मैंने देखा कि नदी के तट पर एक ऊँची मीनार में से कुछ काली-काली हवा निकल रही है। मैं उत्सुक हो उसे देखने को क्या बढ़ी कि अपने हाथों दुर्भाग्य को न्यौता दिया। ज्योंही मैं उसके पास पहुँची अपने और साथियों के साथ एक मोटे नल में खींच ली गई। कई दिनों तक मैं नलनल घूमती फिरी। मैं प्रतिक्षण उसमें से निकल भागने की चेष्टा में लगी रहती थी। भाग्य मेरे साथ था। बस, एक दिन रात के समय मैं ऐसे स्थान पर पहुँची जहाँ नल टूटा हुआ था। मैं तुरंत उसमें होकर निकल भागी और पृथ्वी में समा गई। अंदर ही अंदर घूमते-घूमते इस बेर के पेड़ के पास पहँची।
(क) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(ख) बूंद नल में कैसे पहुँची?
(ग) बूंद ने कब अपने हाथों दुर्भाग्य को न्यौता दिया?
(घ) बूँद अन्त में किसके पास पहुँची?
(क) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।
(ख) बूंद नल में कैसे पहुँची?
(ग) बूंद ने कब अपने हाथों दुर्भाग्य को न्यौता दिया?
(घ) बूँद अन्त में किसके पास पहुँची?