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Model Paper 2 question types

49 questions across 11 question groups — pick any mix to generate a Hindi -अनिवार्य paper with step-by-step answer keys.

49
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Sample Questions

Model Paper 2 questions

One sample from each question group in this chapter. Select any group above to see the full set with answer keys.

जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैंकपास
पृथ्वी घूमती हुई आती हैउनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर
छत्तों के खतरनाक किनारों तक-
उस समय गिरने से चचाता है उन्हें
सिर्फ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज
एक धागे के सहारे।
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प्रातः नभ था बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)
बहुत काली सिल जरा सेलाल केसर से
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चॉक
मल दी हो किसी ने।
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फिर जीजी बोली, 'देख तू तो अभी से पढ़-लिख गया है। मैंने तो गाँव के मदरसे का भी मुँह नहीं देखा। पर एक बात देखी है कि अगर तीस-चालीस मन गेहूँ उगाना है तो किसान पाँच-छः सेर अच्छा गेहूँ अपने पास से लेकर जमीन में क्यारियाँ बना कर फेंक देता है। उसे बुवाई कहते हैं। यह जो सूखे में हम अपने घर का पानी इन पर फेंकते हैं वह भी बुवाई है। यह पानी गली में बोएँगे तो सारे शहर, कस्बा, गाँव पर पानी वाले बादलों की फसल आ जाएगी। हम बीज बनाकर पानी देते हैं. फिर काले मेघा से पानी माँगते हैं। सब ऋषि-मुनि कह गए हैं कि पहले खुद दो तब देवता तुम्हें चौगुना -अठगुना करके लौटाएँगे भइया, यह तो हर आदमी का आचरण है, जिससे सब का आचरण बनता है। यथा राजा तथा प्रजा सिर्फ यही सच नहीं है। सच यह भी है कि यथा प्रजा तथा राजा। यही तो गाँधी जी महाराज कहते हैं।'
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बाजार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है ? और जो नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, अपनी 'पर्चेजिंग पावर' के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शक्ति-शैतानी शक्ति, व्यंग्य की शक्ति ही बाजार को देते हैं। न तो वे बाजार से लाभ उठाते हैं, न उस बाजार को सच्चा लाभ दे सकते हैं। वे लोग बाजार का बाजारूपन बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि कपट बढ़ाते हैं। कपट की बढ़ती का अर्थ परस्पर के सद्भाव की घटी। इस सदभाव के हास पर आदमी आपस में भाई-भाई और सुहद और पड़ोसी फिर रह ही नहीं जाते हैं और आपस में कोरे ग्राहक और बेशक की तरह व्यवहार करते हैं। मानो दोनों एक-दूसरे को ठगने की घात में हों। एक की हानि में दूसरे का अपना लाभ दिखता है और यह बाजार का, बल्कि इतिहास का सत्य माना जाता है ऐसे बाजार को बीच में लेकर लोगों में आवश्यकताओं का आदान-प्रदान नहीं होता बल्कि शोषण होने लगता है तब कपट सफल होता है, निष्कपट शिकार होता है।
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वह आता-
दो टूक कलेजे के करता,पछताता
पथ पर जाता।
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी-भर दाने को-भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता
दो टूक कलेजे के करता,पछताता
पथ पर जाता।
साथ दो बच्चे भी है सदा हाथ फैलाए,
बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,
दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाए।
भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?
घूँट आँसुओं का पीकर रह जाते।
(i) उपर्युक्त पद्यांश में किसका चित्रण है ?
(ii) 'दो टूक कलेजे के करता, पछताता' पंक्ति का आशय क्या है ?।
(iii) 'घूँट आँसुओं का पीकर रह जाते' से क्या तात्पर्य है ?
(iv) पद्यांश का मूल भाव लिखिए।
(v) कवि के अनुसार रास्ते पर कौन चला जा रहा है ?
(vi) उपर्युक्त पह्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
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हमारे व्यावहारिक और भावात्मक जीवन से जिस भाषा का संबंध सदा से चला आ रहा है वह पहले चाहे जो कुछ कही जाती रही हो अब हिन्दी कही जाती है। इसका एक-एक शब्द हमारी सत्ता का व्यंजक है, हमारी संस्कृति का संपुट है, हमारी जन्मभूमि का स्मारक है, हमारे हृदय का प्रतिबिंब है, हमारी बुद्धि का वैभव है। देश की जिस प्रकृत्ति ने हमारे हृदय में रूप-रंग भरा है उसी ने हमारी भाषा का भी रूप रंग खड़ा किया है। यहाँ के वन, पर्वत, नदी, नाले, वृक्ष, लता, पशु-पक्षी सब इसी हमारी बोली में अपना परिचय देते हैं और अपनी और हमें खींचते हैं। इनकी सारी रूप-छटा, सारी भाव-भंगिमा हमारी भाषा में और हमारे साहित्य में समाई हुई है। यह वहीं भाषा है जिसकी धारा कभी संस्कृत के रूप में बहती थी। फिर प्राकृत और अपभ्रंश के रूप में और इधर हजार वर्ष से इस वर्तमान रूप में - जिसे हिन्दी कहते हैं -लगातार बहती चली आ रही है।  यह वही भाषा है, जिसमें सारे उत्तरी भारत के बीच चंद और जगनिक ने वीरता की उमंग उठाई है, कबीर, सूर और तुलसी ने भक्ति की धारा बहाई, बिहारी, देव और पद्माकर ने श्रृंगार रस की चर्चा की,  भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र ने आधुनिक युग का आभास दिया और आज आप व्यापक दृष्टि फैलाकर सम्पूर्ण मानव जगत् के मेल में लाने वाली भावनाएँ भर रहे हैं। हजारों वर्ष से यह दीर्घ परंपरा अखंड चली आ रही है। ऐसी भव्य परंपरा का गर्व जिसे न हो वह भारतीय नहीं। 
(i) गद्यांश का उचित शीर्षक क्या होना चाहिए ? 
(ii) हिन्दी भाषा और प्रकृति का अभिन्न संबंध कैसे है ? 
(iii) हिन्दी भाषा की परम्परा क्या रही है ? 
(iv) हिन्दी भाषा का संबंध किससे है ?
(v) हमारी भाषा का रूप रंग किसने खड़ा किया है ?
(vi) हमारी बोली में अपना परिचय कौन-कौन देते हैं ?
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सचिव माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान, अजमेर की ओर से बोर्ड की पाठ्य पुस्तकें क्रय करने की सूचना हेतु विज्ञप्ति तैयार कीजिए।
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जब यशोधरा बाबू सब्जी लेकर घर पहुँचे तो उनकी दशा कैसी थी?
  • A
    द्वारिका जाने वाले सुदामा जैसी
  • B
    द्वारिका से लौटे सुदामा जैसी
  • C
    बचपन के सुदामा जैसी
  • D
    सुबह घर से जैसे गए थे वैसी ही
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