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Question 15 Marks
अमेरिका में अफ्रीकी लोगों से किस प्रकार का व्यवहार किया जाता था? रोजा पार्क्स ने इसका विरोध किस प्रकार किया? इसके क्या परिणाम हुए?
Answer
अमेरिका में अफ्रीकी लोगों के साथ व्यवहार
(i) संयुक्त राज्य अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकन लोग, जिनके पूर्वज गुलाम थे और अफ्रीका से लाये गए थे, वे आज भी अपने जीवन को मुख्य रूप से असमान बताते हैं।
(ii) 1950 के अंतिम दशक में अफ्रीकी-अमेरिकनों के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका में बहुत असमानता का व्यवहार होता था। कानून भी उन्हें समान नहीं मानता था। उदाहरण के लिए बस से यात्रा करते समय उन्हें बस में पीछे बैठना पड़ता था या जब भी कोई गोरा आदमी बैठना चाहे, उन्हें अपनी सीट से उठ जाना पड़ता था।
रोजा पार्क्स का संघर्ष-
- रोजा पार्क्स एक अफ्रीकी-अमेरिकन महिला थी। दिसम्बर 1955 में दिन भर काम करके थक जाने के बाद बस में उन्होंने अपनी सीट एक गोरे व्यक्ति को देने से मना कर दिया।
- उस दिन उसके इंकार से अफ्रीकी-अमेरिकनों के साथ असमानता को लेकर एक विशाल आंदोलन प्रारंभ हो गया, जो नागरिक अधिकार आंदोलन कहलाया।
परिणाम-
- 1964 के नागरिक अधिकार अधिनियम ने नस्ल, धर्म और राष्ट्रीय मूल के आधार पर भेदभाव को निषेध कर दिया गया।
- इस अधिनियम ने यह भी कहा कि अफ्रीकी-अमेरिकन बच्चों के लिए सब स्कूलों के दरवाजे खोले जाएंगे और उन्हें अलग स्कूलों, जो केवल उनके लिए ही खोले गए थे, मैं नहीं जाना पड़ेगा।
- इतना होने के बावजूद भी अधिकांश अफ्रीकीअमेरिकन गरीब हैं। उनके बच्चे केवल सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने की ही सामर्थ्य रखते हैं, जहाँ कम सुविधाएँ हैं और कम योग्यता वाले शिक्षक हैं। इस प्रकार गोरे विद्यार्थी निजी स्कूलों का स्तर, सरकारी स्कूलों के स्तर से ऊँचा है।
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Question 25 Marks
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने स्कूल में अपने साथ हुए असमानता के व्यवहार का वर्णन किस प्रकार किया है?
Answer
ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा 'जूठन' में लिखा है कि-
(1) "स्कूल में उसे दूसरों से दूर बैठना पड़ता था, वह भी जमीन पर। अपने बैठने की जगह तक आते-आते चटाई छोटी पड़ जाती थी।
(2) कभी-कभी तो एकदम पीछे दरवाजे के पास बैठना पड़ता था, जहाँ से बोर्ड पर लिखे अक्षर धुंधले दिखते थे।
(3) कभी-कभी बिना कारण पिटाई भी कर देते थे।
(4) जब वे कक्षा चार में थे, प्रधानाध्यापक ने ओमप्रकाश से स्कूल और खेल के मैदान में झाडू लगाने को कहा। वे लिखते हैं, "लंबा-चौड़ा मैदान मेरे वजूद से कई गुना बड़ा था, जिसे साफ करने में मेरी कमर दर्द करने लगी थी। धूल से चेहरा, सिर अट गया था। मुंह के भीतर धूल घुस गई थी। मेरी कक्षा में बाकी बच्चे पढ़ रहे थे और मैं झाडू लगा रहा था। हेडमास्टर अपने कमरे में बैठे थे लेकिन निगाह मुझ पर टिकी थी। पानी पीने तक की इजाजत नहीं थी। पूरा दिन मैं झाडू लगाता रहा।.... स्कूल के कमरों की खिड़की, दरवाजों से मास्टरों और लड़कों की आँखें छिपकर तमाशा देख रही थीं।"
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