Question 110 Marks
शिक्षा को महत्त्वाकांक्षा से मुक्त होना ही चाहिए। महत्त्वाकांक्षा ही तो राजनीति है। महत्त्वाकांक्षा के कारण ही तो राजनीति सबके ऊपर, सिंहासन पर विराजमान हो गई है। सम्मान वहाँ है, जहाँ पद है। पद वहाँ है, जहाँ शक्ति है। शक्ति वहाँ है, जहाँ राज्य है। इस दौड़ से जीवन में हिंसा पैदा होती है। महत्त्वाकांक्षी चित्त हिंसक चित्त है। अहिंसा के पाठ पढ़ाए जाते हैं। साथ ही महत्त्वाकांक्षा भी सिखाई जाती है। इससे ज्यादा मूढ़ता और क्या हो सकती है?
अहिंसा प्रेम है। महत्त्वाकांक्षा प्रतिस्पर्धा है। प्रेम सदा पीछे रहना चाहता है। प्रतिस्पर्धा आगे होना चाहती है। क्राइस्ट ने कहा है-‘धन्य हैं वे, जो पीछे होने में समर्थ हैं।’ मैं जिसे प्रेम करूँगा, उसे आगे देखना चाहूँगा और यदि मैं सभी को प्रेम करूंगा तो स्वयं को सबसे पीछे खड़ाकर आनंदित हो उलूंगा। लेकिन प्रतिस्पर्धा प्रेम से बिल्कुल उलटी है। वह तो ईर्ष्या है। वह तो घृणा है। वह तो हिंसा है। वह तो सब भाँति सबसे आगे होना चाहती है।
इस आगे होने की होड़ की शुरूआत शिक्षालयों में ही होती है और फिर कब्रिस्तान तक चलती है। व्यक्तियों में यही दौड़ है। राष्ट्रों में भी यही दौड़ है। युद्ध इस दौड़ के ही तो अंतिम फल हैं। यह दौड़ क्यों है ? इस दौड़ के मूल में क्या है ? मूल में है—-अहंकार! हंकार सिखाया जाता है, अहंकार का पोषण किया जाता है।
छोटे-छोटे बच्चों में अहंकार को जगाया और जलाया जाता है। उनके निर्दोष और सरल चित्त अहंकार से विषाक्त किए जाते हैं। उन्हें भी प्रथम होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। स्वर्ण पदक और सम्मान और पुरस्कार बाँटे जाते हैं। फिर यही अहंकार जीवन-भर प्रेत की भाँति उनका पीछा करता है और उन्हें मरते दम तक चैन नहीं लेने देता। विनय के उपदेश दिए जाते हैं और सिखाया अहंकार जाता है। क्या वह दिन मनुष्य जाति के इतिहास में सबसे बड़े सौभाग्य का दिन नहीं होगा जिस दिन हम बच्चों को अहंकार सिखाना बंद कर देंगे? अहंकार नहीं, प्रेम सिखाना है। और प्रेम वहीं होता है, जहाँ अहंकार नहीं है।
‘इसके लिए शिक्षण की आमूल पद्धति ही बदलनी होगी। प्रथम और अंतिम की कोटियाँ तोड़नी होंगी। परीक्षाओं को समाप्त करना होगा। और इन सबकी जगह जीवन के उन मूल्यों की स्थापना करनी होगी जो कि अहंशून्य और प्रेमपूर्ण जीवन को सर्वोच्च जीवन-दर्शन मानने से पैदा होते हैं।
(i) महत्त्वाकांक्षा और राजनीति के बीच क्या संबंध है?
(ii) महत्त्वाकांक्षा और अहिंसा में क्या अंतर है?
(iii) लेखक के अनुसार शिक्षा में किस चीज़ को समाप्त करना चाहिए और क्यों?
(iv) बच्चों में अहंकार कैसे उत्पन्न होता है और इसका क्या प्रभाव होता है?
(v) लेखक के अनुसार मनुष्य जाति के लिए सबसे बड़ा सौभाग्य क्या होगा?
अहिंसा प्रेम है। महत्त्वाकांक्षा प्रतिस्पर्धा है। प्रेम सदा पीछे रहना चाहता है। प्रतिस्पर्धा आगे होना चाहती है। क्राइस्ट ने कहा है-‘धन्य हैं वे, जो पीछे होने में समर्थ हैं।’ मैं जिसे प्रेम करूँगा, उसे आगे देखना चाहूँगा और यदि मैं सभी को प्रेम करूंगा तो स्वयं को सबसे पीछे खड़ाकर आनंदित हो उलूंगा। लेकिन प्रतिस्पर्धा प्रेम से बिल्कुल उलटी है। वह तो ईर्ष्या है। वह तो घृणा है। वह तो हिंसा है। वह तो सब भाँति सबसे आगे होना चाहती है।
इस आगे होने की होड़ की शुरूआत शिक्षालयों में ही होती है और फिर कब्रिस्तान तक चलती है। व्यक्तियों में यही दौड़ है। राष्ट्रों में भी यही दौड़ है। युद्ध इस दौड़ के ही तो अंतिम फल हैं। यह दौड़ क्यों है ? इस दौड़ के मूल में क्या है ? मूल में है—-अहंकार! हंकार सिखाया जाता है, अहंकार का पोषण किया जाता है।
छोटे-छोटे बच्चों में अहंकार को जगाया और जलाया जाता है। उनके निर्दोष और सरल चित्त अहंकार से विषाक्त किए जाते हैं। उन्हें भी प्रथम होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। स्वर्ण पदक और सम्मान और पुरस्कार बाँटे जाते हैं। फिर यही अहंकार जीवन-भर प्रेत की भाँति उनका पीछा करता है और उन्हें मरते दम तक चैन नहीं लेने देता। विनय के उपदेश दिए जाते हैं और सिखाया अहंकार जाता है। क्या वह दिन मनुष्य जाति के इतिहास में सबसे बड़े सौभाग्य का दिन नहीं होगा जिस दिन हम बच्चों को अहंकार सिखाना बंद कर देंगे? अहंकार नहीं, प्रेम सिखाना है। और प्रेम वहीं होता है, जहाँ अहंकार नहीं है।
‘इसके लिए शिक्षण की आमूल पद्धति ही बदलनी होगी। प्रथम और अंतिम की कोटियाँ तोड़नी होंगी। परीक्षाओं को समाप्त करना होगा। और इन सबकी जगह जीवन के उन मूल्यों की स्थापना करनी होगी जो कि अहंशून्य और प्रेमपूर्ण जीवन को सर्वोच्च जीवन-दर्शन मानने से पैदा होते हैं।
(i) महत्त्वाकांक्षा और राजनीति के बीच क्या संबंध है?
(ii) महत्त्वाकांक्षा और अहिंसा में क्या अंतर है?
(iii) लेखक के अनुसार शिक्षा में किस चीज़ को समाप्त करना चाहिए और क्यों?
(iv) बच्चों में अहंकार कैसे उत्पन्न होता है और इसका क्या प्रभाव होता है?
(v) लेखक के अनुसार मनुष्य जाति के लिए सबसे बड़ा सौभाग्य क्या होगा?
Answer
View full question & answer→(i) महत्त्वाकांक्षा राजनीति का मूल आधार है। महत्त्वाकांक्षा के कारण राजनीति सभी पर हावी हो जाती है। सम्मान, पद, शक्ति और राज्य की दौड़ में हिंसा उत्पन्न होती है।
(ii) अहिंसा प्रेम है जो पीछे रहने की सीख देती है, जबकि महत्त्वाकांक्षा प्रतिस्पर्धा है जो आगे रहने की चाह रखती है। अहिंसा शांतिपूर्ण है, पर महत्त्वाकांक्षा हिंसक और ईर्ष्यालु होती है।
(iii) लेखक के अनुसार शिक्षा में प्रतियोगिता और प्रथम-آخر की कोटियाँ समाप्त करनी चाहिए क्योंकि ये अहंकार और हिंसा को जन्म देती हैं। इसके स्थान पर प्रेम और अहंशून्य जीवन के मूल्यों को स्थापित करना चाहिए।
(iv) बच्चों में पुरस्कार, स्वर्ण पदक और प्रथम स्थान पाने के लिए प्रोत्साहित करने से अहंकार उत्पन्न होता है। यह अहंकार जीवन भर उनका पीछा करता है और उन्हें मानसिक शांति नहीं देता।
(v) सबसे बड़ा सौभाग्य तब होगा जब हम बच्चों को अहंकार सिखाना बंद कर देंगे और उनके मन में प्रेम स्थापित करेंगे, जिससे एक अहंशून्य और प्रेमपूर्ण जीवन का विकास होगा।
(ii) अहिंसा प्रेम है जो पीछे रहने की सीख देती है, जबकि महत्त्वाकांक्षा प्रतिस्पर्धा है जो आगे रहने की चाह रखती है। अहिंसा शांतिपूर्ण है, पर महत्त्वाकांक्षा हिंसक और ईर्ष्यालु होती है।
(iii) लेखक के अनुसार शिक्षा में प्रतियोगिता और प्रथम-آخر की कोटियाँ समाप्त करनी चाहिए क्योंकि ये अहंकार और हिंसा को जन्म देती हैं। इसके स्थान पर प्रेम और अहंशून्य जीवन के मूल्यों को स्थापित करना चाहिए।
(iv) बच्चों में पुरस्कार, स्वर्ण पदक और प्रथम स्थान पाने के लिए प्रोत्साहित करने से अहंकार उत्पन्न होता है। यह अहंकार जीवन भर उनका पीछा करता है और उन्हें मानसिक शांति नहीं देता।
(v) सबसे बड़ा सौभाग्य तब होगा जब हम बच्चों को अहंकार सिखाना बंद कर देंगे और उनके मन में प्रेम स्थापित करेंगे, जिससे एक अहंशून्य और प्रेमपूर्ण जीवन का विकास होगा।