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Question 14 Marks
पीड़क प्रबन्धन क्या है? एकीकृत पीड़क प्रबन्धन से आप क्या समझते हैं?
Answer
पीड़क प्रबन्धन - रोग, कीड़े और खरपतवार पशुओं और फसलों को महँगा और अपूरणीय किसान पहुँचा सकते हैं। इन समस्याओं के प्रबन्ध के तरीकों में कीटनाशकों या जैविक कीट नियन्त्रण का उपयोग शामिल हैं एकीकृत कीट प्रबन्धन (आईपीएम) दोनों तरीकों को जोड़ता है और इसमें कीटनाशक अनुप्रयोगों के अति प्रयोग को कम करने के लिए निगरानी शामिल है। आईपीएम का उद्देश्य प्रभावी, किफायती और पर्यावरण के अनुकूल नियन्त्रण रणनीतियों का विकास और विस्तार करना है।
एकीकृत पीड़क प्रबन्धन - रासायनिक पीड़कनाशियों के प्रयोग से पर्यावरण प्रदूषण, खाद्य पदार्थों का विषाक्तीकरण, पीड़कनाशियों के खिलाफ पीड़कों (Pests) में प्रतिरोध तथा नये पीड़कों के उद्भवन का खतरा बना रहता है। इन खतरों से बचने के लिये जिन तरीकों का उपयोग किया जा रहा है उन्हें एकीकृत पीड़क प्रबन्धन कहते हैं। $IPM$ में निम्नलिखित बिन्दु शामिल हैं-
(i) जैविक नियंत्रण, (ii) यांत्रिक नियंत्रण, (iii) पीड़कनाशकों क न्यूनतम मात्रा में उपयोग।
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Question 24 Marks
जैव उर्वरक से आप क्या समझते हैं? जैव उर्वरक किस प्रकार से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाते हैं?
Answer
जैव-उर्वरक- जैव-उर्वरक ऐसे जीव हैं जो मृदा में पोषक तत्वों को बढ़ाते हैं। जैव-उर्वरकों के प्रमुख स्रोत जीवाणु, सायनो-बैक्टीरिया और कवक हैं।
1. नाइट्रोजन स्थिरीकारी जीवाणु-
(अ) लेग्यूम-राइजोबियम सहजीवन - नाइट्रोजन फसलों के लिए अति महत्त्वपूर्ण तत्व है जो कृषि उत्पादन को सीधे ही प्रभावित करता है। कुछ पौधे अपने प्रयोग से अधिक नाइट्रोजन उत्पादन की क्षमता रखते हैं। ये पौधे नाइट्रोजन स्थिरीकारी जीवाणुओं से सहजीवी सम्बन्ध बनाते हैं। मटर कुल के पौधों की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु मूलगुलिकाओं का निर्माण करते हैं। इन जीवाणुओं में वायुमण्डलीय स्वतन्त्र नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता होती है। लेग्यूम पौधों की मूल गुलिकाएँ आकृति एवं आकार में भिन्न होती हैं। ये गोलाकार, लम्बी, चपटी या गुच्छों के रूप में हो सकते हैं।
    राइजोबियम जीवाणु ग्राम ऋणात्मक, सूक्ष्म-वायवीय तथा बीजाणु उत्पन्न न करने वाले होते हैं। ये पोषद विशिष्टता प्रदर्शित करते हैं।
(ब) स्वतन्त्रजीवी जीवाणु - मृदा में अनेक प्रकार के स्वतन्त्रजीवी जीवाणु पाये जाते हैं। इनमें वायुवीय तथा अवायुवीय दोनों प्रकार के जीवाणु सम्मिलित हैं। ये असहजीवी प्रकृति के होते हैं। एजोटोबैक्टर, बैसीलस पॉलीमिक्सा, क्लोस्ट्रीडियम इनके सामान्य उदाहरण हैं। ये सभी नाइट्रोजन स्थिरीकारी हैं। ये असहजीवी स्वतन्त्रजीवी नाइट्रोजन स्थिरीकारी प्राचीनतम हैं। इनके स्थिरीकरण की प्रक्रिया अपकरणी होती है जो श्वसन से स्वतन्त्र होती है। ये कम वायुवीय परिस्थितियों में तथा हाइड्रोजन की अधिकता में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं। एजोटोबैक्टर को जब किसी फसल में सम्बर्धित किया जाता है तो इसकी उपस्थिति से उत्पादन में वृद्धि होने के साथ यह नाइट्रोजन की माँग को $10-25$ किग्रा प्रति हेक्टेअर कम कर देता है।
इन जीवाणुओं में निम्नलिखित सम्मिलित हैं-
(i) अनिवार्य वायुवीय; जैसे एजोटोबैक्टर तथा बीजरिन्किया
(ii) अनिवार्य अवायुवीय जैसे- क्लोस्ट्रीडियम
(iii) प्रकाश संश्लेषी जैसे- रोडोस्पाइरिलम और क्रोमेटियम
2. नाइट्रोजन स्थिरीकारक सायनोबैक्टीरिया - कुछ सायनोबैक्टीरिया (नीले-हरे शैवाल) धान के खेतों में महत्वपूर्ण नाइट्रोजन स्थिरीकारक हैं। नीले-हरे शैवालों की लगभग $40$ जातियाँ नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सक्षम पायी गई हैं। इन सूक्ष्मजीवों में मोटी भित्ति वाले रंगहीन, हिटरोसिस्ट होते हैं जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण के स्थल होते हैं। एनाबीना , नोस्टॉक , ऑलोसाइरा कुछ प्रमुख नाइट्रोजनस्थिरीकारक नीले-हरे शैवाल हैं।
(i) एजोला-एनाबीना सह-सम्बन्ध - इस सह-सम्बन्ध में एनाबीना एजोली, एजोला पिन्नेटा नामक जलीय टेरीडोफाइट की पत्तियों में अन्तः जीवों के रूप में पाया जाता है। यह $BGA$ वायुमण्डलीय $N _2$ को स्थिर कर सकता है तथा नाइट्रोजनी पदार्थों को उत्सर्जित करके एजोला पौधे को उपलब्ध कराता है।
(ii) एनाबीना साइकेडी नामक $BGA$ साइकस की कॉरेलॉइड जड़ों में पाया जाता है।
(iii) एजोला एवं नॉस्टोक को चावल के खेतों में उगाने से चावल की $50 \%$ उत्पादकता से भी अधिक हो जाती है।
3. कवक - यह उच्च पौधों की जड़ों तथा कवकों का सह-सम्बन्ध है। माइकोराइजा का निर्माण ग्लोमस वंश के अनेक सदस्यों द्वारा होता है। इन्हें निम्नलिखित प्रकारों में बाँटा जा सकता है-
(i) एक्टोमाइकोराइजा - इसमें कवक तन्तु पौधे की जड़ों की सतह पर एक कवच बनाते हैं। इस कवच से कवक के तन्तु जड़ की कार्टेक्स से तथा मृदा से सम्पर्क बनाये रहते हैं। ऐसा होने से जल एवं खनिजों $( N , P$ व K $)$के अवशोषण के लिए अवशोषण क्षेत्र बढ़ जाता है। कवक तन्तु मृदा के कुछ अघुलनशील कार्बनिक पदार्थों को घुलनशील बनाते हैं। जिससे इनके अवशोषण में आसानी होती है। एक्टोमाइकोराइजा ओक , पाइन्स , पीच , एवं यूकैलिप्टस में सामान्यतया पाये जाते हैं। पौधे जिनकी जड़ों में माइकोराइजा होते हैं, वे जड़-जनित रोगों के प्रति प्रतिरोधी होते हैं तथा इनमें सेलिनिटी एवं सूखा सहिष्णुता की क्षमता का विकास होता है।
(ii) एण्डोमाइकोराइजा - इसमें कवक तन्तु जड़ की सतह पर कवच नहीं बनाते, इसके स्थान पर ये ढीले रूप से गुँथे हुए हाइफी बनाते हैं। इनमें से कुछ कवक तन्तु मृदा में प्रवेश करते हैं, जबकि कुछ कवक तन्तु जड़ के वल्कुट में प्रवेश कर जाते हैं।
    कुछ काष्ठीय पौधों एवं ऑर्किड्स में एण्डोमाइकोराइजा पाये जाते हैं। ये पटीय तथा पटरहित कवकों द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं। वल्कुट के कवक तन्तु अन्तः कोशिकाय वृद्धि करते हैं और कोशिकाओं में प्रवेश करके शाखित हो जाते हैं तथा आशय बनाते हैं। ये शाखित हाइफी कुण्डलित होकर आरब्यूस्क्यूल बनाते हैं। इस प्रकार का सम्बन्ध वेसीकूलर आरब्यूस्क्यूलर माइकोराइजी कहलाता है। $VAM$ पौधों में फॉस्फेट पोषण में अपना महत्व प्रदर्शित करते हैं। माइकोराइजा पोषद के प्रति इकाई क्षेत्र में पोषक पदार्थों की अधिक मात्रा उपलब्ध कराते हैं। माइकोराइजल सम्बन्ध संश्लेषित उर्वरकों की निर्भरता को कम करते हैं तथा आस-पास की मृदा को उपजाऊ बनाते हैं।
    जैव उर्वरकों से मृदा को फायदा - भारतीय मृदा में कार्बनिक पदार्थों तथा नाइट्रोजनी पदार्थों की सदैव कमी बनी रहती है। निरन्तर निछालन तथा फसलों को उगाने से मृदा में उपस्थित खनिजों की कमी हो जाती है। मृदा में होने वाली इस प्रकार की पोषक तत्वों की कमी को सूक्ष्म जीव दूर करने में सहायक होते हैं। जैव उर्वरक एक प्रकार के सूक्ष्म जीव हैं जो मृदा की पोषक गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। जैव उर्वरकों के प्रमुख स्रोत जीवाणु, सायनोबैक्टीरिया व कवक हैं। इन जीवाणुओं में वायुमण्डलीय स्वतन्त्र नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता होती है जिससे मृदा में नाइट्रोजन की कमी नहीं होने पाती। धान के खेत में सायनोबैक्टीरिया महत्वपूर्ण जैव उर्वरक की भूमिका निभाते हैं। कवक पादपों के साथ सहजीवी सम्बन्ध माइकोराइजा स्थापित करते हैं। इस संयोजन में कवकीय सहजीवी मृदा से फॉस्फोरस का अवशोषण कर उसे पादपों को प्रदान करते हैं। जैव उर्वरक जैव उर्वरक ऐसे जीव हैं जो मृदा में पोषक तत्वों को बढ़ाते हैं। जैव उर्वरकों के प्रमुख स्रोत जीवाणु, सायनो-बैक्टीरिया और कवक हैं।
1. नाइट्रोजन स्थिरीकारी जीवाणु
(अ) लेग्यूम-राइजोबियम सहजीवन - नाइट्रोजन फसलों के लिए अति महत्त्वपूर्ण तत्व है जो कृषि उत्पादन को सीधे ही प्रभावित करता है। कुछ पौधे अपने प्रयोग से अधिक नाइट्रोजन उत्पादन की क्षमता रखते हैं। ये पौधे नाइट्रोजन स्थिरीकारी जीवाणुओं से सहजीवी सम्बन्ध बनाते हैं। मटर कुल के पौधों की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु मूलगुलिकाओं का निर्माण करते हैं। इन जीवाणुओं में वायुमण्डलीय स्वतन्त्र नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता होती है। लेग्यूम पौधों की मूल गुलिकाएँ आकृति एवं आकार में भिन्न होती हैं। ये गोलाकार, लम्बी, चपटी या गुच्छों के रूप में हो सकते हैं।
राइजोबियम जीवाणु ग्राम ऋणात्मक, सूक्ष्म वायवीय तथा बीजाणु उत्पन्न न करने वाले होते हैं। ये पोषद विशिष्टता प्रदर्शित करते हैं।
(ब) स्वतन्त्रजीवी जीवाणु - मृदा में अनेक प्रकार के स्वतन्त्रजीवी जीवाणु पाये जाते हैं। इनमें वायुवीय तथा अवायुवीय दोनों प्रकार के जीवाणु सम्मिलित हैं। ये असहजीवी प्रकृति के होते हैं। एजोटोबैक्टर , बैसीलस पॉलीमिक्सा, क्लोस्ट्रीडियम इनके सामान्य उदाहरण हैं।एजोटोबैक्टर को जब किसी फसल में सम्बर्धित किया जाता है तो इसकी उपस्थिति से उत्पादन में वृद्धि होने के साथ यह नाइट्रोजन की माँग को $10-25$ किग्रा प्रति हेक्टेअर कम कर देता है।
इन जीवाणुओं में निम्नलिखित सम्मिलित हैं-
(i) अनिवार्य वायुवीय; जैसे एजोटोबैक्टर तथा बीजरिन्किया
(ii) अनिवार्य अवायुवीय जैसे- क्लोस्ट्रीडियम
(iii) प्रकाश संश्लेषी जैसे- रोडोस्पाइरिलम और क्रोमेटियम
2. नाइट्रोजन स्थिरीकारक सायनोबैक्टीरिया - कुछ सायनोबैक्टीरिया (नीले-हरे शैवाल) धान के खेतों में महत्वपूर्ण नाइट्रोजन स्थिरीकारक हैं। नीले-हरे शैवालों की लगभग $40$ जातियाँ नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सक्षम पायी गई हैं। इन सूक्ष्मजीवों में मोटी भित्ति वाले रंगहीन, हिटरोसिस्ट होते हैं जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण के स्थल होते हैं। एनाबीना , नोस्टॉक , ऑलोसाइरा कुछ प्रमुख नाइट्रोजनस्थिरीकारक नीले-हरे शैवाल हैं।
(i) एजोला-एनाबीना सह-सम्बन्ध - इस सह-सम्बन्ध में एनाबीना एजोली , एजोला पिन्नेटा नामक जलीय टेरीडोफाइट की पत्तियों में अन्तः जीवों के रूप में पाया जाता है। यह $BGA$ वायुमण्डलीय $N _2$ को स्थिर कर सकता है तथा नाइट्रोजनी पदार्थों को उत्सर्जित करके एजोला पौधे को उपलब्ध कराता है।
(ii) एनाबीना साइकेडी- नामक $BGA$ साइकस की कॉरेलॉइड जड़ों में पाया जाता है।
(iii) एजोला एवं नॉस्टोक को चावल के खेतों में उगाने से चावल की $50 \%$ उत्पादकता से भी अधिक हो जाती है।
3. कवक - यह उच्च पौधों की जड़ों तथा कवकों का सह-सम्बन्ध है। माइकोराइजा का निर्माण ग्लोमस वंश के अनेक सदस्यों द्वारा होता है। इन्हें निम्नलिखित प्रकारों में बाँटा जा सकता है-
(i) एक्टोमाइकोराइजा - इसमें कवक तन्तु पौधे की जड़ों की सतह पर एक कवच बनाते हैं। इस कवच से कवक के तन्तु जड़ की कार्टेक्स से तथा मृदा से सम्पर्क बनाये रहते हैं। ऐसा होने से जल एवं खनिजों $( N , P$ व K $)$के अवशोषण के लिए अवशोषण क्षेत्र बढ़ जाता है। कवक तन्तु मृदा के कुछ अघुलनशील कार्बनिक पदार्थों को घुलनशील बनाते हैं। जिससे इनके अवशोषण में आसानी होती है। एक्टोमाइकोराइजा ओक , पाइन्स , पीच , एवं यूकैलिप्टस में सामान्यतया पाये जाते हैं। पौधे जिनकी जड़ों में माइकोराइजा होते हैं, वे जड़-जनित रोगों के प्रति प्रतिरोधी होते हैं तथा इनमें सेलिनिटी एवं सूखा सहिष्णुता की क्षमता का विकास होता है।
(ii) एण्डोमाइकोराइजा - इसमें कवक तन्तु जड़ की सतह पर कवच नहीं बनाते, इसके स्थान पर ये ढीले रूप से गुँथे हुए हाइफी बनाते हैं। इनमें से कुछ कवक तन्तु मृदा में प्रवेश करते हैं, जबकि कुछ कवक तन्तु जड़ के वल्कुट में प्रवेश कर जाते हैं।
    कुछ काष्ठीय पौधों एवं ऑर्किड्स में एण्डोमाइकोराइजा पाये जाते हैं। ये पटीय तथा पटरहित कवकों द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं। वल्कुट के कवक तन्तु अन्तः कोशिकाय वृद्धि करते हैं और कोशिकाओं में प्रवेश करके शाखित हो जाते हैं तथा आशय बनाते हैं। ये शाखित हाइफी कुण्डलित होकर आरब्यूस्क्यूल बनाते हैं। इस प्रकार का सम्बन्ध वेसीकूलर आरब्यूस्क्यूलर माइकोराइजी कहलाता है। $VAM$ पौधों में फॉस्फेट पोषण में अपना महत्व प्रदर्शित करते हैं। माइकोराइजा पोषद के प्रति इकाई क्षेत्र में पोषक पदार्थों की अधिक मात्रा उपलब्ध कराते हैं। माइकोराइजल सम्बन्ध संश्लेषित उर्वरकों की निर्भरता को कम करते हैं तथा आस-पास की मृदा को उपजाऊ बनाते हैं।
जैव उर्वरकों से मृदा को फायदा - भारतीय मृदा में कार्बनिक पदार्थों तथा नाइट्रोजनी पदार्थों की सदैव कमी बनी रहती है। निरन्तर निछालन तथा फसलों को उगाने से मृदा में उपस्थित खनिजों की कमी हो जाती है। मृदा में होने वाली इस प्रकार की पोषक तत्वों की कमी को सूक्ष्म जीव दूर करने में सहायक होते हैं। जैव उर्वरक एक प्रकार के सूक्ष्म जीव हैं जो मृदा की पोषक गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। जैव उर्वरकों के प्रमुख स्रोत जीवाणु, सायनोबैक्टीरिया व कवक हैं। इन जीवाणुओं में वायुमण्डलीय स्वतन्त्र नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता होती है जिससे मृदा में नाइट्रोजन की कमी नहीं होने पाती। धान के खेत में सायनोबैक्टीरिया महत्वपूर्ण जैव उर्वरक की भूमिका निभाते हैं। कवक पादपों के साथ सहजीवी सम्बन्ध माइकोराइजा स्थापित करते हैं। इस संयोजन में कवकीय सहजीवी मृदा से फॉस्फोरस का अवशोषण कर उसे पादपों को प्रदान करते हैं।

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Question 34 Marks
सूक्ष्मजीव क्या है? मानव कल्याण में इनकी भूमिका का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
Answer
अनेक सूक्ष्मजीव मानव कल्याण में प्रयोग होने वाले बेशकीमती उत्पादों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। व्यावसायिक पैमाने पर सूक्ष्मजीवियों को उत्पन्न करने के लिए बड़े पात्र की आवश्यकता होती है जिसे फरमेन्टर या किण्वक बायोरियेक्टर कहते हैं। फरमेन्टर एक बड़े आकार का पात्र होता है जिसमें विविध पदार्थों एवं निवेश द्रव्य को डाले जाने पर जैविक क्रियाएँ होती हैं। इसे इस प्रकार बनाया गया है कि इसमें बड़े स्तर पर पदार्थों का उत्पादन किया जा सके। आधार क्रिया विधि में सूक्ष्मजीवों द्वारा कार्बनिक पदार्थों का अवायवीय अपघटन होता है।
A. किण्वित पेयों का उत्पादन - सूक्ष्मजीव विशेषकर यीस्ट का प्रयोग प्राचीन काल से वाइन, बियर, ह्विस्की, ब्रान्डी, जिन, रम आदि पेयों के उत्पादन में किया जाता रहा है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वही यीस्ट - सैकेरोमाइसिस सिरेविसी जो सामान्यतः बेकर्स यीस्ट के नाम से प्रसिद्ध है, ब्रेड बनाने वाले तथा माल्टीकृत धान्यों फलों के रसों में एथेनॉल उत्पन्न करने में प्रयुक्त किया जाता है।
ऐल्कोहॉल रहित पेयों का निर्माण चाय की पत्तियों तथा कॉफी बीन्स में किण्वन कराके किया जाता है। तम्बाकू की पत्तियों में किण्वन द्वारा प्रयोग की जाने वाली तम्बाकू तैयार की जाती है। किण्वन क्रिया से इन पदार्थों में विशेष गंध, रंग तथा सुगन्ध उत्पन्न हो जाती है।
B. प्रतिजैविकों का उत्पादन - प्रतिजैविक या एन्टीबायोटिक्स एक प्रकार के रासायनिक पदार्थ हैं जो कुछ हानिकारक सूक्ष्मजीवों द्वारा स्रावित होते हैं तथा ये अन्य सूक्ष्मजीवियों की वृद्धि का संदमन करते हैं या उन्हें मार देते हैं। एन्टीबायोटिक (एन्टी विरुद्ध; बायोटिक = जीवन) का शाब्दिक अर्थ जीवन के विरुद्ध होता है।
पेनिसिलीन की खोज के पश्चात् अनेक प्रतिजैविक जैसे- टेट्रासाइक्लिन, नियोमाइसीन, नीस्टैरिन , सिफैलोस्पोरिन, कैनामाइसिन, ल्यूकोमाइसिन आदि को पृथक् किया जा चुका है। इनका प्रयोग जीवाणु, कवक, विषाणु तथा अन्य सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पन्न रोगों के रसायनोपचार में किया जाता है। अब तक लगभग $7000$ प्रतिजैविकों की खोज हो चुकी है और प्रतिवर्ष लगभग $300$ नये प्रतिजैविक विकसित कर लिये जाते हैं।

कार्बनिक अम्लों के सूक्ष्मजैविक स्त्रोत व इनके प्रयोग
कार्बनिक अम्लसूक्ष्मजैविक स्त्रोतप्रयोग
1. लैक्टिक अम्ललैक्टोबैसीलस वल्गेरिकस, लै. डलब्रूस्काईएवं स्ट्रैप्टोकोकस लैक्टिस (जीवाणु)दुग्ध प्रोटीन का स्कन्दन।
2. सिट्रिक अम्लऐस्परजिलस नाइगर (कवक)सौन्दर्य प्रसाधन, डाई, औषधि, दर्पण का रजतीकरण आदि में।
3. इटेकोनिक अम्लऐ. टेरियस (कवक)प्लास्टिक व काँच उद्योग तथा ज्वैलरी में।
4. ऑक्सेलिक अम्लऐ. नाइगर (कवक)औषधि एवं अन्य उद्योगों में।
5. कोजिक अम्लऐ. ओराइजी (कवक)एन्टीसेप्टिक ।
6. ऐसीटिक अम्लऐसीटोबैक्टर एसीटाई (जीवाणु)अचार-मुरब्बों में, खाद्य संरक्षण में।
7. ब्यूटाइरिक अम्लक्लोस्ट्रीडियम ब्यूटाइलिकम (जीवाणु)विभिन्न उद्योगों में।

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Question 44 Marks
नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सूक्ष्मजीवों की भूमिका के बारे में बताइये।
Answer
नाइट्रोजन स्थिरीकारी जीवाणु
(अ) लेग्यूम-राइजोबियम सहजीवन - नाइट्रोजन फसलों के लिए अति महत्त्वपूर्ण तत्व है जो कृषि उत्पादन को सीधे ही प्रभावित करता है। कुछ पौधे अपने प्रयोग से अधिक नाइट्रोजन उत्पादन की क्षमता रखते हैं। ये पौधे नाइट्रोजन स्थिरीकारी जीवाणुओं से सहजीवी सम्बन्ध बनाते हैं। मटर कुल के पौधों की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु मूलगुलिकाओं का निर्माण करते हैं। इन जीवाणुओं में वायुमण्डलीय स्वतन्त्र नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता होती है। लेग्यूम पौधों की मूल गुलिकाएँ आकृति एवं आकार में भिन्न होती हैं। ये गोलाकार, लम्बी, चपटी या गुच्छों के रूप में हो सकते हैं।
राइजोबियम जीवाणु ग्राम ऋणात्मक, सूक्ष्म वायवीय तथा बीजाणु उत्पन्न न करने वाले होते हैं। ये पोषद विशिष्टता प्रदर्शित करते हैं।
(ब) स्वतन्त्रजीवी जीवाणु - मृदा में अनेक प्रकार के स्वतन्त्रजीवी जीवाणु पाये जाते हैं। इनमें वायुवीय तथा अवायुवीय दोनों प्रकार के जीवाणु सम्मिलित हैं। ये असहजीवी प्रकृति के होते हैं। एजोटोबैक्टर , बैसीलस पॉलीमिक्सा, क्लोस्ट्रीडियम इनके सामान्य उदाहरण हैं।एजोटोबैक्टर को जब किसी फसल में सम्बर्धित किया जाता है तो इसकी उपस्थिति से उत्पादन में वृद्धि होने के साथ यह नाइट्रोजन की माँग को $10-25$ किग्रा प्रति हेक्टेअर कम कर देता है।
इन जीवाणुओं में निम्नलिखित सम्मिलित हैं-
(i) अनिवार्य वायुवीय; जैसे एजोटोबैक्टर तथा बीजरिन्किया
(ii) अनिवार्य अवायुवीय जैसे- क्लोस्ट्रीडियम
(iii) प्रकाश संश्लेषी जैसे- रोडोस्पाइरिलम और क्रोमेटियम

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Question 54 Marks
वाहितमल उपचार संयंत्र में वाहितमल (सीवेज) का उपचार किस तरह किया जाता है? व्याख्या कीजिए।###वाहितमल की प्राथमिक उपचार प्रावस्था के दौरान निहित विभिन्न चरणों की व्याख्या कीजिए।
Answer
जल की $0.1$ प्रतिशत की अशुद्धता इसे मनुष्य द्वारा प्रयोग के अयोग्य बना देती है। अतः सीवेज को वाहितमल या सीवेज उपचार संयंत्र द्वारा उपचारित करने के पश्चात् ही जल के प्राकृतिक स्रोतों में छोड़ा जाना चाहिए। सीवेज का उपचार सीवेज संयंत्र में निम्न चरणों में किया जाता है-
(1) प्राथमिक उपचार - मूलभूत रूप से उपचार के इस पद में वाहितमल से बड़े कण निस्यंदन तथा अवसादन द्वारा भौतिक रूप से अलग कर दिये जाते हैं। इन्हें भिन्न-भिन्न चरणों में अलग किया जाता है। आरम्भ में तैरने वाले कूड़े-करकट को अनुक्रमिक निस्पंदन द्वारा हटा दिया जाता है। इसके पश्चात् मृदा तथा छोटे पेवल्स को अवसादन द्वारा निष्कासित कर दिया जाता है। सभी ठोस जो प्राथमिक आयंक के नीचे बैठे कण हैं, ये और प्लावी बहिःस्राव का निर्माण करते हैं। बहिःस्राव को प्राथमिक नि: सादन टैंक से द्वितीयक उपचार के लिये ले जाया जाता है।
(2) द्वितीयक अथवा जैव विज्ञानीय उपचार - यह प्राथमिक उपचार के बाद किया जाता है। प्राथमिक उपचार के पश्चात् वाहित मल को ऑक्सीजन एवं वायवीय सूक्ष्मजीवों के सम्पर्क से होकर गुजारा जाता है। ये कार्बनिक पदार्थों को अहानिकारक पदार्थों जैसे $CO _2$ तथा जल में तोड़ देते हैं। इसमें क्लोरीनीकरण क्रिया द्वारा जीवाणुओं को भी नष्ट कर दिया जाता है। इसे पुनः तृतीय स्तर पर उपचारित किया जाता है। द्वितीयक उपचार में निम्नलिखित दो विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं-
(अ) एक्टिवेटेड स्लज बायोमास पुनः चक्रण - इस विधि में प्राथमिक बहिःस्राव को वायुवीय टैंकों में से गुजारा जाता है, जहाँ लगातार यान्त्रिक रूप से हिलाया जाता है और वायु को इसमें पम्प किया जाता है। वायुवीय टैंक में जीवाणु तेजी से गुणन करते हैं तथा कवकीय तन्तुओं से जुड़े जीवाणुओं की जाली जैसी संरचना वाले झुण्ड बनाते हैं जिन्हें फ्लोक्स कहते हैं। जीवाणु अनेक कार्बनिक पदार्थों को अपघटित करने में सक्षम होते हैं जबकि शैवाल इन अपघटकों के लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति करते हैं। वाहित मल उपचार में भाग लेने वाले जीवाणु हैं - कोलाईफोर्म , क्लोस्ट्रीडियम, स्यूडोमोनास, माइक्रोकोकस इत्यादि । लेकिन इस समय जल में अत्यधिक मात्रा में नाइट्रेट एवं फॉस्फेट आदि होते हैं। अब इसे एनारोबिक स्लज डाइजैस्टर में भेजते हैं जहाँ पर जीवाणु तथा कवकों का अन्य जीवाणुओं द्वारा पाचन कर लिया जाता है और गैसें उत्पन्न होती हैं।
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(ब) ट्रिकलिंग फिल्टर विधि - इस विधि में गन्दे जल को बूँद-बूँद करके जीवाणुयुक्त बायोफिल्म पर गिराया जाता है। बायोफिल्म पत्थर के टुकड़ों पर बना होता है। जैविक अपघटन के फलस्वरूप बायोफिल्म, बायोमास तथा $CO _2$ बनते हैं। उपचारित जल को बायोमास सहित बाहर निकाल दिया जाता है।
(3) तृतीयक उपचार - तृतीयक उपचार अजैव निम्नीकरणीय कार्बनिक पदार्थों जैसे-पॉलीक्लोरीनेटेड बाइफेनिल्स, भारी धातुओं, खनिज तथा क्लोरीनेटेड यौगिकों को अलग करने के लिए किया जाता है। तृतीयक उपचार द्वारा विशेष रूप से फास्फेट तथा नाइट्रोजन यौगिकों को हटाया जाता है। फास्फेट तथा नाइट्रोजन यौगिक जलाशयों में सुपोषकीकरण को बढ़ावा दे सकते हैं। कार्बनिक प्रदूषकों को प्रेरित कार्बन फिल्टर द्वारा अलग किया जाता है। फास्फेटों को कैल्सियम एवं आयरन फॉस्फेट के रूप में अवक्षेपित करा दिया जाता है।
    वाहितमल (सीवेज) का उपचार कितने चरणों तक किया जाय इसका निर्णय पदार्थ के वांछित स्तर पर किया जाता है। यदि शहर समुद्र के किनारे है तो वाहितमल के अधिक उपचार की आवश्यकता नहीं होती, किन्तु इसे तट से दूर समुद्र में मिलाना चाहिए। नदी में छोड़ने के लिये वाहितमल का उपचार कम-से-कम दो स्तरों तक करना आवश्यक है। झील में मुक्त करने से पहले वाहितमल को तीन स्तरों तक उपचारित करना आवश्यक है।

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Question 64 Marks
बायोगैस क्या है? बायोगैस संयंत्र का सचित्र वर्णन कीजिए।
Answer
बायोगैस - जन्तु एवं पादप अपशिष्ट जल की उपस्थिति में अवायवीय सूक्ष्मजीवों द्वारा आसानी से अपघटित कर दिये जाते हैं। इस प्रक्रिया में गैसें जैसे-मीथेन, कार्बन-डाइ-ऑक्साइड, हाइड्रोजन, हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया आदि उत्पन्न होती हैं। गैसों का यह मिश्रण बायोगैस कहलाता है। मिश्रण का प्रमुख घटक मेथेन एक अच्छा ईंधन होता है।
बायोगैस संयंत्र - बायोगैस संयंत्र $10$-$15$ फीट गहरा एक टैंक होता है जिसमें अपशिष्ट संगृहीत एवं गोबर की कर्दम (स्लरी) भरी जाती है। कर्दम के ऊपर एक सचल ढक्कन रखा जाता है। सूक्ष्मजीवी सक्रियता के कारण टैंक में गैस बनती है जो इसके ऊपरी भाग में एकत्रित होती रहती है। गैस के दबाव से ढक्कन ऊपर को उठता है, बायोगैस संयंत्र में एक निकास द्वार होता है जो एक पाइप से जुड़ा रहता है। इसी पाइप की सहायता से आस-पास के घरों में बायोगैस की आपूर्ति की जाती है। उपयोग की गई गोबर की कर्दम टैंक के दूसरे निकास द्वार से बाहर निकाल दी जाती है। इसका प्रयोग खाद के रूप में किया जाता है।
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गोबर गैस संयंत्र दो प्रकार के होते हैं-
(1) स्थिर गुम्बदाकार बायोगैस संयंत्र
(2) प्लावक गैस होल्डर प्रकार का बायोगैस संयंत्र
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