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Question 14 Marks
जैव-विविधता के जैविक संगठन के स्तर के नाम लिखिए।
Answer
किसी क्षेत्र विशेष में पायी जाने वाली प्रजातियों की अधिकता या जैव समृद्धि को जैव-विविधता कहते हैं। जैव-विविधता से तात्पर्य किसी परिभाषित क्षेत्र में पाये जाने वाली सभी समष्टियों, प्रजातियों एवं समुदायों से हैं।
जैव-विविधता को तीन श्रेणीबद्ध स्तरों पर व्यक्त किया जाता है-
1. आनुवंशिक विविधता - किसी प्रजाति विशेष में आनुवंशिक विभिन्नता या जीनों की कुल संख्या या बहुरूपिता आनुवंशिक विविधता कहलाती है।
2. प्रजातीय विविधता - किसी क्षेत्र विशेष में पाये जाने वाली प्रजातियों की कुल संख्या या प्रजातीय समृद्धि प्रजाति विविधता कहलाती है।
3. पारिस्थितिकीय विविधता - पारिस्थितिकीय विविधता से तात्पर्य किसी क्षेत्र में पाये जाने वाले तरह-तरह के पारिस्थितिक तंत्रों से हैं। जैसे-रेगिस्तान, वर्षा वन, गरान (मैग्रूव), प्रवाह भित्ति (कोरल रीफ), वैट लैन्ड, एस्चुअरी आदि से हैं। जैव विविधता। संकल्पना यह दर्शाती है कि जैव विविधता का ताना-बाना बहुत ही संवेदनशील होता है तथा इसकी किसी एक कड़ी को यदि प्रभावित किया जाता है तो इसका ज्यामितीय प्रभाव नजर आता है। इसका एक उदाहरण, किसी पारिस्थितिक तंत्र में किसी एक प्रजाति के समाप्त हो जाने से उसके सह-अस्तित्व में रहने वाली कई प्रजातियों के विलुप्तीकरण से समझा जा सकता है। प्राकृतिक आवास के सिकुड़ने तथा खण्डीकरण से कई जातियों के विलुप्तीकरण को खतरे के रूप में देखा जा सकता है। जैव विविधता को हानि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की अस्थिरता एवं असंतुलन को बढ़ावा देता है।
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Question 24 Marks
स्व-स्थाने संरक्षण के विभिन्न प्रकारों की सूची बनाइए तथा बायोस्फीयर रिजर्व का वर्णन कीजिए।
Answer
स्व-स्थाने संरक्षण के प्रकार -
(i) बायोस्फीयर रिजर्व , (ii) राष्ट्रीय पार्क
(iii) वन्यजीव अभयारण्य , (iv) पवित्र उपवन
(v) रामसर स्थल , (vi) संरक्षण रिजर्ब्स, सामुदायिक रिजर्ब्स ।
बायोस्फीयर रिजर्व - बायोस्फीयर रिजर्व का विचार यूनेस्को के मैन एंड बायोस्फीयर कार्यक्रम के अधीन 1973-74 में प्रकाश में आया। भारत में बायोस्फीयर रिजर्व कार्यक्रम 1986 में प्रारम्भ हुआ। प्रत्येक बायोस्फीयर रिजर्व एक विशिष्टीकृत व सूचीबद्ध संरक्षित क्षेत्र है। इसके कुछ भाग को छोड़कर अन्य भागों में किये जा सकने वाले (स्वीकृत) कार्यों हेतु स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं। इसमें सभी कार्य इस प्रकार सम्पन्न किए जाते हैं कि संरक्षण की भावना सर्वोपरि रहे।
बायोस्फीयर रिजर्व का बीच का (केन्द्रीय) भाग कोर जोन कहलाता है। इसमें किसी भी प्रकार के मानवीय दखल की अनुमति नहीं होती। कोर के चारों ओर का भाग बफर जोन कहलाता है। बफर जोन में सीमित मानवीय क्रियाकलाप स्वीकृत होते हैं, यदि वह संरक्षण प्रयासों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालते। सबसे बाहर का क्षेत्र ट्रांजीशन जोन कहलाता है। इसमें मानवीय क्रियाकलापों की सशर्त अनुमति होती है। आज भारत में 19 बायोस्फीयर रिजर्व हैं। इनमें से 8 बायोस्फीयर रिजर्व विश्व के बायोस्फीयर रिजर्व तंत्र का भाग हैं।
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Question 34 Marks
किसी भौगोलिक क्षेत्र में प्रजातियों की क्षति के मुख्य कारण क्या हैं?
Answer
प्रजाति क्षति या जैव-विविधता में क्षति के कारणों को 'पातकी चौकड़ी' नाम दिया गया है। ये निम्नलिखित हैं -
(i) पर्यावास क्षति तथा विखण्डन- जैव विविधता में क्षति का प्रमुखतम कारण पर्यावासीय क्षति तथा विखण्डन है। सभी प्रकार के पर्यावरणों में पर्यावासीय क्षति देखी गयी है लेकिन उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन तथा कोरल रीफ में हुई क्षतियों से प्रजातियों की बड़े पैमाने पर क्षति हुई है। 14 प्रतिशत भू-भाग पर फैले वर्षा वन अब मात्र 6 प्रतिशत भाग पर सिमट गये हैं। यह जीव विविधता के समृद्धतम क्षेत्रों में से एक है जो अब क्षरित हो रहे हैं। बड़े पर्यावासों को छोटा कर देने से, जैसे किसी बड़े वन के बीच सड़क के निर्माण से भी बड़ी प्रजाति क्षति होती है। यह पर्यावासों का खण्डन कहलाता है। अनेक स्तनधारी व पक्षी प्रजाति की बड़ी 'होम रेंज' व 'टेरिटरी' इससे परिवर्तित हो जाती है या सीमित हो जाती है। अतः उनके जीवन के लिए संकट उत्पन्न हो जाता है।
प्रदूषण ने पर्यावास क्षति को और गम्भीर बनाया है।
(ii) अति दोहन - मनुष्य के लालच, उसकी बढ़ती इच्छाओं, अनैतिक धनार्जन की चाह में भी अनेक प्रजाति विलुप्त हुई हैं। पिछले 500 वर्षों में इस कारण से डोडो, पैसेंजर पिजन, स्टैलर सी काड व अनेक समुद्री मछलियाँ विलुप्त हुई हैं। मेंढक व अनेक मछली प्रजातियाँ अभी विलुप्ति के कगार पर हैं।
(iii) विदेशी प्रजातियों का आक्रमण - किसी पर्यावरण में जाने-अनजाने में विदेशी प्रजातियों के प्रवेश व उनके आक्रमणकारी प्रभाव से अनेक देशज/मूलज प्रजातियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इनमें से अनेक विलुप्त हो जाती हैं।
"किसी पारितंत्र की मूल प्रजाति व होने वाली प्रजाति उस पारितंत्र के लिए विदेशी या विजातीय प्रजाति कही जाती है।"
मानव ने अनेक कारणों से विदेशी प्रजातियों को नये पारितंत्र में प्रवेश कराया है। कुछ विदेशी प्रजातियाँ अनजाने में नये पर्यावासों में पहुँच जाती हैं। जैसे भारत में हरित क्रान्ति से पहले मेक्सिकन गेहूँ के आयात के समय गाजर घास (पार्थीनियम) का प्रवेश। भारत में पार्थीनियम, जलकुम्भी आदि इसी प्रकार के आक्रमणकारी खरपतवार हैं। पूर्वी अफ्रीका में नाइल पर्च नामक मछली के प्रवेश से वहाँ की मूल 200 से अधिक चिकलिड प्रजातियों की मछलियाँ विलुप्त हो गर्यो।
(iv) सह-विलुप्ति- किसी प्रजाति के विलुप्त होने पर उस पर अविकल्पी रूप में निर्भर रहने वाली अन्य पादप व जन्तु प्रजातियाँ भी विलुप्त हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, किसी विशिष्ट परागणकर्त्ता के विलुप्त होने से उस पर निर्भर पादप प्रजाति भी विलुप्त हो जाती है। किसी मछली के विलुप्त होने पर उस पर अविकल्पी तौर पर निर्भर रहने वाले परजीवियों को भी विलुप्ति का सामना करना पड़ता है।
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