वह भू-परिष्करण जो किसानों द्वारा कई वर्षों से परम्परा के रूप में फसलोत्पादन के लिए किया जाता है। इसमें प्रारम्भिक तथा द्वितीयक भू-परिष्करण को सम्मिलित किया जाता है। अमेरिका के (CTIC, 1993) के अनुसार संरक्षण भू-परिष्करण वह कर्षण तथा बुआई की पद्धति है, जिसमें बुआई के पश्चात् कुल भूमि का 30 प्रतिशत भाग हमेशा पूर्व फसल अवशेषों से घिरा रहता है। संरक्षण-भू-परिष्करण को चार उपभागों में विभाजित किया जा सकता है- 1. शून्य भू-परिष्करण 2. कम किया हुआ भू-परिष्करण 3. ठूंठ पलटवार भू-परिष्करण 4. डोली भू-परिष्करण।
मिश्रित फसलों से होने वाली चार हानियाँ- (1) मिश्रित फसलें बोने से खेत में निराई-गुड़ाई हेतु कृषि यंत्रों के प्रयोग में कठिनाई आती है। (2) मिश्रित फसलों में पकने का समय अलग-अलग होने पर फसल काटने में कठिनाई होती है। मिश्रित फसलों की मशीनों से कटाई करना संभव नहीं है। (3) मिश्रित फसलों से शुद्ध बीज का उत्पादन करना असंभव है। (4) फसलों की गुणवत्ता में कमी आती है तथा कभी-कभी फसलों की उपज कम हो जाती है। फसल उत्पादन के गुणों में कमी आने से उत्पादन का बाजार मूल्य भी कम प्राप्त होता है।
भू-परिष्करण के उद्देश्यों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
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भू-परिष्करण के उद्देश्यों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है- (1) खरपतवार नष्ट करना- अनेक प्रकार की अवांछित वनस्पति मृदा सतह पर रहने से सभी पोषक तत्वों की हानि होती है। कर्षण विधियों से खरपतवारों को नष्ट कर फसलों को इनके प्रकोप से बचाया जा सकता है। (2) मृदा को ऊपर - नीचे करना - खेत में ऊपर की मृदा नीचे तथा नीचे की मृदा ऊपर सतह पर आ जाती है, जिससे पौधों को अधिक पोषक तत्व मिलते हैं। गर्मी की जुताई करते समय मिट्टी पलटने वाले हल से ये क्रिया भारी भूमि में तीन वर्ष में एक बार करनी चाहिए।
फसलों की पट्टियों या कतारों में बुआई करते समय अलग-अलग लेकिन निकटवर्ती खण्डों में भिन्न किस्मों की फसलों की बुआई की जाती है। वास्तव में एक जैसी फसल में भी ऐसे ही होता है लेकिन ये खण्ड इतने पास होते हैं कि ये एक-दूसरी फसल बहुत प्रभावित कर सकते हैं, यह व्यवहार उस स्थिति में अधिक उपयोगी रहता है जहाँ ऊँचे कद की फसलों को हवा और छाया का रुख ध्यान में रखते हुए समकोण पर पट्टियों को बोया जाता है। उदाहरण-चुकन्दर और सोयाबीन को छाया देने के लिए मक्का तथा टमाटर को छाया देने के लिए जई बोते हैं। इस पद्धति में कम से कम एक फसल से तो अच्छे विकल्प की संभावना रहती है जबकि एक जैसी (समानकद/ऊँचाई वाली) फसलों में स्थायी रूप से छाया रह सकती है।
सफल अन्तः शस्य खेती की मुख्य बातें- (1) पोषक तत्वों की आवश्यकता अलग-अलग समय पर होनी चाहिए। (2) मिश्रित फसलों की प्रकाश के प्रति प्रतिस्पर्धा कम से कम होनी चाहिए। (3) मिश्रित फसलों में परस्पर सामंजस्य होना चाहिए। (4) मिश्रित फसलों के पकने में कम से कम 30 दिन का अंतर होना चाहिए। (5) मिश्रित फसलों में कार्बन-डाइ ऑक्साइड एवं जल के प्रति प्रतिस्पर्धा कम से कम होनी चाहिए।