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प्रश्नों के उत्तर सविस्तार लिखिए : ( 4 गुण )

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Question 14 Marks
खनिज मिश्रण के महत्व व पूर्ति हेतु क्या करना चाहिए?
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 24 Marks
दानों के विभिन्न मिश्रण तालिका दर्शायें।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 34 Marks
दुधारू गाय के आहार का वर्णन करो।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 44 Marks
आहार के मुख्य कार्य बताइए।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 54 Marks
हे' बनाने के लिए कौन-कौन सी फसलें प्रयोग की जा सकती हैं? उत्तम 'हे' के गुणों का वर्णन कीजिए।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 64 Marks
साइलेज किसे कहते हैं? इसके लाभ, हानि एवं इसके लिए उपयुक्त फसल का वर्णन कीजिए।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 74 Marks
'हे' किसे कहते हैं ? 'हे' बनाने की विधि को स्पष्ट कीजिए।
Answer
'हे' यह एक प्रकार का ऐसा सूखा चारा है जिसमें पानी की मात्रा कम होती है तथा पोषक तत्वों की मात्रा उस फसल से अधिक होती है जिस फसल से 'हे' तैयार की जाती है। एक उत्तम प्रकार की 'हे' हरे रंग की, पत्तियों युक्त मुलायम तथा उत्तम गन्ध युक्त होती है।
'हे' बनाने की विधि-
'हे' मुख्य रूप से दो विधियों से बनाई जाती है-
(अ) खेत में हे बनाना (ब) शस्यागार शोषण विधि।
इनका संक्षिप्त विवेचन निम्न प्रकार है-
(अ) खेत में 'हे' बनना- खेत में 'हे' बनाने की विधि निम्न प्रकार है-
(1) समतल भूमि पर तैयार करना- 'हे' बनाने के लिए फसल को जब इस पर फूल आ रहा हो सुबह के समय ओस हट जाने के बाद काटकर खेत में फैला देना चाहिए। फसल को 9"-12" मोटी तह के रूप में सम्पूर्ण खेत में फैलाते हैं। समय-समय पर इसे पटकते रहना चाहिए। जब जल की मात्रा लगभग 14 प्रतिशत हो तो इसे ऐसे स्थान पर इकट्ठा करना चाहिए जहाँ वर्षा का बचाव हो।
(2) शोष पंक्तियों को तैयार करना-फसल को खेत में एक दिन तक समतल पड़ी रहने के बाद से पूरे क्षेत्र में छोटी-छोटी ढेरियों के रूप में इकट्ठा करते हैं, समय-समय पर उलटते रहना चाहिए।
(3) तिपाई विधि-तराई वाले क्षेत्रों में जहाँ वर्षा अधिक होती है वहाँ फसल को तिपाये गाड़कर उन पर फैला देते हैं। इस प्रकार ये हवा और धूप से सूख जाती हैं।
(ब) शस्यागार शोषण विधि-मौसम की प्रतिकूलता होने के परिणामस्वरूप जहाँ 'हे' खेतों में नहीं तैयार की जा सकती वहाँ 'हे' निर्माण कार्य के लिए शस्यागार शोषण विधि अपनायी जाती है। यह शोषण की कृत्रिम विधि है जिसमें यांत्रिक सहायता लेनी पड़ती है। शस्यागार के फर्श में नालियाँ बनी होती हैं जिनके द्वारा गर्म वायु का अन्दर प्रवेश कराया जाता है। यह बिजली द्वारा अथवा तेलीय ईंधन से चालू किया जा सकता है। पहले फसल को थोड़े समय तक खेत में ही सुखाया जाता है ताकि जल की मात्रा 25 प्रतिशत शस्यागार में आते समय हो क्योंकि इस विधि में अधिक खर्च होगा। इस विधि से तैयार की गई 'हे' में विटामिन ए की मात्रा अधिक रहती है। परन्तु किण्वीकरण द्वारा पोषक तत्वों की हानि अधिक हो जाती है।
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Question 84 Marks
साइलेज किसे कहते हैं? साइलेज बनाने की विधि का वर्णन कीजिए।
Answer
साइलेज-साइलेज वह दबा हुआ चारा है जिसमें हरे चारे के सभी तत्त्व मौजूद होते हैं तथा इसमें किसी प्रकार की सड़न अथवा बुरी गन्ध उत्पन्न नहीं हुई होती है साथ ही इसमें रसीलापन होता है।
साइलेज बनाने की विधि
साइलेज बनाने की क्रिया को साइलोइंग अथवा इन्साइलिंग कहते हैं। साइलेज बनाने हेतु हरे चारे को गड्ढों, नालियों अथवा बुर्जों में दबाया जाता है। जिन गड्ढों, नालियों अथवा बुर्जों में हरा चारा दबाकर भरा जाता है उन्हें साइलो कहते हैं। साइलो कई प्रकार के होते हैं। इनका चलन उस स्थान जलवायु कृषक की आर्थिक दशा तथा पानी के तल के ऊपर निर्भर रहते हैं। साइलो निम्न प्रकार के होते हैं-
(1) साइलो बुर्ज जमीन के ऊपर बनाये जाते हैं।
(2) साइलो खाई भूमि के नीचे बनाये जाते हैं।
(3) साइलो गर्त गोल या चौकोर गड्ढा होता है।
साइलो गर्त तथा खाई जमीन के नीचे तथा साइलो बुर्ज जमीन से ऊपर बनाये जाते हैं। साइलो गर्त तथा खाइयाँ कच्ची अथवा पक्की दोनों प्रकार की बनायी जाती हैं। भूमि के ऊपर बुर्ज, लकड़ी, ईंट व सीमेंट से बनाये जाते हैं। इसमें हवा का प्रवेश नहीं होना चाहिए। इसमें बीच-बीच में दरवाजे बनाये जाते हैं तथा ऊपर छप्पर बनाया जाता है।
भारतवर्ष में प्रायः भूमि के नीचे साइलो गर्त व खाइयाँ बनाई जाती हैं। इसकी लम्बाई, चौड़ाई व गहराई पशुओं की संख्या, खिलाने का समय एवं साइलेज की आवश्यक मात्रा के अनुसार रखा जाता है। गहराई उस स्थान के पानी के स्तर का ध्यान रखकर रखी जाती है, जिन स्थानों पर पानी बहुत कम गहराई पर ही होता है वहाँ बुर्ज बनाये जाते हैं।
साइलो पिट प्रायः 8' x 5' x 4' के बनाये जाते हैं तथा साइलो बुर्ज 8'-10' व्यास वाले 20'-22' ऊँचे बनाये जाते हैं। खाइयाँ प्रायः 8' गहरी, 7'-8' चौड़ी बनाई जाती हैं।
गड्ढों का भरना-अपने देश में साइलेज गड्‌ढों में ही बनाया जाता है। अतः गड्ढों का वर्षा से बचाव रखा जाता है। फसल को फूल आने की अवस्था में काटा जाता है। अधिक बढ़ जाने पर रेशा की मात्रा बढ़ जाती है और पाचक तत्त्व घट जाते हैं। फसल को सुबह काटकर पूरे दिन खेत में छोड़ देते हैं ताकि नमी अधिक मात्रा में कम हो जाए। फसल के गठ्ठर बनाकर इन्हें गड्ढे में बिछाया जाता है। सबसे नीचे कुछ घास बिछा देते हैं। फसल को मशीन से काट-काट कर भरना उत्तम रहता है।
गड्ढों में फसल को भरते समय खूब दबाया जाता है ताकि बीच-बीच में हवा न रह जाए। चारे को जमीन की सतह से 5'-6' ऊँचा भरना चाहिए, क्योंकि बाद में इसका स्तर कम हो जाता है। अन्त में ऊपर से कुछ घास डालकर इसे मिट्टी से लीपकर बन्द कर दिया जाता है जिससे कि कहीं से वायु एवं जल का प्रवेश न हो सके।
जब हरी फसल को काटकर गड्‌ढों में दबाया जाता है तो पौधों की जीवित कोशिकाएँ श्वासोच्छ्वास क्रिया करती हैं। वे गड्ढे में बची ऑक्सीजन का प्रयोग कर कार्बन-डाइ-ऑक्साइड विसर्जित करती हैं। इस प्रकार 5 घंटे में जब ऑक्सीजन काम आ जाती है और गड्ढे में लगभग 70-80 प्रतिशत कार्बन-डाइ-ऑक्साइड की उपस्थिति होने पर फफूँदी उत्पन्न नहीं होती है। यदि गड्‌ढों अथवा बुर्ज में कहीं से वायु प्रवेश कर जाती है तो फफूँदी उत्पन्न होकर चारा सड़ा देती है।
वायु की अनुपस्थिति में बढ़ने वाले जीवाणु अपनी संख्या में बढ़ते हैं। ये पौधों में मौजूद शर्करा पर क्रिया कर कार्बनिक अम्ल मुख्यतः दुग्धाम्ल उत्पन्न करते हैं, इसके अतिरिक्त ऐसिटिक अम्ल व इथाइल एल्कोहल भी उत्पन्न होते हैं। इन अम्लों के उत्पन्न होने से सड़न पैदा करने वाले जीवाणु अपनी वृद्धि नहीं कर पाते हैं। जिन चारों में शर्करा कम होते हैं उनमें अम्ल कम बनने से सड़न वाले जीवाणु अपनी वृद्धि कर जाते हैं। यदि शर्करा अधिक होता है तो साइलेज अधिक खट्ट्टा बनता है। कुछ समय बाद इन अम्लों का बनना रुक जाता है, क्योंकि अम्ल बनाने वाले शुक्राणु अधिक अम्ल बन जाने पर स्वयं वृद्धि करना बन्द कर देते हैं। साइलेज में रासायनिक परिवर्तन बन्द हो जाते हैं। यदि इस समय भी हवा अन्दर चली जाती है तो साइलेज सड़ जाता है अन्यथा काफी समय तक सुरक्षित बना रहता है। अम्ल का उत्पादन पौधों में शर्करा की मात्रा साइलेज बनाने के लिए पर्याप्त होती है।
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Question 94 Marks
पशुओं के अच्छे आहार के प्रमुख गुण बताइए।
Answer
पशुओं के अच्छे आहार के गुण
पशुओं के अच्छे आहार के निम्न गुण होने चाहिए-
(1) आहार सन्तुलित हो अर्थात् पशु की आवश्यकता के अनुसार सभी अवयव कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण व विटामिन समुचित मात्रा में आहार में हों।
(2) पशु आहार स्वादिष्ट हो एवं सन्तुष्टि प्रदान करने वाला हो जिससे पशु इच्छा से खा सके। इसके लिए पशु आहार में हरे चारे दाने व सूखे चारे को सम्मिलित करना चाहिए।
(3) आहार सुपाच्य होना चाहिए। इसके लिए हरे चारों को पशु आहार में सम्मिलित किया जाना चाहिए। इसमें पशु को सुपाच्य आहार के साथ उचित पोषक तत्त्व भी मिल सकेंगे।
(4) आहार में समुचित रेशे की मात्रा होनी चाहिए। जिसमें पशु के पेट भरने का आभास होता है।
(5) आहार सस्ता व सुगमता से उपलब्ध होने वाला होना चाहिए। जिससे पशु के आहार की लागत कम हो सके एवं आहार में हरे चारे व दानों को सम्मिलित कर कम मूल्य में अधिक पोषक तत्त्व प्राप्त कर सकते हैं।
(6) आहार में विभिन्नता होनी चाहिए। पशु की पसन्द व मौसम के अनुसार आहार बदलते रहना चाहिए।
(7) आहार विरेचक होना चाहिए। पशु आहार में साइलेज, हरे चारे व गेहूँ का चोकर विरेचक के रूप में जाने जाते हैं।
(8) भोजन में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन होनी चाहिए।
(9) आहार में खनिज लवणों को विशेष महत्त्व देना चाहिए। दूध देने वाली गाय को कैल्सियम प्रचुर मात्रा में मिलता रहना चाहिए।
(10) पशु को साफ पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध करवाया जाना चाहिए।
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Question 104 Marks
पशु को आहार देते समय किन बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए?
Answer
पशु को आहार देते समय निम्न प्रमुख बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए-
(1) हमें पशु को स्नेह एवं उदारतापूर्वक आहार देना चाहिए।
(2) पशुओं को नियमित रूप से सन्तुलित आहार देना चाहिए।
(3) हमें पशु को दिनभर में 10 घण्टे के अन्तराल से दो बार आहार देना चाहिए ताकि उसका स्वास्थ्य सही रहे। हमें पशुओं को निश्चित समय पर आहार देना चाहिए।
(4) हमें पशुओं को पूरे वर्ष अधिक से अधिक हरा चारा उपलब्ध करवाना चाहिए।
(5) प्रत्येक श्रेणी के पशुओं को अलग-अलग आहार उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
(6) पशुओं को चारा-दाना रोजाना नियमित अन्तराल पर ही दिया जाना चाहिए।
(7) पशुओं के आहार में हरा चारा, भूसा, दाना तथा खनिज आदि सभी मिला हो ताकि उन्हें सभी आवश्यक अवयव उपलब्ध हो सकें।
(8) पशुओं को आहार में पोषक तत्त्व उनकी शरीर की आवश्यकताओं के अनुसार ही दिये जाने चाहिए, आवश्यकता से कम या अधिक खिलाना दोनों ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।
(9) चारा वाली नाँद या द्रोण आहार देने से पहले पूर्णतः साफ कर लेनी चाहिए ताकि उसमें बची गंदगी साफ हो जाये।
(10) पशुओं का आहार एक आदर्श आहार हो जो संतुष्टि प्रदान करने वाला उचित मात्रा में पोषक तत्त्व, पाचक, स्वास्थ्यवर्धक, दूध में उत्तम सुगन्ध पैदा करने वाला, विभिन्न खाद्य पदार्थों सहित, स्थूल, सन्तुलित तथा सस्ता होना चाहिए।
(11) चारे में परिवर्तन या आहार के प्रकार में परिवर्तन धीरे-धीरे करें। एकदम आहार में बदलाव हानिकारक होता है।
(12) प्रति गाय व भैंस को प्रतिदिन हरे चारे की मात्रा 15 से 20 कि.ग्रा. चारे की किस्म, रसीलापन, पाचकता तथा पशु की आवश्यकता के अनुसार देना चाहिए।
(13) पशुओं को कभी भी खाली पेट केवल फलीदार हरे चारे न खिलाये जायें इससे आफरा होने का भय रहता है। अतः इनके साथ सूखा चारा भी खिलाया जाना चाहिए।
(14) पशु की आवश्यकता पूर्ति के लिए चारा कम करके दाना अधिक नहीं खिलाना चाहिए क्योंकि यह आर्थिक रूप से सही नहीं। ज्यादा चारा व कम दाना एक अच्छा सस्ता उपाय है।
(15) 'हे' या पुआल या भूसा जैसे धूलमय चारे दूध निकालते समय नहीं खिलायें, इससे बाड़े में धूलमय वातावरण होने के कारण दूध के अन्दर जीवाणु की संख्या बढ़ने से दूध की किस्म खराब होने का भय रहता है।
(16) ज्यादातर पशुपालक गायों को दूध निकालते समय खाना खिलाना पसंद करते हैं। इससे दूध अयन में जल्दी उतर आता है।
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Question 114 Marks
पशुओं का आहार किस प्रकार तैयार किया जाता है ?
Answer
पशु आहार तैयार करना
पशु का आहार तैयार करते समय हमें काफी सावधानी रखनी पड़ती है। पशु का आहार पर्याप्त एवं पौष्टिक होना चाहिए तथा उसमें चारे व दानों का सही अनुपात होना चाहिए। पशु आहार उसकी नाँद में सही प्रकार से मिलाना चाहिए तथा पशु आहार बारीक होना चाहिए। हमें इस प्रकार का आहार तैयार करना चाहिए जो आसानी से उपलब्ध हो एवं ज्यादा महँगा भी न हो।
पशु का आहार निम्न प्रकार तैयार किया जा सकता है-
(1) चारे की कुट्टी बनाना- रोमांथी पशुओं को जब हरा चारा मक्का व ज्वार के चारे को खिलाया जाए तो कुट्टी कर लेना अच्छा रहता है। जिससे तने व डंठलों का सदुपयोग हो जाता है। सूखी कड़बी को भी कु‌ट्टी बनाकर हरे चारे की कुट्टी के साथ मिलाकर खिलाना चाहिए। ज्यादा बारीक कुट्टी बूढ़े व घिसे दाँत वाले पशुओं को ही खिलानी चाहिए।
(2) दानों का दलिया बनाना- कुछ बीज रूप दानों की ऊपरी परत इतनी कठोर होती है कि वह आसानी से पच नहीं पाती है अतः इनको सीधे खिलाने पर गोबर में वैसे ही निकल जाते हैं। अनाजों का दलिया बनाकर भिगोकर देना चाहिए। मध्यम आकार का दलिया खिलाना लाभदायक रहता है।
(3) आहार की टिकियाँ या गोलियाँ बनाकर पशुओं को खिलाना-'हे' को गोलियों के रूप में खिलाने से पशु चाव से खाता है एवं 'हे' को संग्रहण के लिए अधिक स्थान की भी आवश्यकता नहीं रहती। गोलियाँ बनाते समय 'हे' व दाने के बारीक मिश्रण को मिलाकर इन्हें तैयार किया जाता है, इससे पशु आहार ज्यादा खाता है पशु शरीर की वृद्धि भी होती हैं।
आहार को पकाना-पशुओं को चारा सीधे काट कर खिलाना अच्छा होता है जबकि दाना सीधे नहीं खिलाना चाहिए। इसे रातभर भिगोकर या गर्म कर खिलाने से अधिक लाभ प्राप्त होता है। सोयाबीन को पकाकर के पशुओं को देना चाहिए।
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