पी.टी. सर की चारित्रिक विशेषताएँ :
i. रौबदार व्यक्तित्व - पी.टी. सर का व्यक्तित्व बहुत रोबदार था। वे स्कूल के समय में कभी भी मुर्कुराते नहीं थे। माता के दागों से भरा चेहरा तथा बाज-सी तेज आँखें, खाकी वर्दी, चमड़े के चोड़े पंजों वाले बूट, सभी कुछ रौबदार व भयभीत करने वाला था।
ii. कठोर अनुशासन प्रिय - पी.टी. मास्टर बहुत कठोर थे। वह छात्रों को अनुशासन में लाने के लिए बहुत कठोर ओर कूर दण्ड दिया करते थे। छात्रों को घुड़की देना, ठुदडे मारना, उन पर बाज की तरह झपटना, उनकी खाल खींचना उनके लिए बाएँ हाथ का खेल था।
iii. स्वाभिमानी - पी.टी. मास्टर का सिद्धांत है कि लड़कों को डाँट-डपट कर रखा जाए। इसलिए चोथी कक्षा के बच्चों को मुर्गा बनाकर कष्ट देना उन्हें अनुचित नहीं लगता। अतः जब हेडमास्टर उन्हें कठोर दण्ड देने पर मुअत्तल कर देते हैं तो वह गिड़गिड़ाने नहीं जाते।
iv. बाहर से कठोर किन्तु कोमल हृदय - पी.टी. सर बाहर से कठोर किन्तु हृदय से कोमल थे। उन्होंने घर में तोते पाल रखे थे। जब उनको स्कूल से मुअत्तल किया गया, तब वे अपने तोतों से बात करते व उन्हें भीगे हुए बादाम खिलाते थे। स्काउट परेड अच्छी करने पर छात्रों को शाबाशी भी देते थे।
मेरे विचार से, शारीरिक दंड पर रोक लगाना बहुत आवश्यक कदम है। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में शारीरिक दंड को स्वीकृत मान्यता नहीं हे। शिक्षकों को छात्रों को पीटने का अधिकार नहीं हे। बच्चों को विद्यालय में शारीरिक दंड से नहीं अपितु मानसिक संस्कार द्वारा अनुशासित करना चाहिए। इसके लिए पुरस्कार, प्रशंसा, निंदा आदि उपाय अधिक ठीक रहते हैं, क्योंकि शारीरिक दण्ड के भय से बन्चा कभी भी अपनी समस्या अपने शिक्षक के समक्ष नहीं रख पाता है। उसे सदेव यही भय सताता रहता है कि यदि वह अपने अध्यापक को अपनी समस्या बताएगा, तो उसके अध्यापक उसकी कहीं पिटाई न कर दें जिसके कारण वह बच्चा दब्लू किसम का बन जाता है। इसके स्थान पर यदि उसे स्रेह से समझाया जाएगा, तो वह सदेव अनुशासित रहेगा और ठीक से पढ़ाई भी करेगा।