बापू का स्पष्ट मत था कि स्वर्ग का राज्य बच्चों के लिए है, बच्चों के सिवा उसमें कोई प्रवेश नहीं कर पाता, क्योंकि बच्चे निर्दोष हुआ करते हैं। उनके जैसा छलरहित, निष्पाप और भोला-भाला संसार में दूसरा कोई नहीं। अगर किसी बच्चे में अवगुण हैं, कोई बुराई है तो यह उसका दोष नहीं, उसके आसपास रहनेवाले व्यक्तियों का दोष है, क्योंकि बच्चा जो कुछ सीखता है अपने आसपास के वातावरण से ही सीखता है। बच्चों को पीटना बापू की दृष्टि में एक महापाप है। कारण कोई भी हो, कैसा भी अपराध हो गया हो, भय दिखाकर या मार-पीटकर बच्चे के साथ दुर्व्यवहार करना कभी उचित नहीं। बच्चों की गलतियों को उन्हें प्रेम-स्नेह से समझा देना चाहिए। ऐसा करने से उनमें सुधार हो जाता है।
प्रश्न :
(1) बापू की दृष्टि से क्या करना महापाप है?
(2) बापू बच्चों के सुधार के लिए कौन-सा मार्ग बताते हैं?
(3) बापू के मतानुसार बच्चे किसके अधिकारी हैं? क्यों?