Question 16 Marks
“प्रबन्ध के सभी स्तरों पर समन्वय की आवश्यकता होती है।” विवेचना कीजिए।
Answer
View full question & answer→समन्वय का अर्थ- बिखरे हुए तन्त्रों को किसी नियत उद्देश्य से श्रृंखलाबद्ध करना एवं एक सूत्र में पिरोना ही 'समन्वय' कहलाता है। 'समन्वय प्रबन्ध का सार' है जो उपक्रम की विभिन्न क्रियाओं में तालमेल बनाये रखता है।
समन्वय की आवश्यकता, महत्व अथवा लाभ- समन्वय के महत्व अथवा लाभ के प्रमुख स्तम्भ निम्नलिखित हैं-
(i) आदेशों एवं निर्देशों की एकता- आदेशों एवं निर्देशों की एकता प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है, किन्तु इस सिद्धान्त का पालन तभी किया जा सकता है, जब उपक्रम के प्रत्येक स्तर पर अधिकारों एवं उत्तरदायित्वों की स्पष्ट व्याख्या कर दी जाती है जिससे प्रत्येक व्यक्ति को आदेश एवं निर्देश एक ही अधिकारी से प्राप्त हों। यह कार्य समन्वय के बिना सम्भव नहीं है।
(ii) विविधता में एकता- एक संस्था में विभिन्न जाति, धर्म, प्रदेश तथा भाषा बोलने वाले एवं विचारधारा वाले व्यक्ति विभिन्न प्रकार के कार्यों का निष्पादन करते हैं, यद्यपि उनका लक्ष्य समान होता है। इन सभी के कार्य करने का तरीका एवं मस्तिष्क अलग-अलग होता है। इस प्रकार उनके कार्यों में विविधता पायी जाती है, किन्तु निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे व्यक्तियों की क्रियाओं को एक सूत्र में पिरोया जाये अर्थात् समन्वय स्थापित किया जाए।
(iii) कुल उपलब्धि में वृद्धि- यदि यह मान भी लिया जाए कि एक समूह में पर्याप्त समानता है और उसके सदस्य सामान्य लक्ष्य प्राप्ति के लिए भरसक प्रयत्न करते हैं किन्तु फिर भी सामूहिक प्रयत्नों के उद्देश्य से समन्वय की नितान्त आवश्यकता होती है। हमारी सम्मति में सामूहिक प्रयत्नों की उपलब्धियाँ व्यक्तिगत समूहों की उपलब्धियों से कहीं अधिक होंगी।
(iv) कर्मचारियों का उच्च मनोबल- समन्वय द्वारा कर्मचारियों को कार्य सन्तुष्टि प्राप्त होती है जिसके परिणामस्वरूप उनका मनोबल ऊँचा उठता है। उनमें आपसी ईर्ष्या, द्वेष, व्यक्तिगत विरोध एवं गन्दी राजनीति काफी हद तक समाप्त हो जाती है। उनमें पारस्परिक विश्वास एवं समझ बढ़ती है।
(v) मानवीय सम्बन्धों पर बल- समन्वय मानवीय सम्बन्धों की महत्ता पर प्रकाश डालता है। किसी कार्य को करने का एक कुशल तरीका मालूम करना अपेक्षाकृत सरल होता है किन्तु कार्य को विभिन्न व्यक्तियों द्वारा मिल-जुलकर एक समिति के रूप में समन्वित ढंग से करना कठिन होता है।
समन्वय की आवश्यकता, महत्व अथवा लाभ- समन्वय के महत्व अथवा लाभ के प्रमुख स्तम्भ निम्नलिखित हैं-
(i) आदेशों एवं निर्देशों की एकता- आदेशों एवं निर्देशों की एकता प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है, किन्तु इस सिद्धान्त का पालन तभी किया जा सकता है, जब उपक्रम के प्रत्येक स्तर पर अधिकारों एवं उत्तरदायित्वों की स्पष्ट व्याख्या कर दी जाती है जिससे प्रत्येक व्यक्ति को आदेश एवं निर्देश एक ही अधिकारी से प्राप्त हों। यह कार्य समन्वय के बिना सम्भव नहीं है।
(ii) विविधता में एकता- एक संस्था में विभिन्न जाति, धर्म, प्रदेश तथा भाषा बोलने वाले एवं विचारधारा वाले व्यक्ति विभिन्न प्रकार के कार्यों का निष्पादन करते हैं, यद्यपि उनका लक्ष्य समान होता है। इन सभी के कार्य करने का तरीका एवं मस्तिष्क अलग-अलग होता है। इस प्रकार उनके कार्यों में विविधता पायी जाती है, किन्तु निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे व्यक्तियों की क्रियाओं को एक सूत्र में पिरोया जाये अर्थात् समन्वय स्थापित किया जाए।
(iii) कुल उपलब्धि में वृद्धि- यदि यह मान भी लिया जाए कि एक समूह में पर्याप्त समानता है और उसके सदस्य सामान्य लक्ष्य प्राप्ति के लिए भरसक प्रयत्न करते हैं किन्तु फिर भी सामूहिक प्रयत्नों के उद्देश्य से समन्वय की नितान्त आवश्यकता होती है। हमारी सम्मति में सामूहिक प्रयत्नों की उपलब्धियाँ व्यक्तिगत समूहों की उपलब्धियों से कहीं अधिक होंगी।
(iv) कर्मचारियों का उच्च मनोबल- समन्वय द्वारा कर्मचारियों को कार्य सन्तुष्टि प्राप्त होती है जिसके परिणामस्वरूप उनका मनोबल ऊँचा उठता है। उनमें आपसी ईर्ष्या, द्वेष, व्यक्तिगत विरोध एवं गन्दी राजनीति काफी हद तक समाप्त हो जाती है। उनमें पारस्परिक विश्वास एवं समझ बढ़ती है।
(v) मानवीय सम्बन्धों पर बल- समन्वय मानवीय सम्बन्धों की महत्ता पर प्रकाश डालता है। किसी कार्य को करने का एक कुशल तरीका मालूम करना अपेक्षाकृत सरल होता है किन्तु कार्य को विभिन्न व्यक्तियों द्वारा मिल-जुलकर एक समिति के रूप में समन्वित ढंग से करना कठिन होता है।