साँस थमती गई, नब्जु जमती गई,
फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया,
कट गए सर हमारे तो कुछ गम नहीं,
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया,
मरते-मरते रहा बाँकपन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों ।
जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने की रूत रोज़ आती नहीं
हुस्न और इश्क दोनों को रुसवा करे
वो जवानी जो खूँ में नहाती नहीं,
आज धरती बनी है दुलहन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों!
(i) ‘सर हिमालय का हमने न झुकने दिया ‘ का अर्थ है-
(क) हिमालय को सजाना
(ख) हिमालय की हिफाजत करना
(ग) भारत के गौरव को बनाए रखना
(घ) भारत का गुणगान करना
(ii) कविद्धारा ‘साथियों’ संबोधन का प्रयोग ……. के लिए किया गया है।
(क) कवियों
(ख) शहीदों
(ग) सैनिकों
(घ) देशवासियों
(iii) ‘मरते-मरते रहा बाँकपन साथियों ‘ कवि ने ऐसा कहा है क्योंकि-
(क) सैनिक धरती को दुल्हन की तरह सजा हुआ देखकर प्रसन्न हो गए।
(ख) सैनिकों ने मातृभूमि की रक्षा हेतु जोश और साहस से युद्ध किया।
(ग) देशवासियों को बार-बार पुकारकर सैनिकों ने उनमें देशभक्ति का भाव जगाया।
(घ) सैनिकों ने कभी भी टेढ़ेपन से बातचीत नहीं की, देश रक्षा ही एकमात्र उद्देश्य रहा।
(iv) ‘जान देने की रुत रोज आती नहीं ‘ का भाव है-
(क) सैनिकों के हृदय में जीवित रहने की इच्छा नहीं
(ख) जीवित रहने का समय आनंददायक होना चाहिए
(ग) आत्म बलिदान द्वारा भी देश की रक्षा के लिए तत्पर
(घ) जीवन और मरण सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर निर्भर
(v) इस काव्यांश का संदेश यह है कि हमें-
(क) हुस्न और इश्क को रुसवा करना चाहिए
(ख) देश को दूसरों के हवाले कर देना चाहिए.
(ग) धरती को दुल्हन की तरह सजाना चाहिए
(घ) देश पर कुर्बान होने के लिए तैयार रहना चाहिए
फिर भी बढ़ते कदम को न रुकने दिया,
कट गए सर हमारे तो कुछ गम नहीं,
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया,
मरते-मरते रहा बाँकपन साथियों,
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों ।
जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने की रूत रोज़ आती नहीं
हुस्न और इश्क दोनों को रुसवा करे
वो जवानी जो खूँ में नहाती नहीं,
आज धरती बनी है दुलहन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों!
(i) ‘सर हिमालय का हमने न झुकने दिया ‘ का अर्थ है-
(क) हिमालय को सजाना
(ख) हिमालय की हिफाजत करना
(ग) भारत के गौरव को बनाए रखना
(घ) भारत का गुणगान करना
(ii) कविद्धारा ‘साथियों’ संबोधन का प्रयोग ……. के लिए किया गया है।
(क) कवियों
(ख) शहीदों
(ग) सैनिकों
(घ) देशवासियों
(iii) ‘मरते-मरते रहा बाँकपन साथियों ‘ कवि ने ऐसा कहा है क्योंकि-
(क) सैनिक धरती को दुल्हन की तरह सजा हुआ देखकर प्रसन्न हो गए।
(ख) सैनिकों ने मातृभूमि की रक्षा हेतु जोश और साहस से युद्ध किया।
(ग) देशवासियों को बार-बार पुकारकर सैनिकों ने उनमें देशभक्ति का भाव जगाया।
(घ) सैनिकों ने कभी भी टेढ़ेपन से बातचीत नहीं की, देश रक्षा ही एकमात्र उद्देश्य रहा।
(iv) ‘जान देने की रुत रोज आती नहीं ‘ का भाव है-
(क) सैनिकों के हृदय में जीवित रहने की इच्छा नहीं
(ख) जीवित रहने का समय आनंददायक होना चाहिए
(ग) आत्म बलिदान द्वारा भी देश की रक्षा के लिए तत्पर
(घ) जीवन और मरण सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर निर्भर
(v) इस काव्यांश का संदेश यह है कि हमें-
(क) हुस्न और इश्क को रुसवा करना चाहिए
(ख) देश को दूसरों के हवाले कर देना चाहिए.
(ग) धरती को दुल्हन की तरह सजाना चाहिए
(घ) देश पर कुर्बान होने के लिए तैयार रहना चाहिए