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4 अंकों के प्रश्न

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Question 14 Marks
नामांकित चित्रों की सहायता से पुष्पीय पादप में गुरुबीजाणु-जनन का वर्णन कीजिये।
Answer
गुरुबीजाणुजनन - गुरुबीजाणुमातृ कोशिका से गुरुबीजाणु के विकास की प्रक्रिया गुरुबीजाणुजनन कहलाती है। बीजाण्डकाय के अधवर्य की कोई भी कोशिका प्रपसु आरम्भक का कार्य करती है। प्रपसु कोशिका प्रारम्भिक परिनतिक विभाजन द्वारा बाहर की ओर प्राथमिक भित्तीय कोशिका व भीतर की ओर एक प्राथमिक बीजाणुजनन कोशिका में विभक्त हो जाती है। प्राथमिक बीजाणुजनन कोशिका गुरुबीजाणु मातृ कोशिका की तरह कार्य करने लगती है।
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गुरुबीजाणु मातृ कोशिका अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा चार अगुणित गुरुबीजाणु बनते हैं। अर्द्धसूत्रण का प्रथम विभाजन सदा अनुप्रस्थ होता है जिससे चारों गुरुबीजाणु रेखिक क्रम में व्यवस्थित रहते हैं। इसको रैखिक चतुष्क कहा जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण बीजाण्ड एक गुरुबीजाणुधानी है तथा इसमें केवल चार गुरुबीजाणु बनते हैं। चारों गुरुबीजाणुओं में से सामान्यतः केवल एक ही बीजाणु सक्रिय होता है जो कि मादा युग्मकोद्भिद् का निर्माण करता है। शेष तीनों गुरुबीजाणु अपह्वासित हो जाते हैं। नष्ट हुए तीनों गुरुबीजाणु क्रियाशील गुरुबीजाणु द्वारा पोषण के रूप में प्राप्त कर लिये जाते हैं। क्रियाशील गुरुबीजाणु वृद्धि एवं परिवर्धन करके मादा युग्मकोद्भिद् का निर्माण करता है।
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Question 24 Marks
पुष्पीय पौधों में निषेचन की क्रिया का वर्णन करें।###आवृतबीजी में मादा युग्मको‌द्भिद् के विकास तथा द्विनिषेचन का वर्णन कीजिए।
Answer
आवृतबीजी पौधों में मादा युग्मकोदभिद् या भ्रूण कोश का निर्माण गुरु बीजाणु कोशिका द्वारा होता है। गुरु बीजाणु मातृ कोशिका अर्द्धसूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होकर चार गुरु बीजाणु कोशिकाओं का निर्माण करती है।
गुरुबीजाणु चतुष्क में केवल एक ही बीजाणु सक्रिय होता है जो कि मादा युग्मको‌द्भिद का निर्माण करता है। शेष तीन गुरुबीजाणु अपह्वासित हो जाते हैं। क्रियाशील गुरुबीजाणु वृद्धि एवं परिवर्द्धन करके मादा युग्मको‌द्भिद् का निर्माण करता है।
गुरुबीजाणु मादा युग्मकोद्भिद् की प्रथम कोशिका है। गुरुबीजाणु के केन्द्रक में तीन सूत्री विभाजन होते हैं जिनके फलस्वरूप आठ केन्द्रक बनते हैं। पहले विभाजन के फलस्वरूप दो केन्द्रकों का निर्माण होता है। दोनों पुत्री केन्द्रकों में एक-एक केन्द्रक विपरीत ध्रुवां पर पहुँच जाता है। यहाँ पर इनमें पुनः दूसरा एवं तीसरा विभाजन होता है जिससे प्रत्येक ध्रुव पर केन्द्रकों की संख्या चार-चार होती है। चूँकि इन विभाजनों में कोशिका भित्ति का निर्माण नहीं होता है अतः इस अवस्था तक सभी केन्द्रक एक ही सामान्य कोशिकाद्रव्य में होते हैं। तत्पश्चात् इन केन्द्रकों का पुनर्गठन होता है। भ्रूणकोष के बीजाण्डद्वारी ध्रुव पर स्थित चारों केन्द्रकों में से तीन केन्द्रक संगठित होकर अण्ड-समुच्चय बनाते हैं। इसी प्रकार निभागी छोर के चारों केन्द्रकों में से तीन केन्द्रक संगठित होकर प्रतिमुख कोशिकाएँ बनाते हैं। दोनों ध्रुवों से चौथा केन्द्रक चलकर केन्द्रीय कोशिका के केन्द्र पर पहुँचकर आपस में संयुग्मन करके ध्रुवीय केन्द्रक बनाते हैं।
चूँकि यह भ्रूणकोष केवल एक गुरुबीजाणु से विकसित होता है तथा गुरुबीजाणु का केन्द्रक विभाजित होकर कुल आठ केन्द्रक बनाता है। अतः इसे एकबीजाणुज 8- केन्द्रकी भ्रूणकोष अथवा पॉलीगोनम टाइप भ्रूणकोष कहते हैं।
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Question 34 Marks
8-केन्द्रक आवृतबीजी भ्रूणकोष का केवल नामांकित चित्र बनाइये ।
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Question 44 Marks
दोहरा निषेचन से आप क्या समझते हैं? सचित्र समझाइए###द्वि-निषेचन की व्याख्या करें।
Answer
आवृतबीजियों में निषेचन के समय पराग नलिका बीजाण्ड द्वार से अण्ड उपकरण में प्रवेश करती है। प्रवेश करने के पश्चात् पराग नलिका द्वारा भ्रूणकोष में दो नर युग्मक अवमुक्त किए जाते हैं।
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इनमें से एक नर युग्मक अण्डकोशिका की ओर गति करता है और केन्द्रक के साथ संग्लित होता है तथा युग्मनज का निर्माण करता है। दूसरा नर युग्मक केन्द्रीय कोशिकाओं स्थित दो ध्रुवीय केन्द्रकों की ओर गति करता है और उनसे संग्लित होकर त्रिगुणित प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक बनाता है। चूँकि इसमें तीन अगुणितक केन्द्रक सम्मिलित होते हैं, अतः इसे त्रिसंलयन कहते हैं। चूँकि एक भ्रूण पुटी में दो प्रकार के संलयन युग्मक संलयन तथा त्रिसंलयन स्थान लेते हैं, अतः इस घटना को दोहरा निषेचन कहते हैं।
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Question 54 Marks
आवृतबीजी पौधों में पाया जाने वाला भ्रूणपोष क्या है? इसके विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिये भ्रूणपोष क्या है ?###विभिन्न प्रकार के भ्रूणपोषों को समझाइए ।
Answer
भ्रूणपोष - द्विनिषेचन तथा संलयन के फलस्वरूप भ्रूणकोष में बने हुए त्रिगुणित केन्द्रक से एक पोषक संरचना का परिवर्धन होता है। इसे भ्रूणपोष कहते हैं। भ्रूणपोष पोषण की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण ऊतक होता है तथा आवृतबीजियों में यह भ्रूण के विकास के लिये आवश्यक पोषण प्रदान करता है। भ्रूणपोष के परिवर्धन के आधार ये निम्न तीन प्रकार के होते हैं-
(1) केन्द्रकीय भ्रूणपोष - इस प्रकार के भ्रूणकोष के विकास में प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक में प्रथम तथा कुछ परवर्ती विभाजनों के द्वारा अनेक केन्द्रक बनते हैं। इन केन्द्रकों के बीच भित्ति का निर्माण नहीं होता है और बहुकेन्द्रकीय भ्रूणपोष बन जाता है। इसमें भ्रूण धँसा हुआ रहता है। उदाहरण कैप्सेला, यूफोर्बिया मैं।
(2) कोशिकीय भ्रूणपोष - इस प्रकार के भ्रूणपोष में प्राथमिक भ्रूणपोष केन्द्रक बार-बार विभाजन करता है तथा बनने वाले सभी केन्द्रकों के बीच भित्ति का निर्माण होता है। जिसके फलस्वरूप बहुकोशिकीय भ्रूणपोष ऊतक बन जाता है।
(3) माध्यमिक भूणपोष - इस प्रकार के भ्रूणपोष केन्द्रकीय तथा कोशिकीय प्रकार के भ्रूणपोषों का मिश्रण होता है। प्रारम्भ में विभाजन के फलस्वरूप दो कोशिकाएँ बनती हैं जिनमें से एक कोशिका क्रियाशील रहकर केन्द्रकीय विभाजनों द्वारा भ्रूणपोष का निर्माण करती है तथा दूसरी कोशिका नष्ट हो जाती है। उदाहरण- एस्फोडिलस, एरेम्यूरस में।
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Question 64 Marks
इनमें विभेद कीजिए (क) बीजपत्राधार और बीजपत्रोपरिक, (ख) प्रांकुर चोल तथा मूलांकुर चोल, (ग) अध्यावरण तथा बीजचोल, (घ) परिभ्रूण पोष एवं फलभित्ति।
Answer
(क) बीजपत्राधार और बीजपत्रोपरिक में अन्तर
बीजपत्राधारबीजपत्रोपरिक
1. यह भ्रूण के बीजाक्ष का वह भाग होता है जो बीजपत्र व मूलांकुर के मध्य स्थित होता है।यह भ्रूण के बीजाक्ष का वह भाग होता है जो बीजपत्र तथा प्रांकुर के मध्य स्थित होता है।
2. बीज के अंकुरण के समय बीजपत्राधार में तीव्र वृद्धि होने के कारण बीजपत्र मृदा से ऊपर आ जाते हैं, जैसे- अरण्डी, सेम आदि में।बीज के अंकुरण के समय बीजपत्रोपरिक में तीव्र वृद्धि होने के कारण बीजपत्र मृदा में ही रह जाते हैं, जैसे- मक्का, चना आदि में।
(ख) प्रांकुर चोल तथा मूलांकुर चोल में अन्तर
प्रांकुर चोलमूलांकुर चोल
1. एक बीजपत्रीय भ्रूणीय अक्ष से बीजपत्र ( स्केटुलम) के जुड़ाव स्थल से ऊपर, भ्रूणीय अक्ष का बीजपत्रोपरिक तथा प्ररोह शीर्ष कुछ आद्यपर्णों से आवृत होता है। यह खोखली पर्णीय संरचना होती है। इसे प्रांकुर चोल कहते हैं।1. एक बीजपत्रीय भ्रूणीय अक्ष से बीजपत्र के जुड़ाव स्थल से नीचे भ्रूणीय अक्ष का बीजपत्राधार तथा मूलांकुर शीर्ष विभेदित आवरण से आवृत होता है। इसे मूलांकुर चोल कहते हैं।
2. प्रांकुर चोल प्रांकुर की सुरक्षा करता है।2. मूलांकर चोल मूलांकुर की सुरक्षा करता है।
(ग) अध्यावरण तथा बीजचोल में अन्तर
अध्यावरणबीजचाल
अध्यावरण बीजाण्ड के ऊपर एक संरक्षात्मक आवरण है।अध्यावरण दृढ़ होकर बीजावरण बनाते हैं, जिसे बीजचोल कहते हैं।
यह कम कठोर होता है और बीजाण्ड को सुरक्षा प्रदान करता है।यह अधिक कठोर होता है और सुरक्षा प्रदान करता है।
(घ) परिभूणपोष एवं फलभित्ति में अन्तर
परिभ्रूणपोषफलभित्ति
1. कुछ बीजों में बीजाण्ड का बीजाण्डकाय एक पतले आवरण के रूप में बचा रह जाता है, इसे परिभ्रूणपोष कहते हैं। जैसे-कालीमिर्च, चुकन्दर आदि में।1. निषेचन के पश्चात् अण्डाशय से फलभित्ति का निर्माण होता है |
2. यह एक स्तरीय होता है।2. यह तीन स्तरों में बँटी हो सकती है-बाह्य फलभित्ति, मध्य फलभित्ति तथा अन्तः फलभित्ति।
3. यह भोजन संग्रह करता है। यह सुरक्षा प्रदान करती है और भोजन संग्रह करती है।3. यह सुरक्षा प्रदान करती है और भोजन संग्रह करती है।
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Question 74 Marks
एक निषेचित बीजाण्ड में युग्मनज प्रयुप्ति के बारे में क्या सोचते हैं?
Answer
निषेचन के पश्चात् बीजाण्ड के भीतर युग्मनज से भ्रूण का तथा त्रिगुणित केन्द्र से भ्रूणपोष का निर्माण होता है। निषेचन क्रिया का भ्रूणपोष के बाहर के ऊतकों पर भी प्रभाव पड़ता है। जैसे-जैसे बीज परिपक्व होता है, उसके अन्दर जल की मात्रा घटने लगती है तथा बीज अपेक्षाकृत शुष्क होता जाता है। धीरे-धीरे बीजाण्ड के अन्दर की कार्यिकी क्रियाएँ रुक जाती हैं। भ्रूण निष्क्रियता की दशा में प्रवेश कर जाता है जिसे 'प्रसुप्ति' कहते हैं। यदि अनुकूल परिस्थितियाँ ( पर्याप्त नमी, आर्द्रता, वायु, ताप ) उपलब्ध होती हैं तो वे अंकुरित हो जाते हैं।
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Question 84 Marks
स्व-परागण व पर-परागण में अन्तर कीजिए। प्रत्येक के दो समुचित उपायों का उल्लेख कीजिए।
Answer
स्व-परागण एवं पर-परागण में अन्तर
स्व-परागणपर-परागण
1. स्व-परागण एक ही पुष्प के नर व मादा भागों के बीच अथवा उसी पौधे के दो पुष्पों में होता है।पर-परागण एक ही जाति के अलग-अलग पौधों के पुष्पों में होता है।
2. इसके लिए उभयलिंगी पुष्प या द्विलिंगी पौधों का होना आवश्यक है।इसके लिए पुष्पों का उभयलिंगी या पौधों का द्विलिंगी होना आवश्यक नहीं है।
3. स्व-परागण के लिए पुष्पों का रंगीन, चमकदार, बड़ा व आकर्षक होना आवश्यक नहीं है।पर-परागण के लिए पुष्पों का आकर्षक, सुन्दर, बड़ा व चमकदार होना आवश्यक है।
4. इसमें परागकणों का व्यर्थ व्यय कम होता है अतः कम परागकण उत्पन्न होते हैं।इसमें परागकणों का व्यर्थ व्यय अधिक होता है। अतः इनका अधिक संख्या में उत्पन्न होना आवश्यक है।
5. स्व-परागण में बाह्य परागण कर्मकों की आवश्यकता नहीं होती है।इसमें परागण के लिए जैविक एवं अजैविक कर्मकों की आवश्यकता होती है।
6. स्व-परागण के फलस्वरूप बने बीज हल्के एवं छोटे होते हैं।इससे बने बीज अधिक भारी व बड़े होते हैं।
7. बार-बार स्व-परागण से बने पौधे दुर्बल व अस्वस्थ रहते हैं।इससे बने पौधे सामान्यतः स्वस्थ रहते हैं।
8. इससे पौधों की शुद्धता बनी रहती है।इसमें दो पौधों का मिश्रण होता है।
9. विभिन्नता एवं विकास की सम्भावना कम रहती है।विभिन्नता एवं विकास की सम्भावना अधिक रहती है।
10. स्व-परागित पुष्प अपने पर्यावरण के अनुसार अनुकूलित नहीं होते हैं।पर-परागित पुष्प अपने पर्यावरण के अनुसार अनुकूलित रहते हैं।
स्व-परागण के लिए अनुकूलन  स्व-परागण के लिए पौधों में मुख्यतः दो अनुकूलन होते हैं-
1. समकालपक्वता - इस प्रकार के अनुकूलन में उभयलिंगी पुष्प के परागकोष तथा वर्तिकाग्र एक साथ परिपक्व होते हैं, फलस्वरूप परागकोष के स्फुटन पर परागकणों का ग्राही वर्तिकाग्र होता है। अतः उस पुष्प के परागकण उसी पुष्प को परागित करते हैं, जैसे - गुलाबाँस, सदाबहार आदि ।
2. अनुन्मील्य परागण - अनेक पादप जातियों में पुष्प अनावरित नहीं होते हैं। चूँकि ये पुष्प बन्द होने के कारण इनमें केवल स्व-परागण ही सम्भव होता है। अतः ऐसे पुष्पों को अनुन्मील्य परागणी पुष्प कहते हैं। उदाहरण के लिए, ड्रोसेरा, जंकस, सैक्सीफ्रेगा, वायोला, ऑक्सेलिस आदि अनेक वंशों में इसी प्रकार का परागण पाया जाता है।
पर-परागण के लिए अनुकूलन - पौधों में पर-परागण सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित अनुकूलन पाये जाते हैं-
1. स्वबन्ध्यता - इस प्रकार के अनुकूलन में यदि किसी पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं तो वे निषेचन नहीं कर पाते हैं। यह विभिन्न कारणों से होता है। माल्वा में एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र में अंकुरित नहीं होते हैं। पिट्निया ऐक्सिलैरिस में परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित तो होते हैं किन्तु पराग नलिका का विकास पूर्ण नहीं होता है।
2. स्व-अनिषेच्य उभयलिंगिता - अनेक उभयलिंगी पुष्पों में पुंकेसर तथा वर्तिकाग्र की संरचना स्व-परागण में बाधक होती है। कैरियोफिल्लैसी कुल के पौधों में वर्तिकाग्र की लम्बाई पुंकेसरों से अधिक होती है जिससे इसी पुष्प के परागकण उसी की वर्तिकाग्र पर नहीं पहुँच पाते हैं। आर्किडेसी एवं एस्क्लीपिअडैसी कुलों में परागकण परागपिण्डों (pollinia) में होते हैं जिससे उनका स्थानान्तरण केवल कीटों द्वारा ही सम्भव होता है।
3. भिन्न कालपक्वता - इस प्रकार के अनुकूलन में पुष्प के नर तथा मादा जननांग भिन्न-भिन्न समय में परिपक्व होते हैं जिससे स्व-परागण नहीं होता है। सैक्सीफ्रेगा की जातियों में परागकणों का प्रकीर्णन वर्तिकाग्र के परिपक्व होने से पहले ही हो जाता है। इस अनुकूलन को पुंपूर्वता कहते हैं। क्रूसीफेरी एवं रोजेसी कुल के सदस्यों में परागकोर्षों के परिपक्व होने से पहले ही वर्तिकाग्र की ग्राहिता समाप्त हो जाती है। इस अनुकूलन को स्त्रीपूर्वता कहते हैं।
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Question 94 Marks
बीज से आप क्या समझते हैं? किसी एक बीज के निर्माण प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
Answer
आवृतबीजियों में लैंगिक जनन का अन्तिम परिणाम बीज होता है। निषेचन के पश्चात् बीजाण्ड के भीतर युग्मनज से भ्रूण का तथा त्रिगुणित केन्द्र से भ्रूणपोष का निर्माण होता है। निषेचन की क्रिया का भ्रूणपोष के बाहर के ऊतकों पर भी प्रभाव पड़ता है। वृद्धि के कारण बीजाण्डौं का आकार बढ़ जाता है। अध्यावरणों के परिमाण व मोटाई में भी परिवर्तन आते हैं, ये दूढ़ होकर बीजावरण बनाते हैं। बाहरी अध्यावरण से बना कड़ा आवरण बीजकवच तथा भीतरी अध्यावरण से बना कोमल आवरण अन्तः कवच कहलाता है। जिस स्थान पर बीजाण्ड बीजाणु वृन्त से जुड़ता है, वहाँ एक चिह्न बन जाता है जा नाभिका कहलाता है। भोज्य पदार्थ या तो बीज-पत्र में या भ्रूणपोष में एकत्र हो जाते हैं। पानी की मात्रा धीरे-धीरे कम हो जाती है। कोमल व सरस बीजाण्ड अब कड़ी व शुष्क रचना में बदल जाता है। धीरे-धीरे बीजाण्ड के अन्दर की कार्यिकी क्रियाएँ रुक जाती हैं तथा भ्रूण सुप्तावस्था में पहुँच जाता है। बीजावरण से घिरे, भोजन स्रवित किए हुए तथा सुसुप्त भ्रूण को अपने अन्दर समेटे, इस रचना को बीज कहते हैं।
बीजचोल के अन्दर स्थित बीज का सम्पूर्ण भाग मिगी कहलाता है। इसी के अन्दर भ्रूण स्थित होता है। बीज में स्थित भ्रूण के बीज-पत्रों की संख्या के आधार पर बीज दो प्रकार के होते हैं-
(i) एकबीजपत्री - इस प्रकार के बीजों में केवल एक ही बीज-पत्र होता है। इन बीजों में भ्रूण के पोषण होते भोजन संचित होता है अतः इन बीजों को भ्रूणपोषी  बीज कहते हैं; जैसे-मक्का, धान, जौ आदि।
(ii) द्विबीजपत्री - इन बीजों में दो बीज-पत्र पाये जाते हैं तथा इन बीजों में पोषण इन्हीं बीज-पत्रों में संचित होता है। ये अभ्रूणपोषी बीज होते हैं, जैसे- चना, मटर, सेम, मूँगफली आदि परन्तु कुछ द्विबीजपत्री बीजों में भ्रूणपोष पाया जाता है, जैसे- अरण्ड का बीज |
चने के बीज की संरचना - चने का बीज भूरा, सफेद या गुलाबी रंग का अभ्रूणपोषी होता है। इसके चारों ओर बीजचोल पाया जाता है। भीगे बीज का छिलका अलग करने पर यह बीज चाल दो स्तरों में दिखाई देता है। बाहरी मोटे आवरण को बाह्य आवरण कहते हैं। चने के बीज का एक सिरा नुकीला होता है। इस पर एक गड्‌ढा पाया जाता है, इसे नाभिका कहते हैं। इसी के द्वारा बीज एक तन्तु द्वारा फल से जुड़ा होता है। नाभिका के बीच में एक छोटा छिद्र बीजाण्डद्वार पाया जाता है। नाभिका के ऊपर बाह्य चोल पर एक पतली धारी होती है जिसे सन्धि रेखा कहते हैं। इस रेखा से बीजचोल हटाने पर बीज में जो भाग दिखाई देता है, उसे भ्रूण कहते हैं। इसके भ्रूण में दो भाग दिखाई देते हैं-
(1) बीजपत्र - बीजों को खोलने पर दो मोटी, चपटी रचनाएँ दिखाई देती हैं जिन्हें बीज-पत्र कहते हैं।
(2) अक्ष - दोनों बीज-पत्रों के बीच एक छोटी-सी संरचना अक्ष होती है जिससे दोनों बीज-पत्र जुड़े होते हैं। अक्ष का वह भाग जो बीज-पत्रों के बीच दबा होता है, प्रांकुर कहलाता है। यह अंकुरण के बाद पौधे का प्ररोह बनाता है। अक्ष का दूसरा सिरा जो बीज-पत्रों के बाहर स्थित होता है, मूलांकुर कहलाता है। यह अंकुरण करके जड़ बनाता है। प्रांकुर के ठीक नीचे का भाग बीजपत्रोपरिक कहलाता है।अक्ष का वह भाग जो बीज-पत्रों के ठीक नीच या मूलांकुर के ठीक ऊपर स्थित होता है, बीज पत्राधार कहलाता है।
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