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Question 15 Marks
भारत के वन्य प्राणी जगत की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Answer
भारत के वन्य प्राणी जगत की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-
भारत में जीवों की 90,000 प्रजातियाँ मिलती हैं।
देश में 2,000 से अधिक पक्षियों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह कुल विश्व का 13 प्रतिशत है।
यहाँ मछलियों की 2,546 प्रजातियाँ हैं, जो विश्व की लगभग 12 प्रतिशत है।
भारत में विश्व के 5 से 8 प्रतिशत तक उभयचरी, सरीसृप तथा स्तनधारी जानवर भी पाए जाते हैं।
हाथी. एक सींग वाले गेंडे, जंगली गधे, ऊँट, भारतीय भैंसा, नीलगाय, चौसिंघा, छोटा मृग (गजल), विभिन्न प्रजातियों के हिरण तथा बन्दर यहाँ पाये जाने वाले मुख्य जानवर हैं। भारत में शेर तथा बाघ दोनों पाये जाते हैं। शेर तथा बाघ दोनों के आवास वाला भारत विश्व का अकेला देश है। तेंदुआ भी यहाँ प्रमुखता से पाया जाता है।
लद्दाख की बर्फीली ऊँचाइयों में याक पाए जाते हैं, जो गुच्छेदार सींगों वाला बैल जैसा जीव है, जिसका भार लगभग एक टन होता है।
तिब्बतीय बारहसिंघा, भारल (नीली भेड़), जंगली भेड़ तथा कियांग (तिब्बती जंगली गधे) भी यहाँ पाए जाते हैं। कहीं-कहीं लाल पांडा भी कुछ भागों में मिलते हैं।
नदियों, झीलों तथा समुद्री क्षेत्रों में कछुए, मगरमच्छ और घड़ियाल पाए जाते हैं। घड़ियाल, मगरमच्छ की प्रजाति का एक ऐसा प्रतिनिधि है, जो विश्व में केवल भारत में पाया जाता है।
भारत में अनेक रंग-बिरंगे पक्षी पाए जाते हैं । मोर, बत्तख, तोता, मैना, सारस तथा कबूतर आदि कुछ पक्षी प्रजातियाँ हैं जो देश के वनों तथा आर्द्र क्षेत्रों में रहती हैं।
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Question 25 Marks
भारत में पाई जाने वाली वनस्पति के किन्हीं चार प्रकारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिये।
Answer
भारत में पाई जाने वाली वनस्पति के प्रकार भारत में निम्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पतियाँ पाई जाती हैं-
(1) उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन या वर्षा वन-ये वन 200 सेमी. से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं। पश्चिमी घाटों के अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों, लक्षद्वीप, अण्डमान और निकोबार द्वीप-समूहों, असम के ऊपरी भागों तथा तमिलनाडु के तट पर ये वन पाये जाते हैं। इन वनों में वृक्ष 60 मीटर या इससे भी अधिक ऊँचाई के हो सकते हैं। इन वनों में आबनूस (एबोनी), महोगनी, रोज़वुड, रबड़ और सिनकोना के वृक्ष पाये जाते हैं। हाथी, बन्दर, लैमूर, वर सामान्य रूप से मिलते हैं। असम और पश्चिमी बंगाल के दलदली क्षेत्रों में एक सींग वाले गैंडे मिलते हैं। इनके अतिरिक्त कई प्रकार के पक्षी, चमगादड़ तथा रेंगने वाले जीव भी मिलते हैं।
(2) उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन-ये मानसूनी वन भी कहलाते हैं। 70 सेमी. से 200 सेमी. तक वर्षा वाले क्षेत्रों में ये वन पाये जाते हैं। ये वन भारत में सबसे अधिक क्षेत्र पर फैले हुए हैं। इन वनों के वृक्ष ग्रीष्म ऋतु में लगभग दो माह के लिए अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं। इन्हें दो भागों-(i) आई पर्णपाती वन तथा (ii) शुष्क पर्णपाती वनों में बाँटा जा सकता है। सागोन इन वनों का प्रमुख वृक्ष है। इसके अलावा बांस, साल, शीशम, चन्दन, खैर, कुसुम, अर्जुन, शहतूत, पीपल तथा नीम के वृक्ष मिलते हैं। शेर, बाघ, सुअर, हिरण, हाथी, छिपकली, साँप, कछुए, विविध प्रकार के पक्षी आदि जीव पाये जाते हैं।
(3) कंटीले वन तथा झाड़ियाँ-70 सेमी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कंटीले वन तथा झाड़ियाँ पाई जाती हैं। गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा हरियाणा के अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में इस प्रकार की वनस्पति पाई जाती है।
अकासिया, खजूर (पाम), यूफोरबिया तथा नागफनी (कैक्टाई) यहाँ की मुख्य पादप प्रजातियाँ हैं। इन वनों में प्रायः चूहे, खरगोश, लोमड़ी, भेड़िए, शेर, बाघ, जंगली गधा, घोड़े तथा ऊँट पाए जाते हैं।
(4) पर्वतीय वन-पर्वतीय वन पर्वतों पर पाये जाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान की कमी तथा ऊँचाई के साथ साथ प्राकृतिक वनस्पति में भी अन्तर दिखाई देता है।
(i) 1,000 मी. से 2,000 मी. तक की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आर्द्र शीतोष्ण कटिबन्धीय वन पाए जाते हैं। चौड़ी पत्ती वाले ओक तथा चेस्टनट यहाँ के प्रमुख वृक्ष हैं।
(ii) 1,500 से 3,000 मी. की ऊँचाई के बीच शंकुधारी वृक्ष जैसे चीड़ (पाइन), देवदार, सिल्वर-फर, स्यूस, सीडर आदि पाए जाते हैं। ये वन प्रायः हिमालय की दक्षिणी ढलानों, दक्षिण और उत्तर-पूर्व भारत के अधिक ऊँचाई वाले भागों में पाए जाते हैं। (iii) इससे अधिक ऊँचाई पर प्रायः शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदान पाए जाते हैं।
(iv) 3,600 मी. से अधिक ऊँचाई पर अल्पाइन वनस्पति मिलती है। सिल्वर-फर, जूनिपर, पाइन व बर्च इन वनों के मुख्य वृक्ष हैं। हिमरेखा के निकट इन वृक्षों के आकार छोटे होते जाते हैं। अन्ततः झाड़ियों के रूप के बाद वे अल्पाइन घास के मैदानों में विलीन हो जाते हैं। अधिक ऊँचाई वाले भागों में मॉस, लिचन घास, टुंडा वनस्पति का एक भाग है।
पर्वतीय वनों में प्रायः कश्मीरी महामृग, चितरा हिरण, जंगली भेड़, खरगोश, तिब्बतीय बारहसिंघा, याक, हिम तेंदुआ, गिलहरी, रीछ, आइबैक्स, कहीं-कहीं लाल पांडा, घने बालों वाली भेड़ तथा बकरियाँ पाई जाती हैं।
(5) मैंग्रोव वन-घने मैंग्रोव एक प्रकार की वनस्पति है जिसमें पौधों की जड़ें पानी में डूबी रहती हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियों के डेल्टा भाग में यह वनस्पति मिलती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में सुन्दरी वृक्ष पाए जाते हैं जिनसे मजबूत लकड़ी प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त नारियल, ताड़, क्योड़ा एवं ऐंगार के वृक्ष इन वनों में पाए जाते हैं।
रॉयल बंगाल टाइगर इस क्षेत्र का प्रसिद्ध जानवर है। इसके अतिरिक्त कछुए, मगरमच्छ, घड़ियाल एवं कई प्रकार के साँप भी इन जंगलों में मिलते हैं।
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Question 35 Marks
भारतीय जलवायु में कितने प्रकार की वनस्पति पायी जाती है? इनके नाम लिखो।
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Question 45 Marks
भारत में पाई जाने वाली वनस्पति के प्रमुख प्रकारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
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Question 55 Marks
वनस्पति तथा वन्य प्राणियों में विविधता के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।
Answer
विश्व में वनस्पति तथा वन्यप्राणियों में बहुत विविधता पाई जाती है। हमारे भारत देश में भी वनस्पति तथा जीवों की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। एक क्षेत्र की वनस्पति तथा वन्य-जीव अन्य क्षेत्र की वनस्पति तथा वन्य जीवों से भिन्न होते हैं। इसके निम्न प्रमुख कारण हैं-
(1) धरातल-जैसा धरातल होता है वैसी ही वनस्पति तथा जीव-जन्तु होते हैं। धरातल में दो तत्त्व इनकी विविधता को प्रभावित करते हैं।
(i) भू-भाग-भू-भाग वनस्पति पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार का प्रभाव पड़ता है। पर्वत, पठार, मैदान और शीतोष्ण कटिबन्धों में एक ही प्रकार की वनस्पति नहीं होती। धरातल के स्वभाव का वनस्पति पर बहुत प्रभाव पड़ता है। उपजाऊ भूमि पर प्रायः कृषि की जाती है। ऊबड़-खाबड़ तथा असमतल भू-भाग पर जंगल तथा घास के मैदान हैं, जिनमें वन्य प्राणियों को आश्रय मिलता है। पर्वतों पर वन मिलते हैं।
(ii) मृदा-मृदा के अनुसार भी वनस्पति में विविधता मिलती है। मरुस्थल की बलुई मृदा में कंटीली झाड़ियाँ तथा नदियों के डेल्टा क्षेत्र में पर्णपाती वन पाए जाते हैं। पर्वतों की ढलानों में जहां मृदा की परत गहरी है, शंकुधारी वन पाए जाते हैं।
(2) जलवायु-जलवायु के निम्न तत्त्व वनस्पति तथा वन्य प्राणियों को प्रभावित करते हैं-
(i) तापमान-वनस्पति की विविधता तथा विशेषताएँ तापमान और वायु की नमी पर भी निर्भर करती हैं। हिमालय पर्वत की ढलानों तथा प्रायद्वीप के पहाड़ियों पर 915 मी. की ऊँचाई से ऊपर तापमान में गिरावट वनस्पति के पनपने और बढ़ने को प्रभावित करती है और उसे उष्ण कटिबन्धीय से उपोष्ण, शीतोष्ण तथा अल्पाइन वनस्पतियों में परिवर्तित करती है। शीत प्रदेशों तथा उष्ण प्रदेशों के वन्य प्राणियों में भी अन्तर पाया जाता है।
(ii) सूर्य का प्रकाश-सूर्य के प्रकाश की उपलब्धता में अन्तर के कारण भी वनस्पति में विविधता पाई जाती है। किसी भी स्थान पर सूर्य के प्रकाश का समय, उस स्थान के अक्षांश, समुद्र तल से ऊँचाई एवं ऋतु पर निर्भर करता है। प्रकाश अधिक समय तक मिलने के कारण वृक्ष गर्मी की ऋतु में जल्दी बढ़ते हैं। प्रकाश के अभाव में उनकी वृद्धि प्रभावित होती है।
(iii) वर्षण-भारत में लगभग सारी वर्षा आगे बढ़ते हुए दक्षिण-पश्चिमी मानसून (जून से सितम्बर तक) एवं नसून से होती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा वाले क्षेत्रों की अपेक्षा सघन वन पाए जाते हैं।
वनस्पति की विविधता के अनुसार जीवों की प्रजातियों में भी विविधता पाई जाती है। क्योंकि वनस्पति तथा जीव दोनों एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित होते हैं।
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