Question types

व्याकरण question types

290 questions across 14 question groups — pick any mix to generate a संस्कृत paper with step-by-step answer keys.

290
Questions
14
Question groups
5
Question types
01

रिक्तस्थानानां पूर्ति कुरुत । [1M] (MIX)

32 Q
02

श्लोकांशान् योजयत । [5M]

9 Q
03

गद्यखण्डं पठित्वा संस्कृत प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषायां लिखत । [5M]

10 Q
04

अनुच्छेदं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषायां लिखत ।(अपठितम)(First/Second Exam)(3M)

60 Q
05

अनुच्छेदं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषायां लिखत ।(अपठितम)(Final Exam)(4M)

61 Q
06

अर्थविस्तारं कुरुत । [3M]

3 Q
07

श्लोकांशान् योजयत । [3M]

8 Q
08

परिचयात्मिकां टिप्पणीं लिखत ।(First/Second Exam)(2M)

21 Q
09

श्लोकांशान् योजयत । [2M]

4 Q
10

परिचयात्मिकां टिप्पणीं लिखत ।(Final Exam)(3M)

17 Q
11

छन्दः अथवा अलङ्कारं स्पष्ट कुरुत ।

18 Q
12

उचितं विकल्पं चित्वा उत्तरं लिखत । [1M] (MIX)

32 Q
13

अलङ्कारं चिनुत।[2M]

5 Q
14

न्यायं स्पष्टं कुरुत । [2M]

10 Q
Sample Questions

व्याकरण questions

One sample from each question group in this chapter. Select any group above to see the full set with answer keys.

प्रजापतेः त्रयः पुत्रा: देवा: मनुष्या: असुराः च आसन्। तेषु देवाः प्रजापति प्रथमं प्रार्थितवन्तः यत् अस्मभ्यं हितकारकम् अक्षरम् उपदिशतु इति । तदा प्रजापतिः 'द' इति प्रोक्तवान् । अर्थात् दाम्यत इति । अस्यायमाशयः देवाः संयमं कुर्वन्तु इति प्रजापतेः उपदेशः ।
प्रश्ना: -
$Q.1.$ प्रजापतेः के त्रयः पुत्राः आसन्?
$Q.2.$ देवा: प्रजापति किं प्रार्थितवन्तः ?
$Q.3.$ प्रजापतिः कम् अक्षरं प्रोक्तवान् ?
$Q.4.$ देवाः किं कुर्वन्तु ?
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यत्र च महाभारते शकुनिवधः आश्रमे न। पुराणे वायुप्रलपितम्, वयः परिणामेन द्विजपतनम्, उपवनचन्दनेषु जाइयम्, अग्निनां भूतिमत्वम्, एणकानां गीतश्रवणम् आसीत्।
प्रश्ना: $-$
$Q.1.$ शकुनिवधः कुत्र न आसीत् ?
$Q.2.$ वायोः कुत्र प्रलपितम् ?
$Q.3.$ द्विजपतनं केन अभवत् ?
$Q.4.$ जाइयं कुत्र आसीत् ?
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धन्योऽयं भारतदेशो यत्र काले काले देशसेवायै जनहितार्थं च महापुरुषाः जीवनं समर्पयन्ति । एतादृशेषु एकतमः महर्षि दयानन्दः । अस्य महर्षेः दयानन्दस्य जन्म सौराष्ट्रदेशे राजकोट जनपदस्य टङ्कारानामके ग्रामे अभवत् । तस्य पिता करसन त्रिवेदी माता च अमृतबेन आसीत्।
प्रश्नाः $-$
$Q.1.$ के जीवन समर्पयन्ति ?
$Q.2.$ दयानन्दस्य जन्म कुत्र अभवत् ?
$Q.3.$ दयानन्दस्य पितुः नाम किम?
$Q.4.$ दयानन्दस्य मातुः नाम किम् ?
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एकदा एकस्या नृपसभायां कथित वैदेशिक वणिक समागतः । तस्य पार्श्वे काष्ठमय्यः सुन्दर्य: कलात्मिका: आकारेण प्रकारेण भारेण रूपेण रागेण च समानाः तिस्रः पुत्तलिकाः आसन्। राजसभायाम उपस्थित: असौ वणिक ताः पुत्तलिकाः नृपं प्रदर्शयति। नृपतिः स्वकरकमलयोः गृहीत्वा ताः पश्यति।
प्रश्नाः
$Q.1.$ नृपसभायां कः समागतः ?
$Q.2.$ वणिज: पार्श्वे कीदृश्यः पुत्तलिकाः आसन् ?
$Q.3.$ वणिक का: नृपं प्रदर्शयति ?
$Q.4.$ नृपतिः कुत्र पुत्तलिकाः पश्यति ?
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धातुमयी मुद्रा प्राचीनतरा अस्ति। कार्गजी मुद्रा तु अर्वाचीना। विनिमयस्य साधनत्वेन धातुमय्याः मुद्रायाः प्रयोगः भारतवर्षे प्रायः सार्धद्विसहस्रवर्षेभ्यः प्रचलति । प्राचीनकाले एता: मुद्राः सुवर्णमयी, रजतमयी ताम्रमयी चेति विविधाः आसन्।
प्रश्नाः $-$
$Q.1.$ का मुद्रा प्राचीनतरा अस्ति?
$Q.2.$ कार्गजी मुद्रा कीदृशी अस्ति?
$Q.3.$ भारतवर्षे धातुमय्याः मुद्रायाः प्रयोगः कति वर्षेभ्यः पूर्व प्रचलति ?
$Q.4.$ प्राचीनकाले मुद्राः कीदृश्यः आसन् ?
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एकदा मृण्मयपात्रजीर्णकम्बलविभवः कश्चित् अन्धः देवालयेन गतः। तत्र च शङ्करस्य उपासनापरायणो भूत्वा सर्वथा अनशनेन जीवितं त्यागे अचिन्तयत्। तस्य भक्त्या प्रीतः देवः तत्र आविर्भूय 'वरं वृणीस्व' इति तम् अकथयत्। 'कस्त्वम्' इति सः अन्धः तम् अपृच्छत्। 'त्वयि प्रसन्नो महादेवोऽहम्' इति देवः उक्तम् स पुनः भाषते 'यावदहं त्वां प्रत्यक्षीकर्तुम् अक्षमः तावत् कथं मया तव वचसि विश्वासः कर्तव्यः' इति। अनेन तस्मै देवेन दृष्टिः प्रत्यर्पिता। ततः स जानुनी क्षितितले निधाय वरं याचे। 'अहं राज्याधिकारः अनुभवन्तं नप्तारं द्रष्टुं जीवेयम्' इति।
प्रश्नाः $-$
$(1)$ कीदृशः अन्धः देवालयेन गतः ?
$(2)$ अन्धः किम् अचिन्तयत् ?
$(3)$ अन्धस्य भक्त्या प्रीतः कः देवः किम् अकथयत् ?
$(4)$ दृष्टिप्राप्तः सः कीदृशं वरम् अयाचत ?
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विश्वामित्रो नाम नृपः एकदा ससैन्यः मृगयार्थ वने विचरन् परिश्रान्तः क्षुत्पिपासार्तः च वसिष्ठस्य आश्रममागच्छत्। वसिष्ठस्याश्रमे नन्दिनी नाम कामधेनुसुता आसीत्। सा च यद् यद् वसिष्ठो वाञ्छति तत् तद् ददाति स्म। तस्याः प्रसादेन वसिष्ठो विश्वामित्रस्य तस्य सैनिकानां च यथेच्छम् आतिथ्यम् अकरोत्। तदा भृशं परितुष्टः विश्वामित्रः वसिष्ठ मुनिं तां धेनुम् अयाचत ।
प्रश्नाः $-$
$(1)$ कः नृपः वने विचरन् आसीत् ?
$(2)$ कीदृशः नृपः वसिष्ठस्य आश्रमम् अगच्छत् ?
$(3)$ वसिष्ठस्याश्रमे का आसीत् ?
$(4)$ कीदृशः विश्वामित्रः किम् अयाचत ?
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स्वच्छस्य पर्यावरणस्य हेतोः स्वास्थ्यपूर्णस्य जीवनस्य कृते वयं यानि यावन्ति वस्तूनि प्रकृतेः उपभोगाय प्राप्नुमः तावन्ति सर्वाणि प्रकृतिं प्रत्यावर्तयितुं तत्परा भवेम। वनानामुपभोगेन तेषां या न्यूनता अस्माभिः क्रियते तां पूरयितुं वयं सावधानाः सन्नद्धाश्च स्याम। एतत्कृते ग्रामेषु नगरेषु च अस्माभिः आशुवर्धनशीलाः पादपाः आरोपणीयाः।
प्रश्नाः $-$
$(1)$ स्वच्छस्य पर्यावरणस्य हेतोः वयं किं कुर्याम ?
$(2)$ वनानां न्यूनता कथं भवति ?
$(3)$ वनानां न्यूनतां पूरयितुं वयं कीदृशाः भवेम ?
$(4)$ अस्माभिः कीदृशाः पादपाः आरोपणीयाः?
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कस्मिंश्चित्सरोवरे भारण्डनामा पक्ष्येकोदरः पृथग्ग्रीवः प्रतिवसति स्म। तेन च समुद्रतीरे परिभ्रमता किञ्चित्फलममृतकल्पं तरङ्गाक्षिप्तं सम्प्राप्तम्। सः अपि भक्षयन् इदम् आह $-$"अहो बहूनि मयामृतप्रायाणि समुद्रकल्लोलहतानि फलानि भक्षितानि। परमपूर्वोऽस्यास्वादस्तत्किं पारिजात $-$ हरिचन्दनतरुसम्भवम् किंवा किञ्चिदमृतमयफलमव्यक्तेनापि विधिनापतितम्।"
प्रश्नाः $-$
$(1)$ भारण्डः कुत्र प्रतिवसति स्म ?
$(2)$ भारण्डः नाम पक्षी कीदृशः आसीत् ?
$(3)$ भारण्डेन समुद्रतीरे किं सम्प्राप्तम् ?
$(4)$ फलस्य आस्वादः कीदृशः?
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पूर्व त्विदं पर्व नवसस्येटिनाम्ना प्रसिद्धमासीत्। नवं नाम नवीनम्, सस्यं नाम धान्यम् अन्नं वा। इष्टिः नाम यज्ञः, अग्नौ देवेषु वा आहुत्याः प्रदानम्। कृषिप्रधाने भारते वर्षे जनाः वर्षायामृतौ धान्यानि वपन्ति। तस्यायं परिपाककालः। क्षेत्रेषुत्पन्नं धान्यं कृषकाः अद्य स्वगृहमानयन्ति। सर्वप्रथमं तेऽग्निभ्यः देवेभ्यः वाऽस्य नवसस्यस्य आहुति ददति। तदनन्तरमग्निना संस्कृतं लाजारूपमन्नं सर्वेभ्यः वितरन्ति।
प्रश्नाः
$(1)$ इदं दीपावलिपर्व पुरा किंनाम्ना प्रसिद्धम् आसीत् ?
$(2)$ 'नवसस्येष्टि' शब्दस्य किं तात्पर्यम् ?
$(3)$ धान्यस्य परिपाककालः कः?
$(4)$ धान्यं स्वगृहम् आनीय कृषकाः सर्वप्रथमं किं कुर्वन्ति ?
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लोकतंत्र के तीनों पायों$-$विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का अपना$-$अपना महत्त्व है, किंतु जब प्रथम दो अपने मार्ग या उद्देश्य के प्रति शिथिल होती हैं या संविधान के दिशा$-$निर्देशों की अवहेलना करती हैं, तो न्यायपालिका का विशेष महत्त्व हो जाता है। न्यायपालिका ही है जो हमें आईना दिखाती है, किंतु आईना तभी उपयोगी होता है, जब उसमें दिखाई देने वाले चेहरे की विद्रूपता को सुधारने का प्रयास हो।

सर्वोच्च न्यायालय के अनेक जनहितकारी निर्णयों को कुछ लोगों ने न्यायपालिका की अतिसक्रियता माना, पर जनता को लगा कि न्यायालय सही है। राजनीतिक चश्मे से देखने पर भ्रम की स्थिति हो सकती है। प्रश्न यह है कि जब संविधान की सत्ता सर्वोपरि है, तो उसके अनुपालन में शिथिलता क्यों होती है। राजनीतिक$-$दलगत स्वार्थ या निजी हित आड़े आ जाता है और यही भ्रष्टाचार को जन्म देता है।

हम कसमें खाते हैं जनकल्याण की और कदम उठाते हैं आत्मकल्याण के। ऐसे तत्वों से देश को, समाज को सदा खतरा रहेगा। अतः जब कभी कोई न्यायालय ऐसे फैसले देता है, जो समाज कल्याण के हों और राजनीतिक ठेकेदारों को उनकी औकात बताते हों, तो जनता को उसमें आशा की किरण दिखाई देती है। अन्यथा तो वह अंधकार में जीने को विवश है ही।

$(1)$ गद्यांश के लिए उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
$(2)$ लोकतंत्र में न्यायपालिका कब विशेष महत्त्वपूर्ण हो जाती है$?$ क्यों$?$
$(3)$ आईना दिखाने का तात्पर्य क्या है $?$ और न्यायपालिका कैसे आईना दिखाती है$?$
$(4)$ ‘चेहरे की विद्रूपता’ से क्या तात्पर्य है और यह संकेत किनके प्रति किया गया है$?$
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लोकतंत्र के तीनों पायों$-$विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का अपना$-$अपना महत्त्व है, किंतु जब प्रथम दो अपने मार्ग या उद्देश्य के प्रति शिथिल होती हैं या संविधान के दिशा$-$निर्देशों की अवहेलना करती हैं, तो न्यायपालिका का विशेष महत्त्व हो जाता है। न्यायपालिका ही है जो हमें आईना दिखाती है, किंतु आईना तभी उपयोगी होता है, जब उसमें दिखाई देने वाले चेहरे की विद्रूपता को सुधारने का प्रयास हो।

सर्वोच्च न्यायालय के अनेक जनहितकारी निर्णयों को कुछ लोगों ने न्यायपालिका की अतिसक्रियता माना, पर जनता को लगा कि न्यायालय सही है। राजनीतिक चश्मे से देखने पर भ्रम की स्थिति हो सकती है। प्रश्न यह है कि जब संविधान की सत्ता सर्वोपरि है, तो उसके अनुपालन में शिथिलता क्यों होती है। राजनीतिक$-$दलगत स्वार्थ या निजी हित आड़े आ जाता है और यही भ्रष्टाचार को जन्म देता है।

हम कसमें खाते हैं जनकल्याण की और कदम उठाते हैं आत्मकल्याण के। ऐसे तत्वों से देश को, समाज को सदा खतरा रहेगा। अतः जब कभी कोई न्यायालय ऐसे फैसले देता है, जो समाज कल्याण के हों और राजनीतिक ठेकेदारों को उनकी औकात बताते हों, तो जनता को उसमें आशा की किरण दिखाई देती है। अन्यथा तो वह अंधकार में जीने को विवश है ही।

$(1)$ भ्रष्टाचार का जन्म कब और कैसे होता है $?$
$(2)$ जनता को आशा की किरण कहाँ और क्यों दिखाई देती है $?$
$(3)$ आईना दिखाने का तात्पर्य क्या है $?$ और न्यायपालिका कैसे आईना दिखाती है $?$
$(4)$ ‘चेहरे की विद्रूपता’ से क्या तात्पर्य है और यह संकेत किनके प्रति किया गया है $?$
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शिक्षा के क्षेत्र में पुनर्विचार की आवश्यकता इतनी गहन है कि अब तक बजट, कक्षा, आकार, शिक्षक$-$वेतन और पाठ्यक्रम आदि के परंपरागत मतभेद आदि प्रश्नों से इतनी दूर निकल गई है कि इसको यहाँ पर विवेचित नहीं किया जा सकता। द्वितीय तरंग दूरदर्शन तंत्र की तरह $($अथवा उदाहरण के लिए धूम्र भंडार उद्योग$)$ हमारी जनशिक्षा प्रणालियाँ बड़े पैमाने पर प्रायः लुप्त हैं। बिलकुल मीडिया की तरह शिक्षा में भी कार्यक्रम विविधता के व्यापक विस्तार और नये मार्गों की बहुतायत की आवश्यकता है।

केवल आर्थिक रूप से उत्पादक भूमिकाओं के लिए ही निम्न विकल्प पद्धति की जगह उच्च विकल्प पद्धति को अपनाना होगा यदि नई थर्ड वेव सोसायटी में शिष्ट जीवन के लिए विद्यालयों में लोग तैयार किए जाते हैं। शिक्षा और नई संचार प्रणाली के छह सिद्धांतों$-$पारस्परिक क्रियाशीलता, गतिशीलता, परिवर्तनीयता, संयोजकता, सर्वव्यापकता और सार्वभौमिकरण के बीच बहुत ही कम संबंध खोजे गए हैं।

अब भी भविष्य की शिक्षा पद्धति और भविष्य की संचार प्रणाली के बीच संबंध की उपेक्षा करना उन शिक्षार्थियों को धोखा देना है जिनका निर्माण दोनों से होना है। सार्थक रूप से शिक्षा की प्राथमिकता अब मात्र माता$-$पिता, शिक्षकों एवं मुट्ठी भर शिक्षा सुधारकों के लिए ही नहीं है, बल्कि व्यापार के उस आधुनिक क्षेत्र के लिए भी प्राथमिकता में है जब से वहाँ सार्वभौम प्रतियोगिता और शिक्षा के बीच संबंध को स्वीकारने वाले नेताओं की संख्या बढ़ रही है। दूसरी प्राथमिकता कंप्यूटर वृद्धि, सूचना तकनीक और विकसित मीडिया के त्वरित सार्वभौमीकरण की है।

कोई भी राष्ट्र $21$वीं सदी के इलेक्ट्रॉनिक आधारिक संरचना, एंब्रेसिंग कंप्यूटर्स, डाटा संचार और अन्य नवीन मीडिया के बिना $21$वीं सदी की अर्थव्यवस्था का संचालन नहीं कर सकता। इसके लिए ऐसी जनसंख्या की आवश्यकता है जो इस सूचनात्मक आधारिक संरचना से परिचित हो, ठीक उसी प्रकार जैसे कि समय के परिवहन तंत्र और कारों, सड़कों, राजमार्गों, रेलों से सुपरिचित है।

वस्तुतः सभी के टेलीकॉम इंजीनियर अथवा कंप्यूटर विशेषज्ञ बनने की ज़रूरत नहीं है, जैसा कि सभी के कार मैकेनिक होने की आवश्यकता नहीं है, परंतु संचार प्रणाली का ज्ञान कंप्यूटर, फैक्स और विकसित दूर संचार को सम्मिलित करते हुए उसी प्रकार आसान और मुफ्त होना चाहिए जैसा कि आज परिवहन प्रणाली के साथ है। अत: विकसित अर्थव्यवस्था चाहने वाले लोगों का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए कि सर्वव्यापकता के नियम की क्रियाशीलता को बढ़ाया जाए$-$वह है, यह निश्चित करना कि गरीब अथवा अमीर सभी नागरिकों को मीडिया की व्यापक संभावित पहुँच से अवश्य परिचित कराया जाए।

अंततः यदि नई अर्थव्यवस्था का मूल ज्ञान है तब सतही बातों की अपेक्षा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लोकतांत्रिक आदर्श सर्वोपरि राजनीतिक प्राथमिकता बन जाता है।

$(1)$ उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
$(2)$ लेखक का मुख्य उद्देश्य क्या है$?$
$(3)$ इस गद्यांश का मूल विषय क्या है$?$
$(4)$ सर्वव्यापकता का अर्थ बताइए।
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शिक्षा के क्षेत्र में पुनर्विचार की आवश्यकता इतनी गहन है कि अब तक बजट, कक्षा, आकार, शिक्षक$-$वेतन और पाठ्यक्रम आदि के परंपरागत मतभेद आदि प्रश्नों से इतनी दूर निकल गई है कि इसको यहाँ पर विवेचित नहीं किया जा सकता। द्वितीय तरंग दूरदर्शन तंत्र की तरह $($अथवा उदाहरण के लिए धूम्र भंडार उद्योग$)$ हमारी जनशिक्षा प्रणालियाँ बड़े पैमाने पर प्रायः लुप्त हैं। बिलकुल मीडिया की तरह शिक्षा में भी कार्यक्रम विविधता के व्यापक विस्तार और नये मार्गों की बहुतायत की आवश्यकता है।

केवल आर्थिक रूप से उत्पादक भूमिकाओं के लिए ही निम्न विकल्प पद्धति की जगह उच्च विकल्प पद्धति को अपनाना होगा यदि नई थर्ड वेव सोसायटी में शिष्ट जीवन के लिए विद्यालयों में लोग तैयार किए जाते हैं। शिक्षा और नई संचार प्रणाली के छह सिद्धांतों$-$पारस्परिक क्रियाशीलता, गतिशीलता, परिवर्तनीयता, संयोजकता, सर्वव्यापकता और सार्वभौमिकरण के बीच बहुत ही कम संबंध खोजे गए हैं।

अब भी भविष्य की शिक्षा पद्धति और भविष्य की संचार प्रणाली के बीच संबंध की उपेक्षा करना उन शिक्षार्थियों को धोखा देना है जिनका निर्माण दोनों से होना है। सार्थक रूप से शिक्षा की प्राथमिकता अब मात्र माता$-$पिता, शिक्षकों एवं मुट्ठी भर शिक्षा सुधारकों के लिए ही नहीं है, बल्कि व्यापार के उस आधुनिक क्षेत्र के लिए भी प्राथमिकता में है जब से वहाँ सार्वभौम प्रतियोगिता और शिक्षा के बीच संबंध को स्वीकारने वाले नेताओं की संख्या बढ़ रही है। दूसरी प्राथमिकता कंप्यूटर वृद्धि, सूचना तकनीक और विकसित मीडिया के त्वरित सार्वभौमीकरण की है।

कोई भी राष्ट्र $21$वीं सदी के इलेक्ट्रॉनिक आधारिक संरचना, एंब्रेसिंग कंप्यूटर्स, डाटा संचार और अन्य नवीन मीडिया के बिना $21$वीं सदी की अर्थव्यवस्था का संचालन नहीं कर सकता। इसके लिए ऐसी जनसंख्या की आवश्यकता है जो इस सूचनात्मक आधारिक संरचना से परिचित हो, ठीक उसी प्रकार जैसे कि समय के परिवहन तंत्र और कारों, सड़कों, राजमार्गों, रेलों से सुपरिचित है।

वस्तुतः सभी के टेलीकॉम इंजीनियर अथवा कंप्यूटर विशेषज्ञ बनने की ज़रूरत नहीं है, जैसा कि सभी के कार मैकेनिक होने की आवश्यकता नहीं है, परंतु संचार प्रणाली का ज्ञान कंप्यूटर, फैक्स और विकसित दूर संचार को सम्मिलित करते हुए उसी प्रकार आसान और मुफ्त होना चाहिए जैसा कि आज परिवहन प्रणाली के साथ है। अत: विकसित अर्थव्यवस्था चाहने वाले लोगों का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए कि सर्वव्यापकता के नियम की क्रियाशीलता को बढ़ाया जाए$-$वह है, यह निश्चित करना कि गरीब अथवा अमीर सभी नागरिकों को मीडिया की व्यापक संभावित पहुँच से अवश्य परिचित कराया जाए।

अंततः यदि नई अर्थव्यवस्था का मूल ज्ञान है तब सतही बातों की अपेक्षा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का लोकतांत्रिक आदर्श सर्वोपरि राजनीतिक प्राथमिकता बन जाता है।

$(1)$ शिक्षा की प्राथमिकता किन$-$किन के लिए है?
$(2)$ आज कैसी संचार प्रणाली का ज्ञान होना चाहिए।
$(3)$ इस गद्यांश का मूल विषय क्या है?
$(4)$ सर्वव्यापकता का अर्थ बताइए।
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सभी मनुष्य स्वभाव से ही साहित्य$-$स्रष्टा नहीं होते, पर साहित्य$-$प्रेमी होते हैं। मनुष्य का स्वभाव ही है सुंदर देखने का। घी का लड्डू टेढ़ा भी मीठा ही होता है, पर मनुष्य गोल बनाकर उसे सुंदर कर लेता है। मूर्ख$-$से$-$मूर्ख हलवाई के यहाँ भी गोल लड्डू ही प्राप्त होता है; लेकिन सुंदरता को सदा$-$सर्वदा तलाश करने की शक्ति साधना के द्वारा प्राप्त होती है। उच्छृखलता और सौंदर्य$-$बोध में अंतर है।

बिगड़े दिमाग का युवक परायी बहू$-$बेटियों के घूरने को भी सौंदर्य$-$प्रेम कहा करता है, हालाँकि यह संसार की सर्वाधिक असुंदर बात है। जैसा कि पहले ही बताया गया है, सुंदरता सामंजस्य में होती है और सामंजस्य का अर्थ होता है, किसी चीज़ का बहुत अधिक और किसी का बहुत कम न होना। इसमें संयम की बड़ी ज़रूरत है। इसलिए सौंदर्य$-$प्रेम में संयम होता है, उच्छृखलता नहीं।

इस विषय में भी साहित्य ही हमारा मार्ग$-$दर्शक हो सकता है। जो आदमी दूसरों के भावों का आदर करना नहीं जानता उसे दूसरे से भी सद्भावना की आशा नहीं करनी चाहिए। मनुष्य कुछ ऐसी जटिलताओं में आ फँसा है कि उसके भावों को ठीक$-$ठीक पहचानना हर समय सुकर नहीं होता। ऐसी अवस्था में हमें मनीषियों के चिंतन का सहारा लेना पड़ता है। इस दिशा में साहित्य के अलावा दूसरा उपाय नहीं है।

मनुष्य की सर्वोत्तम कृति साहित्य है और उसे मनुष्य पद का अधिकारी बने रहने के लिए साहित्य ही एकमात्र सहारा है। यहाँ साहित्य से हमारा मतलब उसकी सब तरह ही सात्त्विक चिंतन$-$धारा से है।

$(1)$ गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
$(2)$ साहित्य स्रष्टा और साहित्य प्रेमी से क्या तात्पर्य है$?$
$(3)$ लड्डू का उदाहरण क्यों दिया गया है$?$
$(4)$ लेखक ने संसार की सबसे बुरी बात किसे माना है और क्यों$?$
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        क              ख
Q.1. अजश्छागे हरे विष्णौ a. तदस्तेयं विदुर्बुधाः । 
Q.2. मृञ्जालाभ्यां विनिवृत्तिर्या b. रघुजे वेधसि स्मरे । 
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