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प्रश्नों के उत्तर सविस्तार लिखिए : ( 4 गुण )

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Question 14 Marks
अंगूर में पौध संरक्षण व दैहिक विकारों का वर्णन करो।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 24 Marks
आँवले की खेती का विस्तृत वर्णन करो।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 34 Marks
खजूर की उन्नत किस्में, पौध संरक्षण व तुड़ाई उपरान्त प्रबंधन पर सविस्तार से लिखो।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 44 Marks
बेल की खेती का वर्णन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए-
(अ) जलवायु एवं भूमि,
(ब) पौधे लगाने की विधि
(स) खाद एवं उर्वरक
(द) पौध संरक्षण।
Answer
(अ) जलवायु एवं भूमि (Climate & Soil)
बेल इतना सहिष्णु पौधा होता है कि हर प्रकार की जलवायु में भली-भाँति उग जाता है। विशेषतः यह शुष्क जलवायु को अधिक पसन्द करता है। इसमें पाले को सहन करने की भी क्षमता होती है। यह फल वृक्ष-$7^{\circ}$ सेंटीग्रेड तक तापमान को भी सहन कर लेता है। बेल हर प्रकार की भूमि में अच्छी तरह उगता है लेकिन अच्छी खेती व पैदावार के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है। यह अम्लीय एवं क्षारीय (5-10 पी.एच. मान) भूमि पर भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। यह फल वृक्ष इतना अधिक सहिष्णु होता है कि रेगिस्तान में 2-3 महीने मिट्टी में दब जाने के बाद भी पुनर्जीवित हो जाता है। यह भूमि में 9.0 डेसी सायमन्स प्रति मीटर $(\text{dSm} ^{-1})$ तक ही लवणता को भी सहन कर लेता है।
(ब) पौधे लगाने की विधि (Planting method) - बेल के पौधे का रोपण वर्षा के प्रारम्भ में करना चाहिए। गड्ढे का आकार 75 × 75 × 75 सेमी. तथा एक गड्ढे से दूसरे गड्ढे की दूरी 6 मीटर रखनी चाहिए। वर्षा शुरू होते ही इन गड्ढों को दो भाग मिट्टी तथा एक भाग खाद से भर देना चाहिए। एक-दो वर्षा हो जाने पर गड्ढे की मिट्टी जब खूब बैठ जाए तो इनमें पौधों को लगा देना चाहिए।
(स) खाद एवं उर्वरक (Manure & fertilizer) - साधारणतया यह पौधा बिना खाद और पानी के भी अच्छी तरह फलता-फूलता रहता है, लेकिन अच्छी फसल प्राप्त करने के लिए इसमें उचित खाद की मात्रा उचित समय पर देना आवश्यक है। एक फलदार पेड़ के लिए 500 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम फास्फोरस एवं 500 ग्राम पोटाश की मात्रा प्रति पेड़ देना चाहिए। चूँकि बेल में जस्ते की कमी के लक्षण पत्तियों पर आते हैं, अतः जस्ते की पूर्ति के लिए 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट का छिड़काव जुलाई, अक्टूबर और दिसम्बर में करना लाभदायक रहता है।
(द) पौध संरक्षण (Plant protection) - बेल की कोमल शाखाओं तथा पत्तियों पर पर्ण सुरंगक (Leaf minor) का आक्रमण होता है लेकिन इससे विशेष नुकसान नहीं पहुँचता है फिर भी 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में क्यूनॉलफॉस 25 ईसी के छिड़काव से रोका जा सकता है।
बेल के पेड़ पर रोगों का प्रकोप बहुत कम हो होता है एकत्रित फलों के गूदे में कभी-कभी गलन (Internal rot) की बीमारी लग जाती है, जिससे फल अन्दर ही अन्दर खराब हो जाता है। इसे कम करने के लिए फलों को सावधानीपूर्वक तोड़ा जाये जिससे इन्हें चोट न लगे तथा फलों को तोड़ने के बाद 0.3 प्रतिशत डाइथेन जेड 78 के घोल से उपचारित करके ठीक किया जा सकता है।
कभी-कभी फल पकने से पूर्व फट जाते हैं, जो या तो सूक्ष्म तत्वों की कमी से या फिर अनियमित सिंचाई के कारण होता है। फल फटने से रोकने हेतु पोटैशियम सल्फेट 4 प्रतिशत का वर्ष में तीन बार पर्णीय छिड़काव अगस्त, नवम्बर व फरवरी माह में करें तथा फल विकास एवं परिपक्वता के समय नमी का अभाव नहीं होना चाहिए। फलों को श्रिंक, पॉलीथीन से लपेटकर भी फटने की दर कम कर सकते हैं।
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Question 54 Marks
अनार की फसल के प्रमुख कीट तथा व्याधियों का वर्णन कीजिए।
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Question 64 Marks
अंगूर के पौधों की ट्रेनिंग की विभिन्न विधियों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
Answer
अंगूर के पौधों की ट्रेनिंग निम्नलिखित विधियों से की जा सकती है-
1. शीर्ष विधि- इस विधि से सधी हुई लता झाड़ीदार होती है जिसका तना 75-90 सेमी. ऊँचा तथा सीधा होता है। इस तने के शीर्ष पर 5-6 छोटी-छोटी शाखाएँ फैलती हैं। शुरू के कुछ वर्षों में लता को एक सहारे की आवश्यकता होती है। लेकिन जब चार पाँच वर्षों में तना काफी मजबूत हो जाता है तो फिर सहारे की आवश्यकता नहीं होती है। इन मुख्य शाखाओं पर निकले कल्ले जब एक वर्ष पुराने हो जायें तो जाड़े के दिनों में उन्हें दो-तीन गाँठों पर काट दिया जाता है। इनके ऊपर मार्च के महीने में कल्ले निकलते हैं जिन पर फूलों का गुच्छा निकालता है। यह विधि कम बढ़ने वाली किस्में जैसे ब्यूटी सीडलेस, परलेट के लिये उपयुक्त है।
2. निफिन विधि- यह विधि विलियम निफिन द्वारा न्यू यार्क में 1850 में विकसित की गई, जिसमें लोहे या लकड़ी के खम्बे के सहारे दो तार भूमि में क्रमशः 1.05 व 1.65 मीटर की ऊँचाई पर एक छोर से दूसरे छोर तक बाँध दिये जाते हैं। खम्भों की दूरी 4.8 मीटर रखनी चाहिये। लता को भूमि से 1.65 मीटर की ऊँचाई से काट दिया जाता है तथा तारों के साथ दोनों दिशाओं में स्थाई रूप से बगल की चार शाखाएँ विकसित की जाती हैं। इन शाखाओं पर फैलने वाले केन (एक वर्ष पुरानी परिपक्व शाखा) अच्छी तरह से विकसित किये जाते हैं। इन केनों के फैलने के लिए 7-12 गाँठों तथा दलपुट बनाने के लिये 1 से 2 गाँठों पर काटा जाता है। मध्यम ओजस्वी किस्में जैसे थॉम्पसन सीडलेस, परलेट के लिये यह विधि उपयुक्त है।
3. टेलीफोन विधि- इस विधि में 3.5 से 4.8 मीटर की दूरी पर खम्भे गाड़े जाते हैं। इन खम्भों के ऊपरी भाग पर 1.2 मीटर लम्बी भुजायें होती हैं। प्रत्येक भुजा में तीन छेद बने होते हैं तथा इन छेदों में से तीन तार कतारों में बाँधे जाते हैं। लता को 1.8 मीटर की ऊँचाई पर काट दिया जाता है तथा 5 से 6 शाखाएँ अच्छी प्रकार से फैलायी जाती हैं। इस तरह साधी गयी शाखाओं की काट-छाँट निफिन विधि की तरह करते हैं। यह विधि भी मध्यम ओजस्वी किस्में जैसे-परलेट, थॉम्पसन सीडलेस के लिये उपयुक्त है।
4. पंडाल विधि- इस विधि को परगोला, बावर व आरबोर के नाम से भी जानते हैं, इस विधि में 4.5 से 6 मीटर की दूरी पर 1.95 से 2.10 मीटर ऊँचे खम्भे गाड़ दिये जाते हैं। इन्हीं खम्भों से तार खड़े व आड़े दोनों तरह से 45 से 60 सेमी. की दूरी पर खींचे जाते हैं। लताओं को इसी जाली के ऊपर साधा जाता है एवं मुख्य लता को 7 फुट तक बढ़ने दिया जाता है। इसके पश्चात् दो प्राथमिक शाखाएँ प्रत्येक 4 फुट तक बढ़ने दें, फिर काट दें। प्रत्येक प्रथमिक शाखा पर 16 से 20 तक द्वितीय शाखायें रखते हैं। इसके पश्चात् तृतीय शाखाओं का प्रति वर्ष कृन्तन करते हैं।
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Question 74 Marks
बेर की खेती का वर्णन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए-
(अ) उन्नत किस्में $\qquad$(ब) पौधे लगाने की विधि
(स) खाद एवं उर्वरक$\quad$(द) पौध संरक्षण।
Answer
(अ) बेर की उन्नत किस्में एवं पकने का समय
फसल उन्नत किस्मेंफल पकने का समय
अगेतीगोला, थार सेव्किा व थार भुवराजजनवरी का प्रथम सप्ताह
मध्यमसेब, मूण्डिया, जोगिया, कैथली व चौमूलोकलजनवरी का अन्तिम सप्ताह
पछेतीउमरानफरवरी अन्तिम सप्ताह से मार्च प्रथम सप्ताह
(ब) पौधे लगाने की विधि (Planting method)- मई-जून माह में 1×1 ×1 मीटर आकार के गड्‌ढे 6 से 8 मीटर की दूरी पर खोद लेते हैं फिर इन गड्‌ढों को खुला छोड़ देते हैं बाद में इनमें सारणी के अनुसार खाद व उर्वरक प्रति गड्ढा भर देते हैं।
खाद उर्वरक एवं दवा को खोदी हुई मिट्टी के साथ अच्छी तरह मिला देते हैं और फिर इस मिट्टी को गड्ढे में भर देते हैं। कलिकायित पौधों को थावलों के बीच लगाने के बाद सिंचाई कर देते हैं। इसकी रोपाई का उपयुक्त समय वर्षा ऋतु है।
(स) खाद एवं उर्वरक (Manure & fertilizer)- प्रति पौधा खाद एवं उर्वरक निम्न दर्शायी गयी तालिका के अनुसार डालें -
यूरिया की आधी मात्रा और सुपर फॉस्फेट एवं म्यूरेट ऑफ पोटाश की पूरी मात्रा जुलाई एवं बाकी बची हुई यूरिया की आधी मात्रा नवम्बर माह में देनी चाहिये। खाद व उर्वरक देने के तुरन्त बाद सिंचाई कर देनी चाहिये।
सारणी-खाद एवं उर्वरक
पेड़ों की आयु वर्ष में मात्रा किलोग्राम प्रति पेड़
गोबर की खादयूरियासुपर फॉस्फेटम्यूरेट ऑफ पोटाश
1100.220.350.08
2200.440.700.16
3201.101.400.20
4251.201.750.25
5 वर्ष और उसके बाद301.201.750.25
(द) पौध संरक्षण (Plant protection)- फसल को हानि पहुँचाने वाले विभिन्न कीट तथा व्याधियाँ निम्न सारणी में प्रदर्शित हैं-
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Question 84 Marks
पपीता की फसल को हानि पहुँचाने वाले प्रमुख कीट/व्याधियों का उनके प्रबन्धन सहित वर्णन सारणीबद्ध कीजिए।
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Question 94 Marks
केला की कृषि का वर्णन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए-
(अ) जलवायु एवं भूमि,
(ब) प्रवर्धन,
(स) पौधे लगाने की विधि,
(द) खाद एवं उर्वरक,
(य) तुड़ाई व उपज ।
Answer
(अ) जलवायु एवं भूमि (Climate & Soil)
केला उष्ण कटिबन्धीय जलवायु का फल वृक्ष है। इसके लिए गर्म, अधिक आर्द्रता एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्र उत्तम होते हैं। जहाँ गर्मियों में तेज हवाएं चलती हैं व जाड़े में पाला पड़ता है ऐसे क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं। केले की अच्छी पैदावार के लिए पाला रहित, तेज व गर्म हवाओं रहित क्षेत्र तथा अधिक वर्षा क्षेत्र जो ठीक तरह से वितरित हों, उपयुक्त पाये जाते हैं। इस फसल के लिए औसत तापमान 20-30 सेंटीग्रेड उपयुक्त है।
केले की खेती के लिये गहरी, उपजाऊ व नमी को अधिक समय तक रोकने वाली भूमि उपयुक्त होती है। समुद्र के डेल्टाओं की रेतीली दोमट, गहरी एलूविअल दोमट व काली कपासीय मृदा केले की खेती के लिए उत्तम होती है। सफल खेती में भूमि का पीएच मान 6.5-7.5 होना चाहिए।
(ब) प्रवर्धन (Propagation)
सकर्स द्वारा (Propagation by suckers)-केले में सकर्स दो प्रकार के होते हैं-
तलवार सकर्स (Sword suckers) - इन सकर्स की पत्तियाँ लम्बी (45 से 60 सेमी.) तलवार की तरह नुकीली व पतली होती हैं। इनसे तैयार पौधा जल्दी बढ़ता है (रोपण के 11 माह में फलन)। रोपित सकर्स की उम्र तीन से चार माह की होनी चाहिए तथा वजन 500 ग्राम कम से कम होना चाहिए (साधारणतः वजन 500-750 ग्राम)। इसे रोपण हेतु काम में मुख्यतः लेते हैं।
चौड़ी पत्ती वाले (Water suckers)- ये चौड़ी पत्ती वाले तथा कमजोर सकर्स होते हैं। इनके द्वारा तैयार पौधे धीमी गति से बढ़ते हैं (रोपण के 15 माह में फलन)।
पादप ऊतक संवर्धन (Tissue culture)-केले के पौधों के प्रसारण की आधुनिक विधि है। इस विधि में अधिक संख्या में शीघ्रता से एक साथ विषाणु रहित पौधे तैयार हो सकते हैं। केले की G-6 किस्म का प्रवर्धन पादप ऊतक संवर्धन तकनीक से ही प्रमुखता से किया जा सकता है।
(स) पौधे लगाने की विधि (Planting Method)
गहरी जुताई करके खेत को अच्छी तरह तैयार करें। 1.5 × 1.5 मीटर की दूरी पर 30 × 30 × 30 सेन्टीमीटर आकार के गड्ढे खोदें। इन गड्‌ढों में आधी मात्रा कम्पोस्ट व आधी मात्रा मिट्टी मिलाकर भरें। 50 ग्राम क्यूनॉलफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण भूमि-जनित कीटों के नियन्त्रण हेतु गड्ढों में मिलायें। जुलाई की पहली वर्षा के बाद ही सकर्स लगा देने चाहिए। देरी करने से केले की पैदावार पर बुरा असर पड़ता है। सकर्स गड्ढे के बीचों-बीच सायंकाल के समय पूरी तरह जमीन के अन्दर लगाकर दबा देने चाहिये एवं सिंचाई कर देनी चाहिए।
(द) खाद एवं उर्वरक (Manure & Fertilizer)
प्रति पौधा 10 से 15 किलोग्राम गोबर की खाद, 150 ग्राम यूरिया, 150 ग्राम सुपर फॉस्फेट तथा 250 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश का प्रयोग उपयुक्त होता है। इस खाद की मात्रा को गाँठें लगाने के 3, 4 व 5 माह बाद बराबर भागों में बाँट कर देनी चाहिये। नत्रजन का ह्रास तेजा से होती है अतः इसे 3 से 5 बार, 30-40 दिन के अन्तराल पर देते हैं। फास्फोरस का अवशोषण रोपण के 2-3 माह पर अधिक होता है। वहीं पोटाश की मात्रा पुष्पक्रम निकलने के साथ ही बढ़ती है। कई अनुसंधानों के परिणाम में सिद्ध हुआ है कि केले को उर्वरक 1 : 1 : 4 (नत्रजन फास्फोरस पोटाश) के अनुपात में देने से अधिकतम उपज प्राप्त होती है।
(य) तुड़ाई एवं उपज (Harvesting & Yield)
केले की परिपक्वता की जाँच उसकी 3/4 कोणिता (Angularity) से करते हैं। जब फल पूर्ण विकसित लगभग गोल, हल्का हरापन लिए हुए हो जाए तब इनकी तुड़ाई करनी चाहिए। फलन उम्र पौधे रोपण के समय लिए नए सकर्स, किस्म व स्थान पर निर्भर करती है जैसे पूवन, मोन्थन, रसथाली व ड्वार्फ कैवन्डिश किस्में पौध रोपण के 11-12 महीने में तैयार होती हैं। वहीं बसराई ड्वार्फ महाराष्ट्र क्षेत्र में 14 महीने लेती है। फूल आने से 5 माह बाद फल तैयार हो जाते हैं। सामान्यतः भारत में इसकी तुड़ाई अप्रैल से सितम्बर में की जाती है तथा उपज किस्मों के आधार पर 30 से 40 टन/हैक्टेयर होती हैं।
साधारणतया फलों को वायु रहित कमरे में रख देते हैं तथा एक कोने में धुआँ करने से 30 से 48 घण्टे में फल पककर तैयार हो जाते हैं। आजकल रसायनों तथा हार्मोन से भी फलों को पकाया जाता है। इसमें हवा रहित कमरों में एक पात्र में 200 मि. ली. ईथरेल व 10-15 ग्राम सोडियम हाइड्रोक्साइड (NaOH) का घोल प्रति क्विटल दर से रखकर छोड़ देते हैं। 48 घंटे में केले पक जाते हैं या ईथरेल के 1000 पी.पी.एम. में डुबोकर फलों को रखने पर एक जैसे सुनहरे पीले रंग के फल दूसरे दिन तैयार हो जाते हैं। पके फलों को 12-13 डिग्री सेल्सियस तापक्रम व 85-90 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता पर एक सप्ताह तक भण्डारित किया जा सकता है।
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Question 104 Marks
संतरा की फसल को हानि पहुँचाने वाले प्रमुख कीट तथा व्याधियों को उनके प्रबन्धन सहित सारणीबद्ध कीजिए।
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Question 114 Marks
नींबू की खेती का वर्णन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत कीजिए-
(अ) जलवायु व भूमि,
(ब) उन्नत किस्में,
(स) प्रवर्धन तथा पौध रोपण विधि,
(द) पौध संरक्षण।
Answer
(अ) जलवायु व भूमि (Climate & Soil)
नींबू की खेती उष्ण से शीतोष्ण जलवायु तक सफलतापूर्वक की जा सकती है। शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्र जहाँ पानी की सुविधा हो, इसकी खेती के लिए उत्तम रहते हैं। इसकी फसल बागवानी के लिये उपयुक्त तापक्रम 16 से 32° से. है। राजस्थान के उन भागों में जहाँ पाला कम पड़ता है तथा वातावरण नम व जाड़े की ऋतु लम्बी होती है, वहाँ इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है।
नींबू की खेती सभी प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है किन्तु उपजाऊ दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी गयी है। भूमि जीवांश युक्त व 2 मीटर गहरी होनी चाहिए। अधिक रेतीली व चिकनी मिट्टी इसके लिए उपयुक्त नहीं रहती है। भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
(ब) उन्नत किस्में (Improved Varieties)
भारत में उगाई जाने वाली विभिन्न किस्मों में कागजी, कागजी कलाँ, बारहमासी नींबू, इन्दौर सीडलैस, पन्त लेमन - 1 आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त कई नयी किस्में जैसे विक्रम व प्रमालिनी (एमएयू, परभनी (महाराष्ट्र), सई शर्बती (एमपीके वी, राहुरी) तथा जयदेवी (तमिल नाडु) व तेनाली (आन्ध्र प्रदेश) आदि विकसित की गयी हैं जो अधिक उपज तथा उत्तम गुणवत्ता वाली हैं।
(स) प्रवर्द्धन (Propagation)
नींबू का प्रवर्धन बीज व गूटी दाब विधियाँ व्यावसायिक तौर पर अपनायी जाती हैं।
पौध रोपण विधि (Planting Method)
नींबू के पौधे लगाने के लिए मई-जून के महीने में 75 × 75 × 75 सेमी. आकार के गड्‌ढे 5-6 × 5-6 मीटर की दूरी पर खोदे जाते हैं। उक्त गड्‌ढों को 10-15 दिन छोड़ने के बाद प्रत्येक गड्ढे में 20 किलोग्राम गोबर की खाद, 1 किलोग्राम सुपर फॉस्फेट तथा 50 से 100 ग्राम क्यूनॉलफॉस 1.5 प्रतिशत पाउडर मिट्टी के साथ मिलाकर पुनः भर देना चाहिए। जुलाई-अगस्त माह में तैयार गड्‌ढों में पौधे लगाना उपयुक्त रहता है। पौध रोपण के तुरन्त बाद सिंचाई अवश्य करें।
(द) पौध संरक्षण (Plant Protection)
कीट प्रबन्ध
(Insect management)-
1. नींबू की तितली (Lemon butterfly-Papilio demoleus)-इसके डिम्भ (Larvae) नर्सरी में व नये पौधों की नयी पत्तियों को खाकर काफी क्षति करते हैं। आरम्भ में ये चिड़ियों के विष्ठा (बीट) की तरह होते हैं जो बाद में बढ़कर 5.0 सेमी लम्बे तथा पत्तियों की भाँति हरे रंग के हो जाते हैं। इन कीटों से सबसे अधिक क्षति अप्रैल-मई तथा अगस्त से अक्टूबर माह में होती है। इसके नियंत्रण हेतु डाइमिथोएट-3 ईसी दवा 1-1.5 मिली प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें।
2. पर्ण सुरंगी (Leaf minor-Phyllocnistics citrella)-इसके लार्वा पत्तियों में अनियन्त्रित आकार की सुरंगें बनाते हैं जो मुख्यतः कोमल पत्तियों पर आक्रमण करते हैं तथा प्रकाशसंश्लेषण क्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है साथ ही ये सिट्रस केंकर रोग का भी वहन करते हैं। इसके नियंत्रण हेतु जब पेड़ों में नये फुटान हो रहे हों तो इन पर (फरवरी-मार्च व मई-जून) डाइमिथोएट 30 ईसी दवा 1-1.5 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करके नियंत्रण किया जा सकता है।
व्याधि प्रबन्ध (Disease Management)-
नींबू का केंकर (Citrus canker) यह रोग एक जीवाणु (Xanthomonas campestris pv. citri) से होता है। इस रोग में पत्तियों, टहनियों व फलों पर हल्के पीले धब्बे दिखाई देने लगते हैं जो बाद में भूरे और खुरदरे व कॉर्कनुमा हो जतो हैं। कागजी नींबू सर्वाधिक प्रभावित होता है। नया बाग हमेशा स्वस्थ पौधों से लगायें तथा रोग के फैलाव को कम करने हेतु पर्ण सुरंगी कीट का नियंत्रण करें तथा कटाई-छँटाई के बाद कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (2.5-3 ग्राम/लीटर) के साथ स्ट्रेप्टोसाइक्लिन (250 से 500 पीपीएम) की दर से घोल बनाकर मार्च माह में छिड़काव की संस्तुति की जाती है।
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Question 124 Marks
आम की फसल के प्रमुख कीट तथा व्याधियों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
Answer
सारणी-आम की फसल के प्रमुख कीट तथा व्याधियाँ
क्र. सं.कीट/व्याधिविवरणप्रबन्धन
1.कीट-मिली बग (Drosicha mangiferae)इस कीट के निम्फ मुलायम टहनियों, पुष्पक्रम तथा छोटे फलों के डण्ठलों पर एकत्रित होकर रस चूसते हैं।पेड़ के तने के चारों और पोलीथीन की ग्रीस लगी 30-40 सेमी. चौड़ी पट्टी जमीन से 60 सेमी. की ऊँचाई पर लगायें। दिसम्बर माह में खेती की जुताई करें। यदि पेड़ पर मिली बग चढ़ गयी हो तो इमिडाक्लोप्रिड 30.5 एस.सी 1-1.5 मिली दवा प्रति 3 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
2.आम का फुदका (Hopper-Amiritodus atkinsoni)सर्वाधिक नुकसान पहुँचाने वाला भूरे रंग का बहुत ही छोटा कीट (वयस्क व निम्फ) होता है व आम के फूल, छोटे फल तथा नई वृद्धि का रस चूसता है।इमिडाक्लोरप्रिड-17.5 एस.एल. दवा 1 मिली प्रति तीन लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
3.छाल भक्षक कीट (Inderbela sp.)कीट की इल्ली (Caterpillar) तने में छेद कर छाल को खाती रहती है। तने एवं शाखाओं में सुरंग बनाकर वृक्ष को खोखला बना देती है।रुई को पेट्रोल या केरोसीन या कीटनाशी (क्यूनॉलफॉस 25 ईसी) रसायन में भिगोकर कीट की सुरंगों के अन्दर भर देना चाहिए तथा ऊपर से चिकनी मिट्टी लगा दें।
4.व्याधि-चूर्णी फफूँद (Oidium mangi-ferae) कवकटहनियों, पत्तियों व पुष्पक्रमों पर सफेद चूर्ण दिखाई देती है।घुलनशील गंधक 2.5 ग्राम या कैराथेन 1 मिली. प्रति लीटर पानी में घोलकर दो बार छिड़काव करना चाहिए।
5.श्यामव्रण (Colletotrichum sp.) कवकपत्तियों पर भूरे व काले फफोलेनुमा धब्बे दिखाई देते हैं तथा पत्तियाँ गिरने लगती हैं।कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम या मेन्कोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें तथा रोगग्रस्त टहनियों व पत्तियों को काटकर नष्ट कर दें।
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