Question types

अपठित पद्यांश question types

30 questions across 1 question group — pick any mix to generate a Hindi-साहित्य paper with step-by-step answer keys.

30
Questions
1
Question groups
5
Question types
Sample Questions

अपठित पद्यांश questions

One sample from each question group in this chapter. Select any group above to see the full set with answer keys.

धर्मराज! यह भूमि किसी की, नहीं क्रीत है दासी। 
है जन्मना समान परस्पर, इसके सभी निवासी। 
है सबको अधिकार मृत्तिका पोषक-रस पीने का। 
विविध अभावों से अशंक होकर जग में जीने का। 
सबको मुक्त प्रकाश चाहिए, सबको मुक्त समीरण 
बाधा रहित विकास, मुक्त आशंकाओं से जीवन। 
उद्भिज नभ चाहते सभी नर, मुक्त गगन में 
अपना चरम विकास ढूँढ़ना, किसी प्रकार भुवन में। 
न्यायोचित सुख सुलभ नहीं, जब तक मानव-मानव को 
चैंन कहाँ धरती पर तब तक, शांति कहाँ इस भव को 
जब तक मनुज-मनुज का यह, सुख भाग नहीं सम होगा। 
शमित न होगा कोलाहल, संघर्ष नहीं कम होगा। 
ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में, मनुज नहीं लाया है। 
अपना सुख उसने अपने, भुज-बल से ही पाया है। 
ब्रह्मा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी 
धोते वीर कुअंक भाल का, बहा भ्रुवों का पानी। 
भाग्यवाद आवरण पाप का, और शस्त्र शोषण का 
जिससे रखता दबा एक जन, भाग दूसरे जन का। 
एक, मनुज संचित करता है, अर्थ पाप के बल से 
और भोगता उसे दूसरा, भाग्यवाद के छल से। 
प्रश्न :
(क) प्रस्तुत पद्यांश में किसको सम्बोधित किया गया है?
(ख) धरती का पोषक रस पीने का अधिकारी कौन है? 
(ग) यदि धरती पर मनुष्य को न्यायोचित अधिकार नहीं मिलते तो क्या होता है? 
(घ) भाग्यवाद का छल किसे कहा गया है? इस पद्यांश में किस रस की व्यंजना हुई है? उसका स्थायीभाव भी लिखिए। 
(ङ) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताइए। 
(च) 'न्यायोचित सुख सुलभ नहीं' में अलंकार बताइए।
View full solution
 मैं सहज मानिनी रही, सरल क्षत्राणी,  
इस कारण सीखी नहीं दैन्य यह वाणी।। 
पर महा दीन हो गया आज मन मेरा, 
भावज्ञ, सहेजा तुम्ही भाव-धन मेरा। 
समुचित ही मुझको विश्व-घृणा ने घेरा, 
यों ही तुम वन को गये, देव सुरपुर को,
मैं बैठी ही रह गई लिये इस उर को।
बुझ गई पिता की चिता भरत-भुजधारी,
प्रस्ताव मात्र में जहाँ, अधैर्य अँधेरा। 
पितृभूमि आज भी तप्त तथापि तुम्हारी। 
अनुशासन ही था मुझे अभी तक आता 
भय और शोक सब दूर उड़ाओ उसका, 
चलकर सुचरित, फिर हृदय जुड़ाओ उसका।
हो तुम्हीं भरत के राज्य, स्वराज्य सम्भालो, 
मैं पाल सकी न स्वधर्म, उसे तुम पालो। 
स्वामी को जीते जी न दे सकी सुख मैं, 
मरकर तो उनको दिखा सकूँ यह मुख मैं। 
समझाता कौन सशान्ति मुझे भ्रम मेरा? 
मर मिटना भी है एक हमारी क्रीड़ा,  
पर भरत-वाक्य है- सहूँ विश्व की व्रीड़ा। 
जीवन-नाटक का अन्त कठिन है मेरा, 
करती है तुमसे विनय आज यह माता। 
प्रश्न :
(क) क्षत्राणी की क्या विशेषताएँ बताई गई हैं? 
(ख) भरत की माता कैकेयी की राम से क्या शिकायत है? 
(ग) आज अयोध्या की क्या अवस्था है? 
(घ) प्रस्तुत काव्यांश में किस शैली का प्रयोग हुआ है? 
(ङ) उपर्युक्त पद्यांश में कैकेयी के व्यक्तित्व का कौन-सा स्वरूप व्यक्त हुआ है? 
(च) उपर्युक्त पद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
View full solution
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।
जानता हूँ, इस जगत में, 
फूल की है आयु कितनी
और यौवन की उभरती, 
साँस में है वायु कितनी। 
इसलिए आकाश का विस्तार, 
एक तारा चाहता हूँ। 
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।
प्रश्न-चिह्नों में उठी हैं,
भाग्य सागर की हिलोरें, 
आँसुओं से रहित होंगी 
क्या नयन की नमित कोरें?
जो तुम्हें कर दे द्रवित 
वह अश्रुधारा चाहता हूँ।
मै तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।
जोड़कर कण-कण कृपण 
आकाश के तारे सजाए। 
जो कि उज्ज्वल है सही, 
पर क्या किसी के काम आए? 
प्राण ! मैं तो मार्गदर्शक सारा चाहता हूँ।  
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।  
यह उठा कैसा प्रभंजन
जुड़ गईं जैसे दिशाएँ। 
एक तरणी, एक नाविक 
और कितनी आपदाएँ? 
क्या कहूँ मैंझधार में भी  
मैं किनारा चाहता हूँ। 
प्रश्न :
(क) कवि किंससे तथा क्या चाहता है? 
(ख) कवि को जीवन की किस वास्तविकता का ज्ञान है? 
(ग) प्रस्तुत काव्यांश की रचना किस छंद में हुई है?
(घ) कवि की एकमात्र इच्छा क्या है?
(ङ) 'मँझधार' शब्द का क्या अर्थ है? कवि मँझधार में क्या चाहता है?
(च) 'प्रभंजन' उठने से कवि किस संकट में फंस गया है?
View full solution
साक्षी है इतिहास, हमी पहले जागे हैं, 
जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। 
शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं?
कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं? 
हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदय। 
फिर एक बार हे विश्व! 
तुम, गाओ भारत की विजय।। 
कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज़ हमारा, 
दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। 
तुम्ही बताओ कौन नहीं जो हमसे हारा, 
पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा? 
बस युद्ध मात्र को छोड़कर कहाँ नहीं हैं म सदय। 
फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय। 
प्रश्न :
(क) 'हमी पहले जागे हैं'- पंक्ति में 'हमी' शब्द का अर्थ क्या है तथा जागने का क्या तात्पर्य है? 
(ख) 'जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं'- में निहित भाव को माद कीजिए। 
(ग) “शत्रु हमारे....त्यागे हैं."-पंक्तियों में भारतीयों के किस गुण का उल्लेख हुआ है? 
(घ) 'शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं' में अलंकार बताइए। 
(ङ) इस काव्यांश में किस रस का वर्णन है? रस तथा उसके स्थायीभाव का नाम लिखिए। 
(च) प्रस्तुत काव्यांश में कौन-सा काव्य-गुण है?
View full solution
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी 
मरो, परन्तु यों मरो कि याद जो करें सभी। 
हुई न यो सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए, 
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए। 
यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरें।
उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती,
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती। 
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे, 
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। 
क्षुधात रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी, 
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।  
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया।।  
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया। 
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।  
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। 
प्रश्न :
(क) कवि ने पाठकों को क्या सोचकर मृत्यु से न डरने की सलाह दी है? 
(ख) 'सुमृत्यु' का तात्पर्य क्या है? 
(ग) कवि ने पशु-प्रवृत्ति किसको बताया है? 
(घ) इस काव्यांश में पंक्तियों के अन्त में बखानती, मानती, कूजती तथा पूजती शब्दों के आने से छन्द की क्या विशेषता प्रकट होती है? 
(ङ) 'मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे' पंक्ति में कवि ने क्या प्रेरणा दी है? 
(च) 'अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे'- का आशय स्पष्ट कीजिए।
View full solution

Generate a अपठित पद्यांश paper free

Pick question groups from the list above, set marks and difficulty, and export a branded PDF with step-by-step answer keys. First 3 chapters free — no signup.

Download App