फड़का अपार पारद के पर!
रव-शेष रह गए हैं निर्झर!
है टूट पड़ा भू पर अंबर!
धँस गए धरा में सभय शाल!
उठ रहा धुआँ, जल गया ताल! -
यों जलद-यान में विचर-विचर
था इंद्र खेलता इंद्रजाल ।
(क) फड़का अपार पारद के पर' पंक्ति में कवि ने किसके बारे में कहा है?
(i) वृक्षों की हरियाली के बारे में
(ii) झरनों के झर-झर स्वर के बारे में
(iii) पारे के समान श्वेत बादल के बारे में
(iv) पर्वतों की श्रृंखला के बारे में
(ख) धँस गए धरा में सभय शाल!' - पंक्ति में किस अलंकार का प्रयोग हुआ है?
(1) उपमा
(ii) रूपक
(iii) मानवीकरण
(iv) अनुप्रास
(ग) इंद्र किसमें बैठकर क्या करने निकले हैं?
(i) इंद्र धरा पर फैली हरियाली को निहारने निकले हैं।
(ii) इंद्र बादलों के यान में बैठकर अपने फैलाए वर्षा के जादू के खेल को देखने के लिए निकले हैं।
(iii) इंद्र आसमान के रथ में पेड़ों को देखने निकले हैं।
(iv) इंद्र अपने यान में बैठकर सैर करने निकले हैं।
(घ) शाल के वृक्ष भयभीत होकर धरती में धँस गए हैं, क्योंकि-
(i) अचानक बादलों के छाने से तथा मूसलाधार वर्षा से चारों ओर पानी ही पानी फैल गया है।
(ii) बादलों के छाने से काले बादलों की धुंध पर्वतीय प्रदेश में फैल गई है।
(iii) शाल के वृक्ष डरपोक होते हैं।
(iv) मज़दूरों ने सड़क निर्माण के लिए शाल के वृक्षों को काट डाला है।
(ङ) किसे विवरणित किया गया है इस वाक्य में?
(i) भूधर
(ii) पारद
(iii) इंद्र
(iv) जलद-यान