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अपठित काव्यांश question types

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Sample Questions

अपठित काव्यांश questions

One sample from each question group in this chapter. Select any group above to see the full set with answer keys.

मिला खोजती थी जिसको हे बचपन ठगा दिया तूने।
अरे जवानी के फंदे में मुझको फंसा दिया तूने।
माना, मैने, युवाकाल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरूषार्थ, ज्ञान का उदय मोहने वाला है।
किन्तु यह झंझट है भारी, युद्ध क्षेत्र संसार बना।
चिन्ता के चक्कर में पढ़कर, जीवन भी है भार बना।
आजा बचपन एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली यह अपनी प्राकृत विश्रांति।
Questions :
i) लेखक को किसने ठगा है ?
ii) लेखक के लिए संसार कैसा बन गया है ?
iii) युवाकाल की कौनसी विशेषता लेखक को मोहित करती है ?
iv) 'अरे जवानी के फंदे में मुझको फंसा दिया तूने' लेखक को जवानी फन्दे के समान क्यों लगती है ?
v) लेखक बचपन को पुनः क्यों बुलाना चाहता है ?
vi) बचपन से किस विश्रांति की मांग लेखक कर रहा है ?
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जो जीवन की धूल चाटकर बड़ा हुआ है, 
तूफानों से लड़ा, और फिर खड़ा हुआ है, 
जिसने सोने को खोदा - 
लोहा मोड़ा है, 
जो जीवन की आग जलाकर आग बना है,
फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है, 
जिसने शोषण को तोड़ा 
शासन को मोड़ा है, 
जो युग के रथ का घोड़ा है, 
वह जन मारे नहीं मरेगा 
प्रश्न :
(अ) "जो जीवन की आग जलाकर आग बना"-इस पंक्ति में 'आग बना' से क्या आशय है? 
(ब) कवि ने किस जन की विशेषताओं का उल्लेख किया है?
(स) "युग के रथ का घोड़ा है"-इस पंक्ति का आशय क्या है? लिखिए। 
(द) "वह जन मारे नहीं मरेगा"-इसका अभिप्राय क्या है? 
(य) इस काव्यांश में 'नहीं मरेगा' की आवृत्ति कवि का कौनसा भाव प्रदर्शित करती है। 
(र) प्रस्तुत काव्यांश का उचित शीर्षक बताइए। 
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अगर तुम ठान लो तो आँधियों को मोड़ सकते हो,
अगर तुम ठान लो तारे गगन के तोड़ सकते हो,
अगर तुम ठान लो तो विश्व के इतिहास में अपने - 
सुयश का एक नव अध्याय भी तुम जोड़ सकते हो,
तुम्हारे बाहुबल पर विश्व को भारी भरोसा है - 
उसी विश्वास को फिर आज जन-जन में जगाओ तुम। 
पसीना तुम अगर इसमें अपना मिला दोगे,
करोड़ों दीन-हीनों को नया जीवन दिला दोगे।
तुम्हारी देह के श्रम-सीकरों में शक्ति है इतनी
कहीं भी धूल में तुम फूल सोने के खिला दोगे।
नया जीवन तुम्हारे हाथ का हल्का इशारा है, 
इशारा कर वही इस देश को फिर लहलहाओ तुम। 
प्रश्न :
(अ) विश्व के इतिहास में अपना सुयश कौन और कैसे लिख सकते हैं? 
(ब) दीन-हीनों को नया जीवन कब मिल सकता है? 
(स) "कहीं भी धूल में तुम फूल सोने का खिला दोगे"-इसका आशय लिखिए। 
(द) इस काव्यांश का केन्द्रीय भाव बताइये। 
(य) नवयुवकों से क्या-क्या करने का आग्रह किया जा रहा है? 
(र) युवक यदि परिश्रम करें, तो क्या लाभ होगा? 
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भाव कर्म में जहाँ साम्य हो सन्तत 
जग जीवन में हों विचार जन के रत; 
ज्ञान वृद्ध, निष्क्रिय न जहाँ मानव मन, 
मृत आदर्श न बन्धन, सक्रिय जीवन! 
रूढ़ि रीतियाँ जहाँ न हों आधारित, 
श्रेणि वर्ग में मानव नहीं विभाजित! 
धन बल से हो जहाँ न जन श्रम शोषण,
पूरित भव-जीवन के निखिल प्रयोजन! 
जहाँ दैन्य जर्जर, अभाव ज्वर पीड़ित, 
जीवन-यापन हो न मनुज को गर्हित 
युग-युग के छायाभासों से भासित । 
मानव के प्रति मानव मन हो न सशंकित!
प्रश्न :
(अ) "युग-युग के छायाभासों से भासित"-इस पंक्ति में 'छायाभासों' से कवि का क्या तात्पर्य है? 
(ब) कवि ने नये समाज की रचना हेतु क्या कामना की है? 
(स) "भाव कर्म में जहाँ साम्य" इससे कवि का क्या आशय है? 
(द) "मानव के प्रति मानव मन न हो सशंकित"-यह स्थिति कब बनती है? लिखिए। 
(य) कवि के अनुसार जनहित कब हो सकता है?
(र) 'मानव के प्रति मानव मन न हो सशंकित' इसमें अलंकार बताइए। 
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लाल चेहरा है नहीं, 
फिर लाल किसके? 
लाल खून नहीं 
अरे कंकाल किसके? 
प्रेरणा सोयी कि 
आटा-दाल किसके? 
सिर न चढ़ पाया 
कि छापा-माल किसके? 
वेद की वाणी कि हो आकाश-वाणी 
धूल है जो जग नहीं पायी जवानी। 
प्रश्न :
(अ) "लाल खून नहीं"-इस पंक्ति में 'लाल' किसका प्रतीक है? 
(ब) कवि ने जवानी (यौवन) की क्या विशेषता बतायी है? 
(स) "लाल चेहरा है नहीं" इससे क्या आशय है?
(द) "वेद की वाणी कि हो आकाश-वाणी" इससे कवि ने क्या भाव व्यक्त किया है? 
(य) 'सिर न चढ़ पाया कि छापा-माल किसके?' इस पंक्ति का क्या तात्पर्य है? 
(र) इस काव्यांश का मूल भाव क्या है?
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