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अपठित विभाग question types

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अपठित विभाग questions

One sample from each question group in this chapter. Select any group above to see the full set with answer keys.

हर किसी को आत्मरक्षा करनी होगी, हर किसी को अपना कर्तव्य करना होगा। मैं किसी की सहायता की प्रत्याशा नहीं करता। में किसी का भी प्रत्याह नहीं करता। इस दुनिया से मदद की प्रार्थना करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। अतीत में जिन लोगों ने मेरी मदद की है या भविष्य में भी जो लोग मेरी मदद करेंगे, मेरे प्रति उन सबकी करुणा मौजूद है, उसका दावा कभी नहीं किया जा सकता। इसलिए मैं सभी लोगों के प्रति चिर कृतज्ञ हूँ। तुम्हारी परिस्थिति इतनी बुरी देखकर मैं बेहद चिंतित हूँ। लेकिन यह जान लो कि- 'तुमसे भी ज्यादा दुखी लोग इस संसार में हैं। मैं तुमसे भी ज्यादा बुरी परिस्थिति में हूँ। इंग्लैंड में सब कुछ के लिए मुझे अपनी ही जेब से खर्च करना पड़ता है। आमदनी कुछ भी नहीं है। लंदन में एक कमरे का किराया हर सप्ताह के लिए तीन पाउंड होता है। ऊपर से अन्य कई खर्च हैं। अपनी तकलीफों के लिए मैं किससे शिकायत करूँ? यह मेरा अपना कर्मफल है, मुझे ही भुगतना होगा।'

(विवेकानंद की आत्मकथा से)
(1) संजाल पूर्ण कीजिए:
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(2) उत्तर लिखिए :
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(3)निम्नलिखित शब्दों के विरुद्धार्थी शब्द लिखिए :
(i) प्रत्यक्ष x ..........
(ii) धनवान x ..........
(iii) ऊँचा x ..........
(iv) दुर्भाग्य x ..........
(4) 'कृतज्ञता' के संबंध में अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए।
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सन 1897 में भारत में महामारी का प्रकोप हुआ। स्वामी विवेकानंद ने देश सेवा व्रती संन्यासियों की एक छोटी-सी मंडली बनाई। यह मंडली तन-मन से दीन-दुखियों की सेवा करने लगी। ढाका, कोलकाता, चेन्नई आदि में सेवाश्रम खोले गए। वेदांत के प्रचार के लिए जगह-जगह विद्यालय स्थापित किए गए। कई अनाथालय भी खोल दिए गए।
ये सभी कार्य स्वामी जी के निरीक्षण में हो रहे थे। उनका स्वास्थ्य काफी बिगड़ गया था, फिर भी वह स्वयं घर-घर घूमकर पीड़ितों को आश्वासन तथा आवश्यक सहायता देते रहते थे। जिन मरीजों को देखकर डॉक्टर भी भाग जाते थे, उनकी सहायता करने में स्वामी जीऔर उनके अनुयायी कभी पीछे नहीं हटे।
(1) तालिका पूर्ण किजिए:
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(2) 'सेवाभाव का महत्त्व' विषय पर 25 से 30 शब्दों में अपने विचार लिखिए।

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मनुष्य का जीवन संसार के छोटे-बड़े प्राणियों और पदार्थों में श्रेष्ठ माना गया है। वह इसलिए कि मनुष्य बड़ा बुद्धिमान और कल्पनाशील प्राणी है। अपने विचारों के बल पर ही वह जो चाहे कर सकता है और बहुत ऊँचा उठ सकता है। परंतु विचार सच्चे, सादे और पवित्र होने के साथ-साथ मनुष्य के व्यावहारिक जीवन से संबंध रखने वाले होने चाहिए। इन्हीं बातों को आधार बनवाकर सादा जीवन, उच्च विचार' को मानव जीवन की सफलता की सीढ़ी माना
गया है। सादगी मनुष्य के पहनावे से नहीं बल्कि उसके प्रत्येक हाव- भाव, विचार तथा जीवन के ढंग से टपकनी चाहिए। यहीं वास्तविक सादगी है, जो विचारों को भी उच्च बनाकर सब प्रकार की उन्नति और विकास का कारण बनती है।
(1) उत्तर लिखिए।:
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(2) 'सादा जीवन उच्च विचार' विषय पर अपने विचार 25 से 30 शब्दों में लिखिए।
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पलाश बबूल के समान गोंद उत्पन्न करने वाला वृक्ष है। इसके गोंद को लाख या कमरकस भी कहते हैं। इस बहुपयोगी वृक्ष के विभिन्न अंगों का उपयोग औषधि निर्माण के साथ-साथ अन्य कार्यों में भी किया जाता है। पलाश की लकड़ी से छोटे-छोटे तख्ते, कुएँ के चाक आदि बनाए जाते हैं। इसका तना बेडौल होता है। अतः इसका उपयोग बड़े कामों में नहीं किया जाता। पलाश की लकड़ी जलाने के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है। इसका कोयला शीघ्र आग पकड़ लेता है। इसका उपयोग गनपावडर के रूप में किया जाता है। पलाश के फूल पानी में घुलकर केसरिया रंग देते हैं। फूलों को रातभर पानी में भिगोकर अगले दिन उबालकर छान लेते हैं। यह पानी त्वचा को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुँचाता क्योंकि इसमें रसायन नहीं होते। गाँवों-कस्बों में आज भी होली के समय पलाश के फूलों से तैयार किए गए रंग से ही होली खेली जाती है। दक्षिण भारत में स्त्रियाँ पलाश के फूलों से शृंगार करना पसंद करती हैं। पलाश के पत्ते हाथियों के प्रिय आहार हैं।
(1) i.आकृति पूर्ण कीजिए :
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ii.गद्यांश में दिए गए गोंद उत्पन्न करने वाले दो वृक्ष -
(a) _____________ (
b) _____________
(2) 'होली के रंगो में रसायनों का प्रयोग' विषय पर अपने विचार 25 से 30 शब्दों में व्यक्त कीजिए।
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राजकुमार का घोड़ा बेदम हो गया था। संन्यासी ने मृग के मृत शरीर को कंधे पर ऐसे उठा लिया मानो घास का गट्ठर हो। राजकुमारसंन्यासों के पीछे चला। उसे संन्यासी के शारीरिक बल पर अचंभाहो रहा था। आधे घंटे तक दोनों चुपचाप चलते रहे। इसके बादढालू भूमि मिलनी शुरू हुई। वहीं कदंबकुंज की धनी छाया में,जहाँ सर्वदा मृगों की सभा सुशोभित रहती, नदी की तरंगों का मधुरस्वर सर्वदा सुनाई दिया करता, जहाँ हरियाली पर मयूर थिरकता,कपोतादि पक्षी मस्त होकर झूमते, लता द्रुमादि से सुशोभित संन्यासीकी एक छोटी-सी कुटी थी। वह कुटी हरे-भरे वृक्षों के नीचे सरलताऔर संतोष का चित्र बना रही थी। राजकुमार की अवस्था वहाँ पहुँचते ही बदल गई। यहाँ की शीतल वायु का प्रभाव उस पर ऐसापड़ा जैसा मुरझाते हुए वृक्षों पर वर्षा का उसे आज विदित हुआ कितृप्ति केवल कुछ स्वादिष्ट व्यंजनों पर ही निर्भर नहीं है और न निद्राको सुनहरे तकियों की ही आवश्यकता है।
(1) आकृति पूर्ण कीजिए:
i.
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ii.
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(2) 'वनों का महत्त्व' इस विषय पर अपने विचार 25 से 30 शब्दों में व्यक्त कीजिए।
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