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प्रश्नों के उत्तर सविस्तार लिखिए : ( 4 गुण )

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Question 14 Marks
लैंगिक व अलैंगिक पौध प्रसारण पर विस्तार से लिखो।
Answer
स्वप्रयत्न
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Question 24 Marks
पौधों में अलैंगिक प्रवर्धन पर एक विस्तृत लेख लिखिए।
Answer
अलैंगिक प्रवर्द्धन में पौधे के जड़, तना, पत्तियाँ आदि के रूपान्तरण से मातृ वृक्ष के समान गुणों वाले पौधे तैयार होते हैं जिन्हें पौधे प्रसारण में उपयोग में ले सकते हैं जो निम्न हैं-
(1) ऊपरी भूस्तारी (रनर्स)- विशेष तने जो भूमि पर लेट कर बढ़ते हैं तथा भूमि के सम्पर्क पर आने पर पर्व संधि या गाँठ से जड़ें निकलकर नया पादप बन जाता है। उदाहरण - स्ट्राबेरी।
(2) अन्तः भूस्तारी (सकर्स)- भूमि के अन्दर तने जड़ तंत्र के समीप से निकले प्ररोह जिनमें अपस्थानिक (adventitious) कलिकाएँ होती हैं तथा जिनसे नया पौधा बन जाता है; उदाहरण-अनन्नास, केला, बाँस आदि।
(3) भूस्तारी (स्टोलन)- तने के आकार से निकली पार्श्व पतली शाख जिनमें पर्व संधियाँ लम्बी होती हैं तथा अन्तिम सिरे पर जड़ें निकलकर नया पौधा बनता है जैसे-दूब घास, पुदीना।
(4) शल्ककंद (बल्ब)- तने का रूपान्तर है जिसमें छोटा उर्ध्वान्तर तने का कक्ष मांसल शल्क (स्केल्स) से घिरा रहता है। इसी में भोज्य पदार्थ संग्रहित रहता है तथा बाह्य आवरण सूखा व पतला झिल्लीनुमा परत से ढका रह भी सकता है (जैसे प्याज) यह टूनिकेटेड बल्ब या बाह्य आवरण विहीन भी हो सकता है (जैसे लिली) इसे नॉन-टूनिकेटेड बल्ब कहते हैं।
(5) घनकंद (कोर्म)- तने के कक्ष का आधारीय भाग सूखे स्केल्स जैसी पत्तियों से ढका रहता है तथा इस तने पर पर्व व पर्व संधियाँ बनी रहती हैं जैसे ग्लेडियोलस, केसर, फ्रीसिया आदि। पुराने कोर्म के साथ नये छोटे-छोटे कोर्म सदृश्य संरचनाएँ कोरमेल कहलाती हैं। रोपण में साबुत (ग्लेडियोलस) या टुकड़े काटकर विभिन्न भागों जिसमें हर भाग में एक कलिका हो (याम) उपयोग में ले सकते हैं।
(6) कंद (Tuber)- भूस्तारी (स्टोलन) तने का आधार भोज्य पदार्थ का संग्रहण कर फूल जाता है। जैसे आलू, आर्टीचोक, कैलेडियम तथा इस पर बनी पर्व संधियों के कक्ष में कलिकायें होती हैं। रोपण साबुत या काटकर कर सकते हैं। कई बार ऐसे कन्द पत्तियों के कक्ष में वायवीय (Aerial) भागों में बन जाते हैं। इन संरचनाओं को ट्यूबरकल्स (Tubercles) कहते हैं जिन्हें पौध प्रसारण में उपयोग में लेते हैं। जैसे-डायोसकोरिया याम।
(7) कंदीय जड़ें (Tuberous roots) - अपस्थानिक जड़ें फूल कर भोज्य पदार्थों का संग्रहण करती हैं। इन पर पर्व व पर्व संधियाँ नहीं होतीं। इन्हें कंदीय जड़ें कहते हैं जैसे शकरकंद।
(8) राइजोम (Rhizome) - तने का रूपान्तरण जिसमें भूमिगत तना क्षैतिज रूप में वृद्धि करता है तथा इस पर पर्व व पर्व संधियाँ रहती हैं; जैसे-अदरक, हल्दी, केला, आइरिस।
(9) ऑफसूट (Off shoot) - विशेष तरह की पार्श्व शाखा जो मुख्य तने के पास से रोजेट जैसी शक्ल में निकलती है जिसे तेज धार वाले चाकू से हटाकर पौध प्रसारण में उपयोग में लेते हैं जैसे खजूर।
(10) स्लीप (Slip) - फलवृन्त से भी कभी-कभी प्ररोह निकलता है जिन्हें पौधरोपण के काम लेते हैं, स्लीप कहलाता है। उदाहरण अनन्नास।
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Question 34 Marks
कलिकायन किसे कहते हैं? इसकी विभिन्न विधियों का वर्णन कीजिए।
Answer
कलिकायन (Budding)- कलिकायन या चश्मा चढाने की निम्न विध्यिाँ प्रमुख हैं-
(1) टी या शील्ड कलिकायन (T) या Shield budding)- मूलवृन्त पर अंग्रेजी के टी आकार का 2.5-3.5 सेमी लम्बा कटान लगाते हैं तथा इतना ही एक समानान्तर कट देकर छाल को ढीला किया जाता है। अब शील्ड आकार की छाल जिस पर कलिका (उन्नत किस्में) हो सांकुर के रूप में लेकर इसे टी आकार में प्रविष्ट करके पॉलीथीन स्ट्रीप से अच्छी तरह बाँध देते हैं तथा बाँधते समय ध्यान रखें की कलिका कक्ष (Axil) खुला रहे, यही नये प्ररोह के रूप में आगे विकसित होगा। इसी तरह मूलवृंत पर कटाव केवल लम्बवत् हो तो आई कलिकायन, एक लम्बवत् कट के दोनों सिरों पर समानान्तर कटान करें तो एच कलिकायन तथा उल्टा शील्ड कलिकायन हो तो उल्टा टी कलिकायन (Inverted T budding) कहते हैं। इन विधियों द्वारा बेर, मौसमी, किन्नो, हाइब्रिड गुलाब, आलू बुखारा, आडू आदि का प्रवर्द्धन किया जाता है।
(2) पैबन्द कलिकायन (Patch budding)- पैच बडिंग में मूलवृन्त पर भूमि से 20-25 सेमी. ऊँचाई पर 2.5-3 सेमी. लम्बी आयताकार आकृति में छाल काट कर अलग कर दी जाती है। अब इसी आकार की कलिका छाल सहित निकालकर मूलवृन्त पर तैयार कटान पर लगा कर बांध दिया जाता है। यह विधि आँवला, अखरोट में अपनाई जाती है।
जब मूलवृन्त पर तीन तरफ कटान लगाकर छाल फ्लेप (Bark flap) को उठा लिया जाता है तथा सांकुर शाखा से कलिका युक्त छाल (आकार में मूलवृन्त के कटान से थोड़ी छोटी) इस फ्लेप में बाँध देते हैं। इसे फॉरकर्ट कलिकायन (Forket or flap budding) कहते हैं।
(3) छल्ला कलिकायन (Ring budding) - मूलवृन्त के ऊपरी भाग के कटे हुए सिरे से 2.5 सेमी. नीचे तक छाल हटाकर वलय बना दी जाती है। अब वलय के रूप में बराबर व्यास की कलिका निकाल कर पहना दी जाती है। सिनकोना, शहतूत, बेर आदि।
जब मूलवृन्त के चारों ओर से घेरे के रूप में छाल हटा कर कलिका ट्यूब रूप से निकालकर मूलवृन्त पर बाँध देते हैं। इसमें वलय न होकर कटान होता है तो फ्लूट कलिकायन (Flute budding) कहलाता है।
(4) चिप कलिकायन (Chip budding) - मूलवृत में जमीन से 1 फीट ऊँचाई पर 3.5-5 सेमी. लम्बाई का एक खांचा (Groove) तैयार किया जाता है। सांकुर शाखा को लकड़ी सहित छाल इसी आकार में काट कर लगाकर बाँध दिया जाता है। अंगूर में प्रवर्द्धन हेतु अपनाई जाती है।
(5) शिखर रोपण (Top working)- बीजू, पुराने वृक्ष निम्न श्रेणी की किस्म में कलिकायन या उपरोपण क्रिया द्वारा इच्छित किस्मों में परिवर्तित करने की विधि शिखर रोपण या टॉप वर्किंग कहलाता है। यह बीजू व जीर्णोद्धार किये जा सकने वाले वृक्षों में अपना सकते हैं। आम, अमरूद, आँवला, नींबू वर्गीय फल, सेब आदि में कर सकते हैं।
जब पुराने पौधों को बिना शिरोहीन (Head back) किये विभिन्न शाखाओं के पार्श्व में अधिक संख्या में उपरोपण या कलिकायन कर इच्छित किस्मों में परिवर्तित क्रिया अपनाई जाती हैं तो उसे फ्रेम वर्किंग (Frame working) कहते हैं।
जब किसी पौधे पर एक ही प्रकार की कलिकायन या रोपण की क्रिया लगातार दो बार की जाती है तो इसको दोहरा रोपण (Double working) कहते हैं। यह साधारणतया तभी करते हैं जब मूलवृन्त तथा शाख के बीच मिलने की असमर्थता (incompatability) को दूर करना होता है।
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