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Question 15 Marks
भारत में वन और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए सही नीति की आवश्यकता पर भौगोलिक निबंध लिखिये।
Answer
भारत में वन और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए सही नीति की आवश्यकता होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
(1) जैव विविधता कम होना-भारत में जैव विविधता को कम करने वाले कारकों में वन्य जीव के आवास का विनाश, जंगली जानवरों को मारना व आखेटन, पर्यावरणीय प्रदूषण व विषाक्तिकरण तथा दावानल आदि शामिल हैं। पर्यावरण विनाश के अन्य मुख्य कारकों में संसाधनों का असमान बंटवारा व उनका असमान उपभोग और पर्यावरण के रख-रखाव की जिम्मेदारी में असमानता शामिल है।
(2) जनसंख्या वृद्धि-आमतौर पर विकासशील देशों में पर्यावरण विनाश का मुख्य दोषी अत्यधिक जनसंख्या को माना जाता है। यद्यपि यह सही नहीं है। विकसित देशों में प्रति नागरिक औसत संसाधन उपभोग विकासशील देशों के प्रति नागरिक औसत संसाधन उपभोग से अधिक है।
(3) प्राकृतिक वनों का ह्रास-वर्तमान समय में भारत के आधे से अधिक प्राकृतिक वन लगभग खत्म हो चुके हैं । एक-तिहाई जलमग्न भूमि सूख चुकी है, 70 प्रतिशत धरातलीय जल क्षेत्र प्रदूषित है, 40 प्रतिशत मैंग्रोव क्षेत्र लुप्त हो चुका है और जंगली जानवरों के शिकार और व्यापार तथा वाणिज्य की दृष्टि से मूल्यवान पेड़-पौधों की कटाई के कारण हजारों की संख्या में वनस्पति और वन्य जीव जातियाँ लुप्त होने के कगार पर पहुँच गई हैं।
(4) सांस्कृतिक विविधता का विनाश होना-जैव संसाधनों का विनाश सांस्कृतिक विविधता के विनाश से भी जुड़ा हुआ है। जैव विनाश के कारण अनेक मूल जातियाँ और वनों पर आधारित समुदाय निर्धन होते जा रहे हैं तथा आर्थिक रूप से हाशिये पर पहुँच गये हैं। ये समुदाय खाने, पीने, संस्कृति, अध्यात्म इत्यादि के लिए वनों और वन्य जीवों पर निर्भर हैं।
(5) प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होना वनों की कटाई के परोक्ष परिणाम यथा सूखा और बाढ़ भी गरीब वर्ग के लोगों को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं। इस स्थिति में गरीबी, पर्यावरणं निम्नीकरण का सीधा परिणाम होता है। भारतीय उपमहाद्वीप में वन और वन्य जीवन मानव जीवन के लिए बहुत कल्याणकारी है।।
उपर्युक्त कारणों से यह बहुत आवश्यक है कि भारत में वन और वन्य जीवन के संरक्षण के लिए सही नीति अपनाई जावे।
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Question 25 Marks
भारत में वन्य जीवन के ह्रास पर भौगोलिक निबंध लिखिये।
Answer
भारत में वन और वन्य जीवन का ह्रास-भारत में वन और वन्य जीवन के ह्रास के उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं-
(1) औपनिवेशिक काल की क्रियाएँ- भारत में वनों को सबसे बड़ा नुकसान उपनिवेश काल में रेल लाइनों के विस्तार, कृषि, व्यवसाय, वाणिज्य, वानिकी और खनन क्रियाओं में वृद्धि के फलस्वरूप हुआ।
(2) कृषि का विस्तार- देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त वन संसाधनों के सिकुड़ने में कृषि का फैलाव महत्त्वपूर्ण कारकों में से एक रहा है। वन सर्वेक्षण के अनुसार देश में 1951 और 1980 के मध्य लगभग 26,200 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कृषि भूमि में परिवर्तित किया गया।
(3) स्थानांतरी (झम) खेती- अधिकतर जनजातीय क्षेत्रों, विशेषकर पूर्वोत्तर भारत एवं मध्य भारत में स्थानांतरी (झूम) खेती अथवा 'स्लैश और बर्न' खेती के कारण वनों की कटाई अथवा वन निम्नीकरण हुआ है।
(4) विकास परियोजनाएँ- देश में बड़ी विकास परियोजनाओं ने भी वनों को बहुत अधिक हानि पहुँचाई है। 1952 से नदी घाटी परियोजनाओं के कारण 5000 वर्ग किमी. से अधिक वन क्षेत्रों को साफ करना पड़ा है और यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। मध्यप्रदेश में 4,00,000 हैक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र नर्मदा सागर परियोजना के पूर्ण हो जाने पर जलमग्न हो जायेगा।
(5) खनन क्रियाएँ-देश में वनों के ह्रास में खनन ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। पश्चिमी बंगाल में बक्सा टाइगर रिजर्व डोलोमाइट के खनन के कारण गंभीर खतरे में है।
(6) पशुचारण और ईंधन की लकड़ी-अनेक वन अधिकारी और पर्यावरणविद् यह मानते हैं कि वन संसाधनों की बर्बादी में पशुचारण और ईंधन के लिए लकड़ी की कटाई मुख्य भूमिका निभाते हैं। यद्यपि इसमें कुछ सच्चाई हो सकती है किन्तु चारे और ईंधन हेतु लकड़ी की आवश्यकता की पूर्ति मुख्य रूप से पेड़ों की टहनियाँ काटकर की जाती है न कि पूरे पेड़ काटकर।
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Question 35 Marks
भारत में वन और वन्य जीवन संरक्षण पर भौगोलिक निबंध लिखिये।
Answer
(1) भारतीय वन्य जीवन ( रक्षण) अधिनियम 1972-भारत में 1960 और 1970 के दशकों के दौरान पर्यावरण संरक्षकों की मांग पर भारतीय वन्य जीवन (रक्षण) अधिनियम, 1972 में लागू किया गया जिसमें वन्य जीवों के आवास रक्षण के अनेक प्रावधान किये गये। सम्पूर्ण भारत में रक्षित जातियों की सूची भी प्रकाशित की गई है। इस कार्यक्रम के तहत शेष बची हुई संकटग्रस्त जातियों के बचाव, शिकार प्रतिबंधन, वन्य जीव आवासों के कानूनी रक्षण तथा जंगली जीवों के व्यापार पर रोक लगाने आदि पर प्रबल जोर दिया गया है।
(2) राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव पशु विहार केन्द्रीय सरकार व अनेक राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव पशु विहार स्थापित किए।
(3) विशेष प्राणियों की सुरक्षा के लिए विशेष परियोजनाएँ-केन्द्रीय सरकार ने अनेक परियोजनाओं की भी घोषणा की, जिनका उद्देश्य गंभीर खतरे में पड़े कुछ विशेष वन प्राणियों को रक्षण प्रदान करना था। इन प्राणियों में बाघ, एक सींग वाला गैंडा, कश्मीरी हिरण अथवा हंगुल, तीन प्रकार के मगरमच्छ यथा-स्वच्छ जल मगरमच्छ, लवणीय जल मगरमच्छ, घड़ियाल, एशियाई शेर और अन्य प्राणी शामिल हैं।
(4) बाघ परियोजना विश्व की बेहतरीन वन्य जीव परियोजनाओं में से एक बाघ परियोजना अथवा प्रोजेक्ट टाइगर है। देश में इसकी शुरुआत सन् 1973 में हुई। बाघ संरक्षण मात्र एक संकटग्रस्त जाति को बचाने का प्रयास नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य बहुत बड़े आकार के जैवजाति को भी बचाना है। उत्तराखण्ड में कॉरबेट राष्ट्रीय उद्यान, पश्चिम बंगाल में सुंदरबन राष्ट्रीय उद्यान, मध्य प्रदेश में बाधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान, राजस्थान में सरिस्का वन्य जीव पशुविहार (sanctuary), असम में मानस बाघ रिजर्व (reserve) और केरल में पेरियार बाघ रिजर्व (reserve) भारत में बाघ संरक्षण परियोजनाओं के उदाहरण हैं।
(5) वन्य जीव अधिनियम 1980 तथा 1986-वन्य जीव अधिनियम 1980 तथा 1986 में सैकड़ों तितलियाँ, पतंगों, भृगों तथा एक ड्रैगनफ्लाई को भी संरक्षित जातियों में शामिल किया गया। 1991 में पौधों की भी 6 जातियाँ पहली बार इस सूची में रखी गईं।
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Question 45 Marks
भारत में वनों के प्रकार एवं उनके क्षेत्र बताइये।
Answer
भारत में वनों के प्रकार भारत में अधिकतर वन और वन्य जीवन या तो प्रत्यक्ष रूप से सरकार के अधिकार क्षेत्र में है या वन विभाग अथवा अन्य विभागों के माध्यम से सरकार के प्रबन्धन में है। प्रशासनिक आधार पर भारत में वनों को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा गया है-
(1) आरक्षित वन- ये वे वन हैं जो इमारती लकड़ी या वन उत्पादों को प्राप्त करने के लिए पूर्णतः सुरक्षित कर लिए गए हैं। इन वनों में पशुओं को चराने या खेती करने की अनुमति नहीं दी जाती है।
भारत के कुल वन क्षेत्र के आधे से अधिक वन क्षेत्र आरक्षित वन घोषित किये गये हैं। आरक्षित वनों को सर्वाधिक मूल्यवान माना जाता है। मध्य प्रदेश में स्थायी वनों के अन्तर्गत सर्वाधिक क्षेत्र है जो कि प्रदेश के कुल वन क्षेत्र का 75 प्रतिशत है। इसके अलावा जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश, उत्तराखण्ड, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में भी कुल वनों में एक बड़ा अनुपात आरक्षित वनों का है।
(2) रक्षित वन- वन विभाग के अनुसार देश के कुल वन क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रक्षित वनों का है। इन वनों को और अधिक नष्ट होने से बचाने के लिए इनकी सुरक्षा की जाती है। इनका रख-रखाव इमारती लकड़ी और अन्य पदार्थों और उनके बचाव के लिए किया जाता है। इन वनों में पशुओं को चराने व खेती करने की अनुमति कुछ विशिष्ट प्रतिबन्धों के साथ प्रदान की जाती है। बिहार, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान में कुल वनों में रक्षित वनों का एक बड़ा अनुपात है।
(3) अवर्गीकत वन- देश में अन्य सभी प्रकार के वन और बंजर भूमि जो कि सरकार. व्यक्तियों और समदायों के स्वामित्व में होते हैं, अवर्गीकृत वन कहलाते हैं। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में और गुजरात में अधिकतर वन क्षेत्र अवर्गीकृत वन हैं तथा स्थानीय समुदायों के प्रबंधन में हैं।
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Question 55 Marks
अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ के अनुसार पौधे एवं प्राणियों की जातियों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिये।
Answer
पौधों और जातियों का वर्गीकरण
अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ के अनुसार पौधे और प्राणियों की जातियों को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया गया है-
(1) सामान्य जातियाँ वे जातियाँ जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य मानी जाती है, सामान्य जातियाँ कहलाती हैं। यथा पशु, साल, चीड़ और कृन्तक (रोडेंट्स) आदि।
(2) संकटग्रस्त जातियाँ-वे जातियाँ जिनके लुप्त होने का खतरा है, संकटग्रस्त जातियाँ कहलाती हैं। जिन विषम परिस्थितियों के कारण इनकी संख्या में कमी हो रही है, यदि वे परिस्थितियाँ अभी भी जारी रहती हैं तो इन जातियों का जीवित रहना कठिन है। यथा काला हिरण, मगरमच्छ, भारतीय जंगली गधा, गैंडा, शेर-पूंछ वाला बन्दर, संगाई अर्थात् मणिपुरी हिरण इत्यादि।
(3) सुभेद्य जातियाँ- वे जातियाँ जिनकी संख्या घट रही है, सुभेद्य जातियाँ कहलाती हैं। यदि इनकी संख्या पर विपरीत प्रभाव डालने वाली परिस्थितियाँ नहीं बदली जातीं और इनकी संख्या घटती रहती है तो यह संकटग्रस्त जातियों की श्रेणी में शामिल हो जायेंगी। यथा-नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा नदी की डॉल्फिन आदि। . (4) दुर्लभ जातियाँ- इन जातियों की संख्या बहुत कम है और यदि इनको प्रभावित करने वाली विषम परिस्थितियाँ परिवर्तित नहीं होती हैं तो ये संकटग्रस्त जातियों की श्रेणी में आ जायेंगी। (5) स्थानिक जातियाँ- ये विशेष क्षेत्रों में पाई जाने वाली स्थानीय जातियाँ होती हैं। अण्डमानी टील (teal), निकोबारी कबूतर, अण्डमानी जंगली सूअर और अरुणाचल के मिथुन इन जातियों के उदाहरण हैं। (6) लुप्त जातियाँ- वे जातियाँ जो स्थानीय क्षेत्र, प्रदेश, देश, महाद्वीप या सम्पूर्ण पृथ्वी से ही लुप्त हो गई हैं, लुप्त जातियों के नाम से जानी जाती हैं। यथा एशियाई चीता और गुलाबी सिर वाली बतख आदि।
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