ऊतक संवर्धन द्वारा कृषि, उद्यान तथा वानिकी के लिए उपयुक्त पादप सामग्री के त्वरित गुणन को सूक्ष्म प्रवर्धन कहते हैं। सूक्ष्म प्रवर्धन द्वारा पादपों के उत्पादन के मुख्य लाभ इस प्रकार हैं-
(1) बहु प्ररोहिका उत्पादन (Multiple Shootlet Production)-प्ररोह शिखाग्र को संवर्धित करके, किसी विलक्षण पौधे या संकर की अनेक प्रतिकृतियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। विशिष्ट उपचारों के फलस्वरूप कैलस के बजाय अनेक कलिकाएँ बनती हैं, जिन्हें उगाकर प्ररोह प्राप्त किये जा सकते हैं, जिनमें हार्मोनों की सहायता से जड़ों के निर्माण को प्रेरित कर सकते हैं। आलू, इलायची, केला, क्रिसेन्थिमम आदि के प्रवर्धन में इससे काफी सहायता मिली है।
(2) कायिक भ्रूण विकास (Somatic Embryogenesis)- कायिक भ्रूण या एम्ब्रयॉयड (embryoids) वे भ्रूण हैं जो ऊतक संवर्धन में कायिक कोशिकाओं से विकसित होते हैं। ये उन सभी प्रावस्थाओं में से गुजरते हैं, जिनमें से लैंगिक जनन के फलस्वरूप उत्पन्न भ्रूण गुजरते हैं। थोड़े से संवर्धन माध्यम से गाजर के हजारों एम्ब्रयॉयड प्राप्त किये जा सकते हैं, जिनसे पौधे विकसित किये जा सकते हैं।
(3) रोग-मुक्त पौधों के उत्पादन में (Production of Disease-free Plants) कायिक प्रवर्धन करने वाले पौधों में रोगाणु विषाणुओं का संचरण आसानी से प्रवर्ध्य (Propagules) द्वारा होता है। ऐसा पाया गया है कि रोगग्रस्त पौधे प्ररोह शीर्ष के विभज्योतक की कोशिकाओं में रोगाणु नहीं होते। इन कोशिकाओं के संवर्धन से आलू, गन्ना, स्ट्राबेरी इत्यादि अनेक पौधों को रोगमुक्त अवस्था में प्राप्त किया जाता है।
(4) पुंजनिक अगुणित पौधों की प्राप्ति (Production of Androgenic Haploids)- अगुणित पौधों का पादप प्रजनन कार्यक्रमों में काफी महत्त्व है। आप जानते हैं कि शुद्ध (समजात) पौधों को प्राप्त करना अति कठिन काम है। कई पीढ़ियों तक स्वपरागण कराना पड़ता है। परन्तु ऊतक संवर्धन द्वारा यह काफी सरल हो गया है। आप जानते हैं कि प्रत्येक परागकोष में कई हजार अगुणित कोशिकाएँ (परागकण) होती हैं। इनको संवर्धित करके, इनसे अगुणित पौधे प्राप्त किये जाते हैं। कोलचिसिन की सहायता से इनके गुणसूत्रों को दुगुना करके समजात द्विगुणित पौधे भी प्राप्त किए जा सकते हैं। इस प्रकार समजात विभेदों की प्राप्ति के लिए लम्बे समय तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। सर्वप्रथम गुहा एवं माहेश्वरी (Guha and Maheshwari, 1965) ने धतुरा इनोक्सिया (Datura inoxia) के पुंजनिक अगुणित पौधे प्राप्त किए थे।
(5) भ्रूण रक्षा (Embryo Rescue)- अन्तर्जातीय संकरण के फलस्वरूप उत्पन्न भ्रूण की प्रायः मृत्यु हो जाती है तथा बीज बेकार हो जाता है। नव-उत्पन्न भ्रूण को निकालकर, उसे संवर्धित करके बचाया जा सकता है।
(6) उत्परिवर्तनों का प्रेरण व चयन (Induction and Selection of Mutants)- कोशिकाओं को तरल संवर्धन माध्यम से उगाकर अच्छी तरह हिलाया जाता है ताकि कोशिकाएँ माध्यम में निलंबित हो जायें। तत्पश्चात् इन कोशिकाओं की विभिन्न पैट्रीडिशों में ऐसे संवर्धन माध्यम पर स्थानान्तरित कर देते हैं, जिनमें उत्परिवर्तक प्रेरक रसायन हो। प्राप्त उत्परिवर्तक में से लाभदायक विभेदकों को चुन लिया जाता है।
इसी प्रकार माध्यम में अपतृणनाशक, लवण आदि डालने से सभी कोशिकाओं की मृत्यु हो जायेगी। केवल वे बच पायेंगी जो इनका प्रतिरोध कर सकती हैं। उनसे पौधे की रोधी किस्में विकसित की जा सकती हैं।
(7) जीवद्रव्यक संलयन (Protoplast Fusion)-इस विधि से ऐसे पौधों के संकर तैयार किये जा सकते हैं, जिनके बीच लैंगिक प्रजनन संभव नहीं है। पौधों की कोशिकाओं से एंजाइम की सहायता से कोशिका भित्ति हटा दी जाती है तथा जीवद्रव्य को संवर्धन माध्यम में उगाया जाता है। इससे पूर्व कि कोशिका भित्ति पुनः बने दोनों जातियों तथा उपजातियों के जीवद्रव्यकों को पॉलिइथाइलीन ग्लाइकोल (PEG) अथवा अन्य उपयुक्त पदार्थों की सहायता से संलयन करा दिया जाता है। इन संकर जीवद्रव्यकों को संवर्धित करके उनसे संकर पौधे प्राप्त किये जाते हैं। आलू तथा टमाटर का संकर पोटोमेटो इसका अच्छा उदाहरण है।