ध्वनि किसी माध्यम में क्रमागत संपीडनों तथा विरलनों के रूप में संचरित होती है। संपीडन उच्च दाब एवं घनत्व के वे क्षेत्र हैं जहाँ माध्यम के कण एक दूसरे के अत्यंत समीप होते हैं तथा विरलन निम्न दाब एवं घनत्व के वे क्षेत्र हैं जहाँ माध्यम के कण एक दूसरे से दूर-दूर होते हैं। जब कोई वस्तु कंपन करना प्रारंभ करती है तो यह अपने चारों ओर विद्यमान माध्यम के कणों को कंपमान कर देती है। ये कण कंपमान वस्तु से हमारे कानों तक स्वयं गति करके नहीं पहुँचते। सबसे पहले कंपमान वस्तु के संपर्क में रहने वाले माध्यम के कण अपनी संतुलित अवस्था से विस्थापित होते हैं। ये अपने समीप के कणों पर एक बल लगाते है जिसके फलस्वरूप निकटवर्ती कण अपनी विरामवस्था से विस्थापित हो जाते हैं। निकटवर्ती कणों को विस्थापित करने के पश्चात् प्रारंभिक कण अपनी मूल अवस्थाओं में वापस लौट आते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि ध्वनि श्रोता के कानों तक न पहुँच जाए। माध्यम में ध्वनि द्वारा उत्पन्न विक्षोभ माध्यम से होता हुआ संचरित होता है। विक्षोभ का वह क्षेत्र जहाँ माध्यम में कण एक-दूसरे के निकट आ जाते हैं, संपीडन कहलाता है तथा वह क्षेत्र जहाँ माध्यम के कण एक-दूसरे से दूर चले जाते हैं, विरलन कहलाता है।
हमारे पास एक वक्र है जो ध्वनि द्वारा उत्पन्न विक्षोभ के घनत्व अथवा दाब परिवर्तन को प्रदर्शित करता है। दिए गए चित्र में, सीधी रेखाएं वायु के कणों की सामान्य स्थिति दर्शाती हैं। घनी रेखाएं संपीडन क्षेत्र तथा कम घनी रेखाएं विरलन क्षेत्र को प्रदर्शित कर रही हैं।
दो क्रमागत संपीडनों अथवा दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी तंरगदैर्घ्य कहलाती है। किसी स्थिर बिंदु से उत्पन्न दो क्रमागत संपीडनों अथवा दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी को तय करने में लगा समय तरंग का आवर्तकाल कहलाता है।








