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अपठित गद्यांश question types

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अपठित गद्यांश questions

One sample from each question group in this chapter. Select any group above to see the full set with answer keys.

     वास्तव में मनुष्य स्वयं का देख नहीं पाता। उसके नेत्र दूसरों के चरित्र को देखते हैं, उसका हृदय दूसरों के दोषों को अनभव करता है। उसकी वाणी दसरों के अवगणों का विश्लेषण कर सकती है, किंत उसका अपना चरित्र, उसके अपने दोष एवम् उसके अवगुण, मिथ्याभिमान और आत्मगौरव के काले आवरण में इस प्रकार प्रच्छन्न रहते हैं कि जीवनपर्यंत उसे दृष्टिगोचर ही नहीं हो पाते। इसीलिए मनुष्य स्वयं को सर्वगुण-संपन्न देवता समझ बैठता है। व्यक्ति स्वयं के द्वारा जितना छला जाता है उतना किसी अन्य के द्वारा नहीं। 
     आत्मविश्लेषण कोई सहज़ कार्य नहीं। इसके लिए उदारता, सहनशीलता एवम् महानता की आवश्यकता होती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि आत्म विश्लेषण मनुष्य कर ही नहीं सकता। अपने गुणों-अवगुणों की अनुभूति मनुष्य को सदैव रहती है। अपने दोषों से वह हर पल अवगत रहता है, किन्तु अपने दोषों को मानने के लिए तैयार न रहना ही उसकी दुर्बलता होती है और यही उसे आत्म-विश्लेषण की क्षमता नहीं दे पाती। उसमें इतनी उदारता और हृदय की विशालता ही नहीं होती कि वह अपने दोषों को स्वयं देखकर ठीक कर सके। इसके विपरीत पर निंदा एवम् पर दोष दर्शन में अपना कुछ नहीं बिगड़ना, उल्टे मनुष्य आनन्द अनुभव करता है, परंतु आत्मविश्लेषण करके अपने दोष देखने से मनुष्य के अहंकार को चोट पहुँचती है। 
प्रश्न :
(क) 'वास्तव में मनुष्य स्वयं को देख नहीं पाता' इस वाक्य का आशय प्रकट कीजिए। 
(ख) मनुष्य द्वारा दूसरों के अवगुण देखने तथा अपने अवगुणों को न देख पाने के पीछे क्या कारण है? 
(ग) मनुष्य को अपने बारे में क्या भ्रम हो जाता है?
(घ) मनुष्य किसके द्वारा छला जाता है तथा क्यों? 
(ङ) आत्म-विश्लेषण किसको कहते हैं? 
(च) उपर्युक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए। 
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   नेतागिरी का लोभ नि:संदेह मनुष्य को पतित बनाता जा रहा है। सारा संसार नेतृत्व की अभिलाषा का शिकार होता जा रहा है। भाषण, गर्जन, तिकड़म और छल, झूठे वायदों और धोखे की कसमों से सारा सार्वजनिक वातावरण कोलाहलपूर्ण हो गया है। जहाँ देखो वहीं नेताजी नजर आएंगे। लगता यह है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अब नेता बनना चाहता है भले ही उसका कोई अनुगमन करने वाला न हो। जब मनुष्य ठान लेता है कि उसे अपने क्षेत्र में आगे बढ़ना है तब साध्य का आकर्षण उसके भीतर प्रबल हो उठता है और साधन की महत्ता गौण हो जाती है। 
    साधन की महिमा समझने वाला व्यक्ति गलत मार्ग से चलकर आगे आना नहीं चाहेगा और नेतृत्व का लोगे आना नहीं चाहेगा और नेतत्व का लोभ साधन की महिमा को कम करता है। वास्तव में व्यक्ति को अग्रसर होने की आकांक्षा रखना अस्वाभाविक नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ना चाहता है, बढ़ना चाहिए, तभी विश्व में विकास हो सकेगा, मानव-समाज उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा। किंतु आगे बढ़ने की आकांक्षा रखने वाले व्यक्ति को इतना अवश्य देख लेना चाहिए कि स्वयं को आगे बढ़ाने के प्रयत्न में वह उन मूल्यों को तो नहीं कुचल रहा है, जो किसी मनुष्य के वैयक्तिक विकास में कई गुणा मूल्यवान होते हैं। 
प्रश्न :
(क) आज मनुष्य का पतन किस कारण हो रहा है? 
(ख) “जहाँ देखो वहीं नेताजी नज़र आएँगे" का आशय प्रकट कीजिए। 
(ग) वातावरण को प्रदूषित करने में नेताओं का क्या हाथ है? 
(घ) अनुयायी की आवश्यकता किसलिए होती है? इस सम्बन्ध में भारत के नेताओं की क्या दशा है? 
(ङ) साध्य का आकर्षण बढ़ने पर मनुष्य क्या करता है? 
(च) इस गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए। 
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     संसार में अमरता ऐसे ही लोगों को मिलती है जो अपने पीछे कुछ आदर्श छोड़ जाते हैं। बहुधा देखा गया है कि ऐसे व्यक्ति सम्पन्न परिवार में बहुत कम पैदा होते हैं। अधिकांश ऐसे लोगों का जन्म मध्यम वर्ग के घरों में या गरीब परिवारों में ही होता है। इस तरह उनका पालन-पोषण साधारण परिवार में होता है और वे सादा जीवन बिताने के आदी हो जाते हैं। - मनुष्य में विनय, उदारता, सहिष्णुता और साहस आदि चारित्रिक गुणों का विकास अत्यावश्यक है। इन गुणों का प्रभाव उसके जीवन पर पड़ता है। ये गुण व्यक्ति के जीवन को अहंकारहीन और सरल बनाते हैं। सादगी का विचारों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। 
     सादा जीवन व्यतीत करना चाहिए और अपने विचारों को उच्च बनाए रखना चाहिए। व्यक्ति की सच्ची पहचान उसके विचारों और करनी से होती है। मनुष्य के विचार उसके आचरण पर प्रभाव डालते हैं और उसके विवेक को जाग्रत रखते हैं। विवेकशील व्यक्ति ही अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखता है। उन्हें अपने ऊपर हावी नहीं होने देता। सादा जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति को कभी हतप्रभ होकर अपने आत्मसम्मान पर आँच नहीं आने देनी चाहिए। सादगी मनुष्य के चरित्र का अंग है, वह बाहरी चीज नहीं है। महात्मा गाँधी सादा जीवन पसन्द करते थे और हाथ के कते और बुने खद्दर के मामूली वस्त्र पहनते थे, किन्तु अपने उच्च विचारों के कारण वे संसार में वंदनीय हो गए।
(क) संसार में अमर कौन हो पाते हैं? 
(ख) अमरता पाने वालों का जन्म कैसे परिवार में होता है ? 
(ग) अमरता पाने वालों को कैसा जीवन बिताने की आदत होती है? 
(घ) मनुष्य पर किन गुणों का प्रभाव जीवन-भर पड़ता है? 
(ङ) सादा जीवन बिताने की आदत मनुष्य में कैसे पैदा होती है? 
(च) प्रस्तत गद्यांश का एक उचित शीर्षक लिखिए। 
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     बातचीत का भी एक विशेष प्रकार का आनंद होता है। जिनको इस आनंद को भोगने की आदत पड़ जाती है, वे इसके लिए अपना खाना-पीना तक छोड़ देते हैं, अपना नुकसान कर बैठते हैं, लेकिन बातचीत से प्राप्त आनंद को नहीं छोड़ते। जिनसे केवल पत्र-व्यवहार है, कभी एक बार भी साक्षात्कार नहीं हुआ, उन्हें अपने प्रेमी से बात करने की अत्यधिक लालसा होती है। अपने मन के भावों का दूसरों के सम्मुख प्रकट करने और दूसरों के अभिप्राय को स्वयं ग्रहण करने का एकमात्र साधन शब्द ही है।
      बेन जानसन का यह कथन उचित प्रतीत होता है कि बोलने से ही मनुष्य के रूप का साक्षात्कार होता है। बातचीत की सीमा दो से लेकर वहाँ तक रखी जा सकती है जहाँ वह जमात, मीटिंग या सभा न समझ ली जाए। एडीसन का मत है कि असल बातचीत सिर्फ दो में हो सकती है। जब दो से तीन हुए तब वह दो की बात कोसों दूर चली जाती है। चार से अधिक की बातचीत केवल राम रमौवल कहलाती है, इसलिए जब दो आदमी परस्पर बैठे बातें कर रहे हों और तीसरा वहाँ आ जाए तो उसे मूर्ख और अज्ञानी समझते हैं। इस बातचीत के अनेक भेद हैं। दो बुड्ढों की बातचीत प्रायः जमाने की शिकायत पर हुआ करती है। नौजवानों की बातचीत का विषय जोश, उत्साह, नई उमंग, नया होसला आदि होता है। 
प्रश्न :
(क) बातचीत से लोगों को क्या प्राप्त होता है? 
(ख) बातचीत से प्राप्त आनन्द के लिए लोग क्या-क्या करते हैं? 
(ग) अपने प्रेमी के साथ बातें करने की लालसा किनमें अधिक होती है? 
(घ) मन के भावों के आदान-प्रदान का एकमात्र साधन क्या है? 
(ङ) बातचीत के विषय में बेन जानसन का क्या कहना है?  
(च) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए। 
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स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् हमारी सरकार का ध्यान इस ओर गया और $1952$ में स्पष्ट वन$-$नीति बनाई गई। वनों के उन्मूलन को रोकने के लिए, उजड़ रहे वनों को फिर से लगाने का और देश के चप्पे$-$चप्पे पर वृक्ष लगाने का व्यापक कार्यक्रम बनाया गया। इसी कार्यक्रम के अंतर्गत वन$-$महोत्सव आता है। हम जानते हैं कि हमारे देश में अधिकतर वर्षा मानसून हवाओं के चलने पर जुलाई-अगस्त में होती है। इसलिए ये दो लगाने की दृष्टि से अधिक अनकल हैं। नम हवाओं के आलिंगन से वे शीघ्र लहलहा उठते हैं। पर्याप्त वर्षा हो जाने के बाद तैयार पौधों को उखाड़कर खाली जगह पर लगाने का काम पूरे देश में आरंभ हो जाता है, जो $15-20$ दिनों तक बहुत जोर$-$शोर से चलता है। इस अवधि में करोड़ों पौधे लगा दिए जाते हैं पर उनमें से एक तिहाई पौधे भी पनपकर वृक्ष $-$ नहीं बन पाते क्योंकि वे पौधे ईश्वर के भरोसे छोड़ दिए जाते हैं।
पौधों व वृक्षों की इस उपेक्षा का कारण कदाचित उनके महत्त्व की अनभिज्ञता है। वे ईंधन, फर्नीचर, कागज़ आदि जुटाते हैं। लेकिन वे हमारी इनसे भी अधिक सहायता करते हैं। हम ईंधन, फर्नीचर आदि में अन्य कृत्रिम वस्तुओं का प्रयोग कर सकते हैं पर वृक्षों के बिना वायु-प्रदूषण दूर नहीं हो सकता। हम जो साँस छोड़ते हैं उसमें कार्बन डाई ऑक्साइड $Co_2$ होता है। पेड़$-$पौधे ही साँस द्वारा कार्बन डाई आक्साइड को ऑक्सीजन में बदलते हैं।
प्रश्न :
$(क)$ सरकार ने स्पष्ट वन$-$नीति कब बनाई?
$(ख)$ "वन महोत्सव" किस कार्यक्रम के अन्तर्गत आयोजित होता है?
$(ग)$ नए वृक्ष लगाने के लिए कौन$-$से महीने अनुकूल होते हैं तथा क्यों?
$(घ)$ नम हवाओं का पेड़$-$पौधों पर क्या प्रभाव होता है?
$(ङ)$ वृक्षारोपण अवधि के करोड़ों पौधों में एक तिहाई पौधों के ही पनपकर वृक्ष बनने के पीछे क्या कारण हैं?
$(च)$ उपर्युक्त गद्यांश के लिए उचित शीर्षक लिखिए।
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