?
(v) इलाहाबाद नगरपालिका में कार्य करने से शास्त्री जी को क्या अनुभव प्राप्त हुआ?
Answer
(i) शास्त्री जी विनम्र, सरल और सादगीपूर्ण जीवन जीते थे, जो बापू के जीवन के आदर्शों से मेल खाता था। उन्होंने बापू से प्रभावित होकर 1921 में पढ़ाई भी छोड़ी थी।
(ii) शास्त्री जी ने 17 वर्ष की उम्र में गाँधी जी के आह्वान पर स्कूल छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। यहीं से उनका राष्ट्रसेवा का जीवन आरंभ हुआ।
(iii) शास्त्री जी 1926 में लोक सेवा मंडल में शामिल हुए और जीवनभर इसके सदस्य रहे। उन्होंने अछूतोद्धार जैसे सामाजिक कार्यों में सक्रिय भाग लिया।
(iv) शास्त्री जी की सात बार की जेल यात्राएँ, जिनमें सबसे लंबी 3 वर्ष की थी, इस बात का प्रमाण हैं कि वे देश की आजादी के लिए अत्यंत समर्पित और संघर्षशील थे।
(v) इलाहाबाद नगरपालिका में 6 वर्षों तक कार्य करने से वे देश की सामान्य समस्याओं और उनके समाधान की व्यावहारिक जानकारी से परिचित हो गए, जिससे उन्हें जनसेवा में दक्षता मिली।
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Question 510 Marks
यदि साहित्य समाज का दर्पण होता तो संसार को बदलने की बात न उठती। कवि का काम यथार्थ जीवन को प्रतिबिंबित करना ही होता तो वह प्रजापति का दर्जा न पाता। वास्तव में प्रजापति ने जो समाज बनाया है, उससे असंतुष्ट होकर नया समाज बनाना कवि का जन्मसिद्ध अधिकार है।
कवि की यह सृष्टि निराधार नहीं होती। हम उसमें अपनी ज्यों-की-त्यों आकृति भले ही न देखें, पर ऐसी आकृति जरूर देखते हैं जैसी हमें प्रिय है, जैसी आकृति हम बनाना चाहते हैं। कवि अपनी रूचि के अनुसार जब विश्व को परिवर्तित करता है तो यह भी बताता है कि विश्व से उसे असंतोष क्यों है। वह यह भी बताता है कि विश्व में उसे क्या रूचता है जिसे वह फलता-फूलता देखना चाहता है। उसके चित्र के चमकीले रंग और पार्श्व-भूमि की गहरी काली रेखाएँ—दोनों ही यथार्थ जीवन से उत्पन्न होते हैं। इसलिए प्रजापति कवि गंभीर यथार्थवादी होता है, ऐसा यथार्थवादी जिसके पाँव वर्तमान की धरती पर हैं और आँखें भविष्य के क्षितिज पर लगी हुई है।इसलिए मनुष्य साहित्य में अपने सुख-दुःख की बात ही नहीं सुनता, वह उसमें आशा का स्वर भी सुनता है। साहित्य थके हुए मनुष्य के लिए विश्रांति ही नहीं है, वह उसे आगे बढ़ने के लिए उत्साहित भी करता है।
पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में हिंदी साहित्य ने यही भूमिका पूरी की थी। सामंती पिंजड़े में बंद मानव-जीवन की मुक्ति के लिए उसने वर्ण और धर्म के सींकचों पर प्रहार किए थे। कश्मीरी ललदेद, पंजाबी नानक, हिंदी सूर-तुलसी-मीरा-कबीर, बंगाली चंडीदास, तमिल तिरुवल्लुवर आदि-आदि गायकों ने भागे-पीछे समूचे भारत में उस जीर्ण मानव-संबंधों के पिंजड़े को झकझोर दिया था। इन गायकों की वाणी ने पीड़ित जनता के मर्म को स्पर्श कर उसे नए जीवन के लिए बटोरा, उसे आशा दी, उसे संगठित किया और जहाँ-तहाँ जीवन को बदलने के लिए संघर्ष के लिए आमंत्रित भी किया।
सत्रहवीं और बीसवीं सदी में बंगाली रवींद्रनाथ, हिंदी भारतेंदु, तेलगु वीरेशलिंगम्, तमिल भारती, मलयाली वल्लतोल आदि-आदि ने अंग्रेजी राज और सामंती अवशेषों के पिंजड़े पर फिर प्रहार किया। एक बार फिर उन्होंने भारत की दुःखी पराधीन जनता को बटोरा, उसे संगठित किया, उसकी मनोवृत्ति बदली, उसे सुखी स्वाधीन जीवन की तरफ बढ़ने के लिए उत्साहित किया।
साहित्य का पांचजन्य समर-भूमि में उदासीनता का राग नहीं सुनाता। वह मनुष्य को भाग्य के आसरे बैठने और पिंजड़े में पंख फड़फड़ाने की प्रेरणा नहीं देता। इस तरह की प्रेरणा देने वालों के वह पंख कतर देता है। वह कायरों और पराभव प्रेमियों को ललकारता हुआ एक बार उन्हें । भी समर-भूमि में उतरने के लिए बुलावा देता है।
(i) यदि साहित्य समाज का केवल दर्पण होता, तो उसमें क्या कमी रह जाती?
(ii) कवि यथार्थ को किस प्रकार रूपांतरित करता है और क्यों?
(iii) पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के कवियों ने किस सामाजिक कुरीति पर प्रहार किया?
(iv) बीसवीं सदी के साहित्यकारों ने जनता को किस प्रकार प्रेरित किया?
(v) साहित्य किस प्रकार मनुष्य को संघर्ष के लिए प्रेरित करता है?
Answer
(i) यदि साहित्य केवल समाज का दर्पण होता, तो वह समाज को बदलने की प्रेरणा नहीं देता। तब कवि केवल यथार्थ को प्रतिबिंबित करता और समाज के परिवर्तन में उसकी भूमिका समाप्त हो जाती।
(ii) कवि यथार्थ को अपनी रुचि के अनुसार परिवर्तित करता है। वह ऐसा समाज गढ़ता है जो उसे प्रिय हो या जिसे वह देखना चाहता है। इसका उद्देश्य समाज में सुधार और आशा उत्पन्न करना होता है।
(iii) पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी के कवियों ने वर्ण और धर्म की संकीर्णताओं पर प्रहार करके सामंती पिंजड़े में बंद मानव जीवन को मुक्त करने का प्रयास किया।
(iv) बीसवीं सदी के साहित्यकारों जैसे रवींद्रनाथ, भारतेंदु आदि ने जनता को संगठित किया, उसकी मानसिकता बदली और उसे स्वाधीन जीवन के लिए प्रेरित किया।
(v) साहित्य मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने की प्रेरणा नहीं देता, बल्कि कायरता और पराभव का विरोध करता है और उसे समर-भूमि में उतरकर संघर्ष करने के लिए प्रेरित करता है।
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Question 610 Marks
मानव के लिए विचार अथवा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उदात्त है, वह इसका अथवा उसका नहीं है, जातिगत अथवा देशगत नहीं है, वह सबका है, सारे विश्व का है। समस्त ज्ञान, विज्ञान और सभ्यता सारी मानवता की विरासत है। भले ही एक विचार का जन्म किसी अन्य देश में भिन्न भाषा-भाषी लोगों के द्वारा हुआ हो, वह हमारा भी है, सबका है। पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के भेद निराधार हैं। महापुरुष विरोधी नहीं होते हैं, एक-दूसरे के पूरक होते हैं। महापुरुषों में अपने देश की विशेषताएँ होती हैं। विवेकशील मनुष्य नम्रतापूर्वक महापुरुषों से शिक्षा ग्रहण कर अपने जीवन को प्रकाशित करने का प्रयत्न कता है। समस्त मानवता उसके प्रति कृतज्ञ है। किंतु अब हमें उनसे आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि ज्ञान की इतिश्री नहीं होती है तथा किसी का शब्द अंतिम नहीं होता है।
संसार एक खुली पाठशाला है, जीवन एक खुली पुस्तक है। सदैव सीखते रहना चाहिए तथा सीखना ही आगे पढ़ने के लिए नए रास्ते खोलता है। विकास की क्रिया के मूल में मानव की पूर्ण बनने की अपनी प्रेरणा है। विकास के लिए समन्वय का भाव होना परम आवश्यक होता है। यदि हम विभिन्न विचारधाराओं एवं उनके जन्मदाता महापुरुषों का पूर्ण . खंडन अथवा पूर्ण मंडन करें तो विकास पथ अवरुद्ध हो जाएगा। अतएव समन्वय की भावना से युक्त होकर सब ओर से सारी वस्तुओं को ग्रहण करते हुए हम उनका लाभ उठा सकते हैं। किसी धर्म विशेष या मान्यता के खूटे के साथ संकीर्ण भाव से बंधकर तथा परंपराओं और रूढ़ियों से जकड़े हुए हम आगे नहीं बढ़ सकते हैं।
मानव को मानव रूप में सम्मानित करके ही हम जातीयता, प्रांतीयता, क्षुद्र राष्ट्रीयता के भेद को तोड़ सकते हैं। आज मानव मानव से दूर हटता जा रहा है। वह भूल चुका है कि देश, धर्म और जाति के भिन्न होते हुए भी हम सर्वप्रथम मानव हैं और समान हैं तथा सभी की भावनाएँ और लक्ष्य एक ही हैं। आज. धर्म, सत्ता, धन आदि का भेद होने से एक मानव दूसरे मानव को मानव ही नहीं मानता है। कभी-कभी स्वधर्मी-विधर्मी को, स्वदेशी-विदेशी को; अफसर चपरासी को, धनी निर्धन को तथा विद्वान निरक्षर को इन्सान ही नहीं समझता है और भूल जाता है कि दूसरे को भी समान रूप से इच्छानुसार भूख और प्यास सताते हैं तथा उसे भी प्रेम और आदर चाहिए। वह भूल जाता है कि दूसरे में भी स्वाभिमान का पुट है, उसे भी विश्राम की आवश्यकता ‘ है और उसे भी अपने बच्चे प्रिय हैं अथवा वह भी अपनी संतान के लिए कुछ करना चाहता है।
(i) मनुष्य को ज्ञान, विचार और अनुभव से कैसा व्यवहार करना चाहिए?
(ii) महापुरुषों के विचारों को किस भावना से ग्रहण करना चाहिए और क्यों?
(iii) जीवन और संसार को किस रूप में देखा गया है और उसका क्या संदेश है?
(iv) विकास के लिए समन्वय का क्या महत्व है?
(v) मनुष्य में मानवता के भाव का क्यों होना आवश्यक है?
Answer
(i) मनुष्य को ज्ञान, विचार और अनुभव को जाति, देश या भाषा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, क्योंकि श्रेष्ठ विचार और अनुभव समस्त मानवता की विरासत हैं और वे सभी के लिए समान रूप से मूल्यवान हैं।
(ii) महापुरुषों के विचारों को नम्रता और विवेक से ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वे एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक होते हैं, और उनके विचार मानवता को दिशा देते हैं।
(iii) जीवन को एक खुली पुस्तक और संसार को खुली पाठशाला कहा गया है, जिससे यह संदेश मिलता है कि मनुष्य को सदैव सीखते रहना चाहिए, क्योंकि सीखना ही विकास की राह खोलता है।
(iv) विकास के लिए समन्वय अत्यंत आवश्यक है। यदि हम केवल खंडन या मंडन करें और दूसरों की बातों को न मानें, तो विकास की राह अवरुद्ध हो जाएगी।
(v) मनुष्य में मानवता का भाव आवश्यक है क्योंकि केवल उसी से हम जातीयता, प्रांतीयता और भेदभाव को मिटाकर सभी को समान रूप से सम्मानित कर सकते हैं।
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Question 710 Marks
हम जिस तरह भोजन करते हैं, गाछ-बिरछ भी उसी तरह भोजन करते हैं। हमारे दाँत हैं, कठोर चीज खा सकते हैं। नन्हे बच्चों के दाँत नहीं होते। वे केवल दूध पी सकते हैं। गाछ-बिरछ के भी दाँत नहीं होते, इसलिए वे केवल तरल द्रव्य या वायु से भोजन ग्रहण करते हैं। गाछ-बिरछ जड़ के द्वारा माटी से रसपान करते हैं। चीनी में पानी डालने पर चीनी गल जाती है। माटी में पानी डालने पर उसके भीतर बहुत-से द्रव्य गल जाते हैं। गाछ-बिरछ वे ही तमाम द्रव्य सोखते हैं। जड़ों को पानी न मिलने पर पेड़ का जन बंद हो जाता है, पेड़ मर जाता है।
खुर्दबीन से अत्यंत सूक्ष्म पदार्थ स्पष्टतया देखे जा सकते हैं। प्रेड़ की डाल अथवा जड़ का इस यंत्र द्वारा परीक्षण करके देखा जा सकता है कि पेड़ में हजारों-हजार नल हैं। इन्हीं सब नलों के द्वारा माटी से पेड़ के शरीर में रस का संचार होता है।
इसके अलावा गाछ के पत्ते हवा से आहार ग्रहण करते हैं। पत्तों में अनगिनत छोटे-छोटे मुँह होते हैं। खुर्दबीन के जरिए अनगिनत मुंह पर अनगिनत होंठ देखे जा सकते हैं। जब आहार करने की जरूरत न हो तब दोनों होंठ बंद हो जाते हैं। जब हम श्वास लेते हैं और उसे बाहर निकालते हैं तो एक प्रकार की विषाक्त वायु बाहर निकलती है उसे ‘अंगारक’ वायु कहते हैं। अगर यह जहरीली हवा पृथ्वी पर इकट्ठी होती रहे तो तमाम जीव-जंतु कुछ ही दिनों में उसका सेवन करके नष्ट हो सकते हैं।
“जरा विधाता की करुणा का चमत्कार तो देखो-जो जीव-जंतुओं के लिए जहर है, गाछ-बिरछ उसी का सेवन करके उसे पूर्णतया शुद्ध कर देते हैं। पेड़ के पत्तों पर जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है, तब पत्ते सूर्य ऊर्जा के सहारे ‘अंगारक वायु से अंगार निःशेष कर डालते हैं। और यही अंगार बिरछ के शरीर में प्रवेश करके उसका संवर्द्धन करते हैं।” पेड़-पौधे प्रकाश चाहते हैं। प्रकाश न मिलने पर बच नहीं सकते। गाछ-बिरछ की सर्वाधिक कोशिश यही रहती है कि किसी तरह उन्हें थोड़ा-सा प्रकाश मिल जाए। यदि खिड़की के पास गमले में पौधे रखो, तब देखोगे कि सारी पत्तियाँ व डालियाँ अंधकार से बचकर प्रकाश की ओर बढ़ रही हैं। वन में जाने पर पता लगेगा कि तमाम गाछ-बिरछ इस होड़ में सचेष्ट हैं कि कौन जल्दी से सर उठाकर पहले प्रकाश को झपट ले। बेल-लताएँ छाया में घड़ी हने से प्रकाश के अभाव में मर जाएंगी। इसीलिए वे पेड़ों से लिपटती हुई, निरंतर ऊपर की ओर अग्रसर होती रहती हैं।
अब तो समझ गए होंगे कि प्रकाश ही जीवन का मूलमंत्र है। सूर्य-किरण का परस पाकर ही पेड़ पल्लवित होता है। गाछ-बिरछ के रेशे-रेशे में सूरज की किरणें आबद्ध हैं। ईंधन को जलाने पर जो प्रकाश व ताप बाहर प्रकट होता है वह सूर्य की ही ऊर्जा है।
(i) पेड़-पौधे किस प्रकार माटी से भोजन ग्रहण करते हैं?
(ii) ‘अंगारक वायु’ क्या है और पेड़ उसका क्या करते हैं?
(iii) पत्तों में छोटे-छोटे मुँह किस कार्य के लिए होते हैं?
(iv) पेड़-पौधे प्रकाश की ओर क्यों झुकते हैं?
(v) बेल-लताएँ पेड़ों से क्यों लिपटती हैं?
Answer
(i) पेड़-पौधे अपनी जड़ों के माध्यम से माटी से तरल द्रव्यों का रसपान करते हैं। माटी में पानी डालने पर उसमें मौजूद पोषक तत्व घुल जाते हैं, जिन्हें पौधे की जड़ें नलिकाओं के द्वारा सोखती हैं और पूरे शरीर में पहुँचाती हैं।
(ii) ‘अंगारक वायु’ वह विषैली गैस (कार्बन डाइऑक्साइड) है जो मनुष्य और जानवर श्वास के समय बाहर निकालते हैं। यह वायु जीव-जंतुओं के लिए हानिकारक है, लेकिन पेड़-पौधे इसे सूर्य की ऊर्जा के सहारे शुद्ध करते हैं और उसे अपने विकास के लिए उपयोग करते हैं।
(iii) पत्तों में मौजूद छोटे-छोटे मुँह (रंध्र) हवा से आहार ग्रहण करने के लिए होते हैं। जब पौधे को वायु की आवश्यकता होती है, तब ये मुँह खुल जाते हैं और जब ज़रूरत नहीं होती, तो बंद हो जाते हैं।
(iv) पेड़-पौधे जीवित रहने और भोजन बनाने के लिए प्रकाश पर निर्भर करते हैं। इसीलिए वे अंधकार से बचकर प्रकाश की ओर झुकते और बढ़ते हैं, ताकि सूर्य-किरणों से उन्हें ऊर्जा मिल सके।
(v) बेल-लताएँ छाया में होने के कारण प्रकाश के अभाव में मर सकती हैं, इसलिए वे ऊँचाई पर प्रकाश पाने के लिए पेड़ों से लिपटती हुई ऊपर की ओर बढ़ती हैं।
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Question 810 Marks
तुम्हें क्या करना चाहिए, इसका ठीक-ठीक उत्तर तुम्हीं को देना होगा, दूसरा कोई नहीं । दे सकता। कैसा भी विश्वास-पात्र मित्र हो, तुम्हारे इस काम को वह अपने ऊपर नहीं ले सकता। हम अनुभवी लोगों की बातों को आदर के साथ सुनें, बुद्धिमानों की सलाह को कृतज्ञतापूर्वक माने, पर इस बात को निश्चित समझकर कि हमारे कामों से ही हमारी रक्षा व हमारा पतन होगा, हमें अपने विचार और निर्णय की स्वतंत्रता को दृढ़तापूर्वक बनाए रखना चाहिए। जिस पुरुष की दृष्टि सदा नीची रहती है, उसका सिर कभी ऊपर न होगा। नीची दृष्टि रखने से यद्यपि रास्ते पर रहेंगे, पर इस बात को न देखेंगे कि यह रास्ता कहाँ ले जाता है। चित्त की स्वतंत्रता का मतलब चेष्टा की कठोरता या प्रकृति की उग्रता नहीं है। अपने व्यवहार में कोमल रहो और अपने उद्देश्यों को उच्च रखो, इस प्रकार नम्र और उच्चाशय दोनों बनो। अपने मन को कभी मरा हुआ न रखो। जो मनुष्य अपना लक्ष्य जितना ही ऊपर रखता है, उतना ही उसका तीर ऊपर जाता है।
संसार में ऐसे-ऐसे दृढ़ चित्त मनुष्य हो गए हैं जिन्होंने मरते दम तक सत्य को टेक नहीं छोड़ी, अपनी आत्मा के विरुद्ध कोई काम नहीं किया। राजा हरिश्चंद्र के ऊपर इतनी-इतनी । विपत्तियाँ आई, पर उन्होंने अपना सत्य नहीं छोड़ा। उनकी प्रतिज्ञा यही रही-“चंद्र टरै, सूरज टरै, टरै जमत व्यवहारस पै दृढ़ श्री हरश्चिंद्र को, टन सत्य विचार” महाराणा प्रतापसिंह जंगल-जंगल मारे-मारे फिरते थे। अपनी स्त्री और बच्चों को भूख से तड़पते देखते थे, परंतु उन्होंने उन लोगों की बात न मानी जिन्होंने उन्हें अधीनतापूर्वक जीते रहने की सम्मति दी, क्योंकि वे जानते थे कि अपनी मर्यादा की चिंता जितनी अपने को हो सकती है, उतनी दूसरे को नहीं। एक इतिहासकार कहता है-“प्रत्येक मनुष्य का भाग्य उसके हाथ में है।” प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन-निर्वाह श्रेष्ठ रीति से कर सकता है। यही मैंने किया है और यदि अवसर मिले तो यही करूँ।
इसे चाहे स्वतंत्रता कहो, चाहे आत्म-निर्भरता कहो, चाहे स्वावलंबन कहो, जो कुछ कहो, यह वही भाव है जिससे मनुष्य और दास में भेद जान पड़ता है, यह वही भाव है जिसकी प्रेरणा से राम-लक्ष्मण ने घर से निकल बड़े-बड़े पराक्रमी वीरों पर विजय प्राप्त की, यह वही भाव है जिसकी प्रेरणा से हनुमान ने अकेलें सीता की खोज की, यह वही भाव है जिसकी प्रेरणा से कोलंबस ने अमरीका समान बड़ा महाद्वीप ढूंढ़ निकाला। चित्त की इसी वृत्ति के बल पर कुंभनदास ने अकबर के बुलाने पर फतेहपुर सीकरी जाने से इनकार किया और कहा था
“मोको कहा सीकरी सो कामा”
इस चित्त-वृत्ति के बल पर मनुष्य इसलिए परिश्रम के साथ दिन काटता है और दरिद्रता के दुःख को झेलता है। इसी चित्त-वृत्ति के प्रभाव से हम प्रलोभनों का निवारण करके उन्हें सदा पद-दलित करते हैं, कुमंत्रणाओं का तिरस्कार करते हैं और शुद्ध चरित्र के लोगों से प्रेम और उनकी रक्षा करते हैं।
(i) हमें बुद्धिमानों की सलाह मानते समय कौन-सी बात ध्यान में रखनी चाहिए?
(ii) ‘चित्त की स्वतंत्रता’ से लेखक का क्या अभिप्राय है?
(iii) हरिश्चंद्र और महाराणा प्रताप के उदाहरण से लेखक क्या सिद्ध करना चाहता है?
(iv) प्रत्येक मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथ में होने का क्या तात्पर्य है?
(v) कोलंबस और कुंभनदास के उदाहरण किस भावना की प्रेरणा को दर्शाते हैं?
Answer
(i) हमें बुद्धिमानों की सलाह को कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए, परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारी रक्षा या पतन हमारे ही विचार और निर्णय पर निर्भर करता है। इसलिए हमें अपने विचार और निर्णय की स्वतंत्रता को दृढ़तापूर्वक बनाए रखना चाहिए।
(ii) ‘चित्त की स्वतंत्रता’ का अर्थ है – स्वतंत्र सोच रखने की शक्ति। यह कोई कठोरता या उग्रता नहीं है, बल्कि अपने उद्देश्यों को ऊँचा रखना और व्यवहार में कोमलता बनाए रखना है। यह मनुष्य को दासता से मुक्त कर आत्मनिर्भर बनाती है।
(iii) लेखक यह सिद्ध करना चाहता है कि सत्य और आत्म-सम्मान के लिए किसी भी कष्ट को सहना महानता है। हरिश्चंद्र ने विपत्तियों में भी सत्य नहीं छोड़ा और महाराणा प्रताप ने दरिद्रता झेली लेकिन मर्यादा के विरुद्ध कोई समझौता नहीं किया।
(iv) इसका तात्पर्य है कि हर व्यक्ति अपने निर्णयों, प्रयासों और सोच से अपने जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है। आत्मनिर्भर और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है।
(v) ये उदाहरण आत्मनिर्भरता, स्वतंत्रता और दृढ़ इच्छाशक्ति की भावना को दर्शाते हैं। कोलंबस ने साहस के साथ अमेरिका की खोज की और कुंभनदास ने सम्राट अकबर की आज्ञा को ठुकराकर आत्मसम्मान और चित्त की स्वतंत्रता का परिचय दिया।
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Question 910 Marks
एक आदमी को व्यर्थ बक-बक करने की आदत है। यदि वह अपनी आदत को छोड़ता है, तो वह अपने व्यर्थ बोलने के अवगुण को छोड़ता है। किंतु साथ ही और अनायास ही वह मितभाषी होने के सद्गुण को अपनाता चला जाता है। यह तो हुआ ‘हाँ’ पक्ष का उत्तर। किंतु एक-दूसरे आदमी को सिगरेट पीने का अभ्यास है। वह सिगरेट पीना छोड़ता है और उसके बजाय दूध से प्रेम करना सीखता है, तो सिगरेट पीना छोड़ना एक अवगुण को छोड़ना है और दूध से प्रेम जोड़ना एक सद्गुण को अपनाना है। दोनों ही भिन्न वस्तुएँ हैं-पृथक्-पृथक्।
अवगुण को दूर करने और सद्गुण को अपनाने के प्रयत्ल में, मैं समझता हूँ कि अवगुणों को दूर करने के प्रयत्नों की अपेक्षा सद्गुणों को अपनाने का ही महत्त्व अधिक है। किसी कमरे में गंदी हवा और स्वच्छ वायु एक साथ रह ही नहीं सकती। कमरे में हवा रहे ही नहीं, यह तो हो ही नहीं सकता। गंदी हवा को निकालने का सबसे अच्छा उपाय एक ही है सभी दरवाजे और खिड़कियाँ खोलकर स्वच्छ वायु को अंदर आने देना।
अवगुणों को भगाने का सबसे अच्छा उपाय है, सद्गुणों को अपनाना। ऐसी बातें पढ़-सुनकर हर आदमी वह बात कहता सुनाई देता है जो किसी समय बेचारे दुर्योधन के मुंह से निकली थी
“धर्म जानता हूँ, उसमें प्रवृत्ति नहीं।
अधर्म जानता हूँ, उससे निवृत्ति नहीं।”
एक आदमी को कोई कुटेव पड़ गई-सिगरेट पीने की ही सही। अत्यधिक सिनेमा देखने की ही सही। बेचारा बहुत संकल्प करता है, बहुत कसमें खाता है कि अब सिगरेट न पीऊंगा, अब सिनेमा देखने न जाऊँगा, किंतु समय आने पर जैसे आप-ही-आप उसके हाथ सिगरेट तक पहुँच जाते हैं और सिगरेट उसके मुँह तक। बेचारे के पाँव सिनेमा की ओर जैसे आप-ही-आप बढ़े , चले जाते हैं।
क्या सिगरेट न पीने का और सिनेमा न देखने का उसका संकल्प सच्चा नहीं? क्या उसने झूठी कसम खाई है ? क्या उसके संकल्प की दृढ़ता में कमी है ? नहीं, उसका संकल्प तो उतना ही दृढ़ है जितना किसी का हो सकता है। तब उसे बार-बार असफलता क्यों होती है ? शायद असफलता का कारण इसी संकल्प में छिपा है। हम यदि अपने संकल्प-विकल्पों द्वारा अपने अवगुणों को बलवान न बनाएँ तो हमारे अवगुण अपनी मौत आप मर जाएंगे।आपकी प्रकृति चंचल है, आप अपने ‘गंभीर स्वरूप’ की भावना करें। यथावकाश अपने.मन में ‘गंभीर स्वरूप’ का चित्र देखें। अचिरकाल से ही आपकी प्रकृति बदल जाएगी।
(i) लेखक ने अवगुणों को दूर करने की तुलना में किसे अधिक महत्त्वपूर्ण बताया है और क्यों?
(ii) लेखक ने सिगरेट पीने की आदत का उदाहरण किस बात को समझाने के लिए दिया है?
(iii) दुर्योधन के कथन “धर्म जानता हूँ, उसमें प्रवृत्ति नहीं…” के माध्यम से लेखक क्या बताना चाहता है?
(iv) लेखक के अनुसार संकल्प में दृढ़ता होने पर भी बार-बार असफलता का क्या कारण होता है?
(v) लेखक ने चंचल प्रकृति वाले व्यक्ति को किस उपाय से गंभीर बनने की सलाह दी है?
Answer
(i) लेखक के अनुसार अवगुणों को दूर करने की अपेक्षा सद्गुणों को अपनाना अधिक महत्त्वपूर्ण है। उसका तर्क यह है कि जैसे किसी कमरे से गंदी हवा को हटाने के लिए सबसे अच्छा उपाय है स्वच्छ वायु को आने देना, वैसे ही जीवन में अवगुणों को हटाने का सर्वोत्तम उपाय है सद्गुणों को अपनाना। जब सद्गुण आएँगे तो अवगुण अपने-आप दूर हो जाएँगे।
(ii) लेखक ने सिगरेट पीने की आदत का उदाहरण यह समझाने के लिए दिया है कि एक अवगुण को त्यागने के साथ यदि कोई व्यक्ति एक सद्गुण भी अपनाता है, तो उसका जीवन सकारात्मक दिशा में बढ़ता है। सिगरेट छोड़कर दूध से प्रेम करना अवगुण का त्याग और सद्गुण को अपनाने का उत्तम उदाहरण है।
(iii) लेखक इस कथन के माध्यम से यह बताना चाहता है कि केवल अच्छाई की जानकारी होना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उस पर आचरण भी जरूरी होता है। बहुत से लोग जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत, फिर भी वे बुराई से निवृत्त नहीं हो पाते और अच्छाई की ओर प्रवृत्त नहीं होते।
(iv) लेखक के अनुसार व्यक्ति का संकल्प दृढ़ होने पर भी अगर वह बार-बार असफल हो रहा है, तो उसका कारण यह हो सकता है कि वह अपने संकल्पों के माध्यम से अवगुणों को और अधिक महत्त्व दे रहा होता है, जिससे वे और प्रबल हो जाते हैं। इसलिए नकारात्मक पर ध्यान देने के बजाय सकारात्मक गुणों पर ध्यान देना आवश्यक है।
(v) लेखक ने सलाह दी है कि चंचल प्रकृति वाला व्यक्ति यदि अपने भीतर ‘गंभीर स्वरूप’ की भावना करे और मन में उसका स्पष्ट चित्र बनाए, तो धीरे-धीरे उसकी प्रकृति गंभीर हो जाएगी। यह आत्म-सुधार की एक सहज और प्रभावी प्रक्रिया है।
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Question 1010 Marks
गुरुदेव पूछते हैं कि भीष्म का अवतार क्यों नहीं माना गया। दिनकर जी महामना और उदार कवि थे। उनसे क्षमा मिल जाने की आशा से इतना तो कहा ही जा सकता है कि भीष्म अपने बम भोला नाथ गुरु परशुराम से अधिक संतुलित, विचारवान और ज्ञानी थे। पुराने रिकार्ड कुछ ऐसा सोचने को मजबूर कते है। फिर भी परशुराम को दस अवतारों में गिन लिया गया और बेचारे भीष्म को ऐसा कोई गौरव नहीं दिया गया। क्या कारण हो सकता है ?
एकांत में भीष्म सरकंडों की चटाई पर लेटे-लेटे क्या अपने बारे में सोचते नहीं होंगे? मेरा मन कहता है कि जरूर सोचते होंगे। भीष्म ने कभी बचपन में पिता की गलत आकांक्षाओं की तृप्ति के लिए भीषण प्रतिज्ञा की थी- वह आजीवन विवाह नहीं करेंगे। अर्थात् इस संभावना को ही नष्ट कर देंगे कि उनके पुत्र होगा और वह या उसकी संतान कुरुवंश के सिंहासन पर दावा करेगी। प्रतिज्ञा सचमुच भीषण थी। कहते हैं कि इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही वह देवव्रत से “भीष्म” बने। यद्यपि चित्रवीर्य और विचित्रवीर्य तक तो कौरव-रक्त रह गया था तथापि बाद में वास्तविक कौरव-रक्त समाप्त हो गया, केवल कानूनी कौरव वंश चलता रहा। जीवन के अंतिम दिनों में इतिहास-मर्मज्ञ भीष्म को यह बात क्या खली नहीं होगी ?
भीष्म को अगर यह बात नहीं खली तो और भी बुरा हुआ। परशुराम चाहे ज्ञान-विज्ञान की जानकारी का बोझ ढोने में भीष्म के समकक्ष न रहे हों, पर सीधी बात को सीधे समझने में निश्चय ही वह उनसे बहुत आगे थे। वह भी ब्रह्मचारी थे-बालब्रह्मचारी। पर भीष्म जब अपने निर्वीर्य भाइयों के लिए कन्याहरण कर लाए और एक कन्या को अविवाहित रहने को बाध्य किया, तब उन्होंने भीष्म के इस अशोभन कार्य को क्षमा नहीं किया। समझाने-बुझाने तक ही नहीं रूके, लड़ाई भी की। पर भीष्म अपनी प्रतिज्ञा के शब्दों में चिपटे ही रहे। वह भीष्म नहीं देख सके, वह लोक-कल्याण को नहीं समझ सके। फलतः अपहृता अपमानित कन्या जल मरी। नारद जी भी ब्रह्मचारी थे। उन्होंने सत्य के बार में शब्दों पर चिपटने को नहीं, सबके हित या कल्याण को अधिक जरूरी समझा था सत्यस्य वचनम् श्रेयः सत्यादपि हितं वदेत्।
भीष्म ने दसूरे पक्ष की उपेक्षा की थी। वह “सत्यस्य वचनम्” को “हित” से अधिक महत्त्व दं गए। श्रीकृष्ण ने ठीक इससे उलटा आचरण किया। प्रतिज्ञा में “सत्यस्य वचनम्” की अपेक्षा “हितम्” को अधिक महत्त्व दिया। क्या भारतीय सामूहिक चित्त ने भी उन्हें पूर्वावतार मानकर इसी पक्ष को अपना मौन समर्थन दिया है ? एक बार गलत-सही जो कह दिया, उसी से चिपट जाना “भीषण” हो सकता है, हितकर नहीं। भीष्म ने “भीषण” को ही चुना था।
(i) भीष्म को दस अवतारों में क्यों नहीं गिना गया, लेखक के अनुसार इसका क्या कारण हो सकता है?
(ii) लेखक के अनुसार भीष्म और परशुराम में क्या अंतर था?
(iii) भीष्म ने कौन-सी प्रतिज्ञा की थी और उसका क्या परिणाम हुआ?
(iv) लेखक ने नारद जी का उल्लेख किस सन्दर्भ में किया है?
(v) श्रीकृष्ण ने ‘हित’ और ‘सत्य’ के बीच क्या चुनाव किया और क्यों?
Answer
(i) लेखक के अनुसार भीष्म ने अपने पिता की इच्छा के लिए भीषण प्रतिज्ञा ली, जिससे कुरुवंश की रक्त परंपरा समाप्त हो गई। वे “हित” से अधिक “सत्य” के शब्दों से चिपके रहे, जबकि अवतारी पुरूष लोककल्याण को प्राथमिकता देते हैं।
(ii) लेखक के अनुसार भीष्म संतुलित, विचारवान और ज्ञानी थे, जबकि परशुराम सीधे और कठोर निर्णय लेने वाले थे। परशुराम ने भीष्म के अशोभन कार्य को क्षमा नहीं किया और युद्ध भी किया, जबकि भीष्म अपने वचनों से चिपके रहे।
(iii) भीष्म ने प्रतिज्ञा की थी कि वह आजीवन विवाह नहीं करेंगे। इसका परिणाम यह हुआ कि कुरुवंश की रक्त परंपरा समाप्त हो गई और केवल कानूनी वंश ही शेष रह गया।
(iv) लेखक ने नारद जी को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जिन्होंने सत्य के शब्दों की अपेक्षा लोकहित को अधिक महत्त्व दिया। उन्होंने कहा था: "सत्यस्य वचनं श्रेयः, सत्यादपि हितं वदेत्।"
(v) श्रीकृष्ण ने “सत्य” के बजाय “हित” को अधिक महत्त्व दिया क्योंकि लोकहित और कल्याण उनके लिए अधिक आवश्यक था। उन्होंने शब्दों की कठोरता नहीं, उद्देश्य की पवित्रता को प्रधानता दी।
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Question 1110 Marks
देश-प्रेम है क्या? प्रेम ही तो है। इस प्रेम का आलंबन क्या है ? सारा देश अर्थात् मनुष्य, पशु, पक्षी, नदी, नाले, वन, पर्वत सहित सारी भूमि। यह प्रेम किस प्रकार का है ? यह साहचर्यगत प्रेम है। जिनके बीच हम रहते हैं, जिन्हें बराबर आँखों से देखते हैं, जिनकी बातें बराबर सुनते रहते हैं, जिनका हमारा हर घड़ी का साथ रहता है। सारांश यह है कि जिनके सान्निध्य का हमें अभ्यास पड़ जाता है, उनके प्रति लोभ या राग हो सकता है। देश-प्रेम यदि वास्तव में यह अंत:करण का कोई भाव है तो यही हो सकता है। यदि यह नहीं है तो वह कोरी बकवास या किसी और भाव के संकेत के लिए गढ़ा हुआ शब्द है।
यदि किसी को अपने देश से सचमुच प्रेम है तो उसे अपने देश के मनुष्य, पशु, पक्षी, लता, गुल्म, पेड़, पत्ते, वन, पर्वत, नदी, निर्झर आदि सबसे प्रेम होगा, वह सबको चाहभरी दृष्टि से देखेगा, वह सबकी सुध करके विदेश में आँसू बहाएगा। जो यह भी नहीं जानते कि कोयल किस चिड़िया का नाम है, जो यह भी नहीं सुनते कि चालक कहाँ चिल्लाता है, जो यह भी आँख भर नहीं देखते कि आम प्रणय-सौरभपूर्ण मंजरियों से कैसे लदे हुए हैं, जो यह भी नहीं झाँकते कि किसानों के झोंपड़ों के भीतर क्या हो रहा है, वे यदि दस बने-ठने मित्रों के बीच प्रत्येक भारतवासी की औसत आमदनी का पता बताकर देश-प्रेम का दावा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि भाइयो! बिना रूप-परिचय का यह प्रेम कैसा? जिनके दुःख-सुख के तुम कभी साथी नहीं हुए, उन्हें तुम सुखी देखना चाहते हो, यह कैसे समझें। उनसे कोसों दूर बैठे-बैठे, पड़े-पड़े या खड़े-खड़े तुम विलायती बोली में “अर्थशास्त्र की दुहाई दिया करो, पर प्रेम का नाम उसके साथ न घसीटो।” प्रेम ।। हिसाब-किताब नहीं है। हिसाब-किताब करने वाले भाड़े पर भी मिल सकते हैं, पर प्रेम करने वाले नहीं।
हिसाब-किताब से देश की दशा का ज्ञानमात्र हो सकता है। हितचिंतन और हितसाधन की प्रवृत्ति कोरे ज्ञान से भिन्न है। वह मन के वेग या ‘भाव’ पर अवलंबित है, उसका संबंध लोभ या प्रेम से है, जिसके बिना अन्य पक्ष में आवश्यक त्याग का उत्साह हो नहीं सकता।
पशु और बालक भी जिनके साथ अधिक रहते हैं, उनसे परच जाते हैं। यह परचना परिचय ही है। परिचय प्रेम का प्रवर्तक है। बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता। यदि-प्रेम के लिए हृदय में जगह करनी है तो देश के स्वरूप से परिचित और अभ्यस्त हो जाइए।
(i) लेखक के अनुसार देश-प्रेम का सच्चा रूप क्या है?
(ii) लेखक ने किन लोगों के देश-प्रेम पर प्रश्न उठाया है और क्यों?
(iii) लेखक के अनुसार बिना परिचय के प्रेम क्यों नहीं हो सकता?
(iv) लेखक के अनुसार देश-हित के लिए केवल ज्ञान पर्याप्त क्यों नहीं है?
(v) लेखक ने 'प्रेम' और 'हिसाब-किताब' में क्या अंतर बताया है?
Answer
(i) लेखक के अनुसार देश-प्रेम केवल मनुष्यों से नहीं, बल्कि पशु, पक्षी, नदी, पर्वत, वनस्पति आदि समस्त देश की प्रकृति और जीवन से प्रेम करना है। यह प्रेम साहचर्य पर आधारित होता है, जो साथ रहने से उत्पन्न होता है।
(ii) लेखक ने उन लोगों के देश-प्रेम पर प्रश्न उठाया है जो न कोयल को पहचानते हैं, न आम की मंजरियाँ देखते हैं और न किसानों की पीड़ा को समझते हैं, लेकिन फिर भी आँकड़ों के आधार पर देश-प्रेम का दावा करते हैं। उनका प्रेम बिना परिचय के खोखला है।
(iii) लेखक के अनुसार बिना परिचय के प्रेम संभव नहीं क्योंकि प्रेम का आधार परिचय होता है। पशु और बालक भी जिनके साथ रहते हैं, उनसे परच जाते हैं। इसलिए देश-प्रेम के लिए भी देश से गहरा परिचय आवश्यक है।
(iv) लेखक के अनुसार केवल ज्ञान से देश की दशा का अनुमान लग सकता है, लेकिन वास्तविक हितचिंतन और त्याग की भावना प्रेम या लोभ से उत्पन्न होती है। ज्ञान कोरे आँकड़े देता है, पर त्याग के लिए भाव चाहिए।
(v) लेखक के अनुसार प्रेम भावना का विषय है, जिसमें त्याग और लगाव होता है, जबकि हिसाब-किताब मात्र लेन-देन और गणना पर आधारित होता है। हिसाब-किताब करने वाले तो मिल सकते हैं, लेकिन सच्चा प्रेम करने वाले दुर्लभ होते हैं।
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