धर्मराज! यह भूमि किसी की, नहीं क्रीत है दासी।
है जन्मना समान परस्पर, इसके सभी निवासी।
है सबको अधिकार मृत्तिका पोषक-रस पीने का।
विविध अभावों से अशंक होकर जग में जीने का।
सबको मुक्त प्रकाश चाहिए, सबको मुक्त समीरण
बाधा रहित विकास, मुक्त आशंकाओं से जीवन।
उद्भिज नभ चाहते सभी नर, मुक्त गगन में
अपना चरम विकास ढूँढ़ना, किसी प्रकार भुवन में।
न्यायोचित सुख सुलभ नहीं, जब तक मानव-मानव को
चैंन कहाँ धरती पर तब तक, शांति कहाँ इस भव को
जब तक मनुज-मनुज का यह, सुख भाग नहीं सम होगा।
शमित न होगा कोलाहल, संघर्ष नहीं कम होगा।
ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में, मनुज नहीं लाया है।
अपना सुख उसने अपने, भुज-बल से ही पाया है।
ब्रह्मा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी
धोते वीर कुअंक भाल का, बहा भ्रुवों का पानी।
भाग्यवाद आवरण पाप का, और शस्त्र शोषण का
जिससे रखता दबा एक जन, भाग दूसरे जन का।
एक, मनुज संचित करता है, अर्थ पाप के बल से
और भोगता उसे दूसरा, भाग्यवाद के छल से।
प्रश्न :
(क) प्रस्तुत पद्यांश में किसको सम्बोधित किया गया है?
(ख) धरती का पोषक रस पीने का अधिकारी कौन है?
(ग) यदि धरती पर मनुष्य को न्यायोचित अधिकार नहीं मिलते तो क्या होता है?
(घ) भाग्यवाद का छल किसे कहा गया है? इस पद्यांश में किस रस की व्यंजना हुई है? उसका स्थायीभाव भी लिखिए।
(ङ) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताइए।
(च) 'न्यायोचित सुख सुलभ नहीं' में अलंकार बताइए।
है जन्मना समान परस्पर, इसके सभी निवासी।
है सबको अधिकार मृत्तिका पोषक-रस पीने का।
विविध अभावों से अशंक होकर जग में जीने का।
सबको मुक्त प्रकाश चाहिए, सबको मुक्त समीरण
बाधा रहित विकास, मुक्त आशंकाओं से जीवन।
उद्भिज नभ चाहते सभी नर, मुक्त गगन में
अपना चरम विकास ढूँढ़ना, किसी प्रकार भुवन में।
न्यायोचित सुख सुलभ नहीं, जब तक मानव-मानव को
चैंन कहाँ धरती पर तब तक, शांति कहाँ इस भव को
जब तक मनुज-मनुज का यह, सुख भाग नहीं सम होगा।
शमित न होगा कोलाहल, संघर्ष नहीं कम होगा।
ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में, मनुज नहीं लाया है।
अपना सुख उसने अपने, भुज-बल से ही पाया है।
ब्रह्मा का अभिलेख पढ़ा करते निरुद्यमी प्राणी
धोते वीर कुअंक भाल का, बहा भ्रुवों का पानी।
भाग्यवाद आवरण पाप का, और शस्त्र शोषण का
जिससे रखता दबा एक जन, भाग दूसरे जन का।
एक, मनुज संचित करता है, अर्थ पाप के बल से
और भोगता उसे दूसरा, भाग्यवाद के छल से।
प्रश्न :
(क) प्रस्तुत पद्यांश में किसको सम्बोधित किया गया है?
(ख) धरती का पोषक रस पीने का अधिकारी कौन है?
(ग) यदि धरती पर मनुष्य को न्यायोचित अधिकार नहीं मिलते तो क्या होता है?
(घ) भाग्यवाद का छल किसे कहा गया है? इस पद्यांश में किस रस की व्यंजना हुई है? उसका स्थायीभाव भी लिखिए।
(ङ) प्रस्तुत पद्यांश की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताइए।
(च) 'न्यायोचित सुख सुलभ नहीं' में अलंकार बताइए।