यदि मैं पुस्तक होती
गरिमा को स्कूल में सभी पढ़ाकू कहते ओर उसका मजाक उड़ाते, उसका हाथ कभी भी पुस्तक से खाली नहीं होंता कक्षा में, घर में, बस में हमेशा कोई न कोई पुस्तक उसके हाथ में जरूर होती सारांश यह कि पुस्तक ही उसकी सबसे अच्छी दोस्त थी। दफ्तर से लोटे हुए उसके पिताजी ने बताया कि प्रगति मेदान में पुस्तक मेला लगा हे ओर वे उसे कल वहाँ ले जायेंगे। गरिमा के मन में खुशी के लड्डू फूट रहे थे।
दूसरे दिन मेले से घूमकर लोटते हुए गरिमा सोच रही थी कि यदि में पुस्तक होती तो कितना मजा आता उसमें तरह-तरह की ज्ञान-विज्ञान की बातें होती, लोग चाव से पुस्तकें खरीदते अपनी अलमारी में सजाते ओर मजे लेकर पढ़ते। शायद ही ऐसा कोई विषय हो जिनको इन पुस्तकों ने स्थान न दिया हो, पोराणिक काल से लेकर आज तक कुछ भी इन पुस्तकों से अखूता नहीं रहा कितु आज उनका स्वरूप बदल गया है आज हम चुटकी बजाते ही मोबाइल, कम्प्यूटर पर अपनी मनपसंद पुस्तकें चुनकर पढ़ लेते हैं। तभी घर आ गया उसके हाथ में पुस्तक मेले से चुन-चुनकर खरीदी गई पुस्तकों से भरा बड़ा-सा थेला था ओर उसे अपने कमरे में उन्हें रखने के लिए जगह बनानी थी।