कलिकायन (Budding)- कलिकायन या चश्मा चढाने की निम्न विध्यिाँ प्रमुख हैं-
(1) टी या शील्ड कलिकायन (T) या Shield budding)- मूलवृन्त पर अंग्रेजी के टी आकार का 2.5-3.5 सेमी लम्बा कटान लगाते हैं तथा इतना ही एक समानान्तर कट देकर छाल को ढीला किया जाता है। अब शील्ड आकार की छाल जिस पर कलिका (उन्नत किस्में) हो सांकुर के रूप में लेकर इसे टी आकार में प्रविष्ट करके पॉलीथीन स्ट्रीप से अच्छी तरह बाँध देते हैं तथा बाँधते समय ध्यान रखें की कलिका कक्ष (Axil) खुला रहे, यही नये प्ररोह के रूप में आगे विकसित होगा। इसी तरह मूलवृंत पर कटाव केवल लम्बवत् हो तो आई कलिकायन, एक लम्बवत् कट के दोनों सिरों पर समानान्तर कटान करें तो एच कलिकायन तथा उल्टा शील्ड कलिकायन हो तो उल्टा टी कलिकायन (Inverted T budding) कहते हैं। इन विधियों द्वारा बेर, मौसमी, किन्नो, हाइब्रिड गुलाब, आलू बुखारा, आडू आदि का प्रवर्द्धन किया जाता है।
(2) पैबन्द कलिकायन (Patch budding)- पैच बडिंग में मूलवृन्त पर भूमि से 20-25 सेमी. ऊँचाई पर 2.5-3 सेमी. लम्बी आयताकार आकृति में छाल काट कर अलग कर दी जाती है। अब इसी आकार की कलिका छाल सहित निकालकर मूलवृन्त पर तैयार कटान पर लगा कर बांध दिया जाता है। यह विधि आँवला, अखरोट में अपनाई जाती है।
जब मूलवृन्त पर तीन तरफ कटान लगाकर छाल फ्लेप (Bark flap) को उठा लिया जाता है तथा सांकुर शाखा से कलिका युक्त छाल (आकार में मूलवृन्त के कटान से थोड़ी छोटी) इस फ्लेप में बाँध देते हैं। इसे फॉरकर्ट कलिकायन (Forket or flap budding) कहते हैं।
(3) छल्ला कलिकायन (Ring budding) - मूलवृन्त के ऊपरी भाग के कटे हुए सिरे से 2.5 सेमी. नीचे तक छाल हटाकर वलय बना दी जाती है। अब वलय के रूप में बराबर व्यास की कलिका निकाल कर पहना दी जाती है। सिनकोना, शहतूत, बेर आदि।
जब मूलवृन्त के चारों ओर से घेरे के रूप में छाल हटा कर कलिका ट्यूब रूप से निकालकर मूलवृन्त पर बाँध देते हैं। इसमें वलय न होकर कटान होता है तो फ्लूट कलिकायन (Flute budding) कहलाता है।
(4) चिप कलिकायन (Chip budding) - मूलवृत में जमीन से 1 फीट ऊँचाई पर 3.5-5 सेमी. लम्बाई का एक खांचा (Groove) तैयार किया जाता है। सांकुर शाखा को लकड़ी सहित छाल इसी आकार में काट कर लगाकर बाँध दिया जाता है। अंगूर में प्रवर्द्धन हेतु अपनाई जाती है।
(5) शिखर रोपण (Top working)- बीजू, पुराने वृक्ष निम्न श्रेणी की किस्म में कलिकायन या उपरोपण क्रिया द्वारा इच्छित किस्मों में परिवर्तित करने की विधि शिखर रोपण या टॉप वर्किंग कहलाता है। यह बीजू व जीर्णोद्धार किये जा सकने वाले वृक्षों में अपना सकते हैं। आम, अमरूद, आँवला, नींबू वर्गीय फल, सेब आदि में कर सकते हैं।
जब पुराने पौधों को बिना शिरोहीन (Head back) किये विभिन्न शाखाओं के पार्श्व में अधिक संख्या में उपरोपण या कलिकायन कर इच्छित किस्मों में परिवर्तित क्रिया अपनाई जाती हैं तो उसे फ्रेम वर्किंग (Frame working) कहते हैं।
जब किसी पौधे पर एक ही प्रकार की कलिकायन या रोपण की क्रिया लगातार दो बार की जाती है तो इसको दोहरा रोपण (Double working) कहते हैं। यह साधारणतया तभी करते हैं जब मूलवृन्त तथा शाख के बीच मिलने की असमर्थता (incompatability) को दूर करना होता है।