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सवैये (पध) question types

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48
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8
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Sample Questions

सवैये (पध) questions

One sample from each question group in this chapter. Select any group above to see the full set with answer keys.

कलधौत के धाम का अर्थ होता है $...$
  • A
     काली यमुना नदी
  •  सोने का राजमहल
  • C
     चाँदी का राजमहल
  • D
     कृष्ण का राजमहल

Answer: B.

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आठ सिद्धि और नव निधि का सुख प्राप्त होता है $...$
  •  नंद की धेनु चराने में
  • B
     यमुना किनारे स्नान करने में
  • C
     मुरली बजाने में
  • D
     कदंब के वृक्ष पर बसने में

Answer: A.

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यमुना किनारे कदंब की डाल पर रसखान किस रूप में बसना चाहते हैं?
  • A
     पशु
  • B
     भगवान
  •  पक्षी
  • D
     मनुष्य

Answer: C.

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आठ सिद्धि और नव निधि का सुख प्राप्त होता है$...........$
$(A)$ नंद की धेनु चराने में ।
$(B)$ यमुना किनारे स्नान करने में ।
$(C)$ मुरली वजाने में ।
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नंद की गायों को वन में ले जाकर चलाने का सौभाग्य मिलने पर रसखान $......$
$(अ)$ आकाश, पाताल, मृत्यु तीनों लोकों का राज्य त्याग देंगे।
$(ब)$ आठों सिद्धियों और नौवों निधियों से प्राप्त सुख को भूला देंगे।
$(क)$ गायें चराना चाहते हैं।
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लकुटी लेकर रसखान$.......$
$(अ)$ गायें भगाना चाहते है।
$(ब)$ चलना चाहते हैं।
$(क)$ कृष्ण की भांति वन में भटकते हुए गायें चराना चाहते हैं।
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गोपी कृष्ण की मुरली धारण नहीं करेगी, क्योंकि$.............$
$(अ)$ गोपी निश्छल प्रेम का विश्वासघात करना नहीं चाहती।
$(ब)$ गोपी को कृष्ण से नफरत हो गई है
$(क)$ गोपी को मुरली बजानी आती नहीं है।
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पशु योनि में जन्म मिलने पर कवि$..........$
$(अ)$ नंदजी की गाय बनना चाहते हैं।
$(ब)$ नंदजी की गायों के बीच रहकर चरना चाहते हैं।
$(क)$ गोकुल में चरना चाहते हैं।
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कवि श्रीकृष्ण से संबंधित किन वस्तुओं की अभिलाषा करते हैं? इनके लिए वह किन वस्तुओं को छोड़ने के लिए तैयार है?
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मोर-पखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।      ओढ़ि पितांबर, लै लकुटी बन, गोधन ग्वारिन संग फिरौंगी ॥      भावतो वोहि मेरो रसखानि, सो, तेरे कहे सब स्वाँग भरौंगी।      पै मुरली मुरलीधर की, अधरान-धरी अधरा न धरौंगी ॥
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जा दिन तै वह नंद को छोहरो, या बन धेनु चराइ गयो है।       मोहिनी ताननि गोधन गाइकै, बेनु बजाइ रिझाइ गयो है ॥      ताही घरी कछु टोना सो कै, 'रसखान' हिये में समाइ गयो है।      कोऊ न काहू की कानि करै, सिगरो ब्रज बीर बिकाइ गयो है ॥
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या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।आठहुँ सिद्धि, नवो निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥'रसखान' कबौं इन आँखिन सो, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।कोटिकहू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं ॥
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मानुष हौं तो वही 'रसखान', बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन ।      जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥     पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।     जो खग हौँ तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन॥

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‘अ’ ‘ब’ उतर
मनुष्य नंद की गाय  
पशु यमुना के किनारे कदंब की डाल  
पक्षी गोवर्धन पर्वत  
पत्थर गोकुल गाँव  
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