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निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर सविस्तर लिखिए : [5 गुण ]

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Question 15 Marks
वायुमंडल में अपवर्तन किस प्रकार होता है? तारे क्यों टिमटिमाते हैं जबकि ग्रह नहीं टिमटिमाते?
Answer
गरम वायु अपने ऊपर की ठंडी वायु की तुलना में हल्की (कम सघन) होती है तथा इसका अपवर्तनांक ठंडी वायु की अपेक्षा थोड़ा कम होता है। क्योंकि अपवर्तक माध्यम (वायु) की भौतिक अवस्थाएँ स्थिर नहीं हैं। इसलिए गरम वायु में से देखने पर वस्तु की आभासी स्थिति परिवर्तित होती रहती है। यह अस्थिरता हमारे स्थानीय पर्यावरण में लघु स्तर पर वायुमंडलीय अपवर्तन (पृथ्वी के वायुमंडल के कारण प्रकाश का अपवर्तन ) का ही एक प्रभाव है।
तारों का टिमटिमाना: प्रतिक्षण परिवर्तित होने वाले वायुमंडल द्वारा तारों से आने वाले प्रकाश का विभिन्न मात्राओं में अपवर्तन होता है। जब वायुमंडल हमारी ओर अधिक मात्रा में तारों का प्रकाश अपवर्तित करता है। तब हमें तारे चमकीले प्रतीत होते हैं जबकि वायुमंडल द्वारा तारों के प्रकाश का कम मात्रा में अपवर्तन पर तारे कम चमकीले (धुँधले) प्रतीत होते हैं।
ग्रह तारों की अपेक्षा पृथ्वी के बहुत पास हैं और इसलिए उन्हे विस्तृत प्रकाश स्रोत के समान माना जा सकता है। अतः उन्हे बिन्दु सदृश प्रकाश स्त्रोत नहीं माना जा सकता है। अतः वे टिमटिमाते हुए प्रतीत नहीं होते हैं।
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Question 25 Marks
काँच के प्रिज्म द्वारा श्वेत प्रकाश के वर्ण विक्षेपण की परिघटना उपयुक्त किरण आरेख खींचकर स्पष्ट कीजिए।
Answer
श्वेत प्रकाश का उसके सात अवयवी रंगों में विभक्त होने की घटना वर्ण विक्षेपण कहलाती है। ऐसा विभिन्न वर्णों की प्रकाश तरंगों की, किसी माध्यम में, जैसे काँच, में विविध चाल के कारण होता है।
अपवर्तन के पश्चात् इनके सुझाव का परिणाम भिन्न-भिन्न होता है। अतः वे एक दूसरे से पृथक्ता प्रदर्शित करते हैं। शीर्ष से तल तक वर्णों (रंगो) का क्रम: बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी तथा लाल। (VIBGYOR)

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Question 35 Marks
सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य के रक्ताभ प्रतीत होने का स्पष्टीकरण हम किस प्रकार कर सकते हैं? दोपहर के समय यह लाल क्यों प्रतीत नहीं होता?
Answer
सूर्योदय/सूर्यास्त के समय सूर्य रक्ताभ परंतु दोपहर के समय श्वेत प्रतीत होता है। दोपहर के समय, जब सूर्य सिर से ठीक ऊपर (ऊर्ध्वस्थ) हो तो सूर्य से आने वाला प्रकाश अपेक्षाकृत कम दूरी चलेगा। दोपहर के समय सूर्य श्वेत प्रतीत होता है क्योंकि नीला तथा बैंगनी रंग का बहुत थोड़ा भाग ही प्रकीर्ण हो पाता है।
सूर्योदय/सूर्यास्त के समय क्षितिज के समीप नीले तथा कम तरंग दैर्ध्य के प्रकाश का अधिकांश भाग कणों द्वारा प्रकीर्ण हो जाता है। अतः हमारे नेत्रों तक पहुँचने वाला प्रकाश अधिक तरंग दैर्ध्य का होता है। इससे सूर्योदय/ सूर्यास्त के समय सूर्य रक्ताभ प्रतीत होता है।

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Question 45 Marks
नामांकित किरण आरेख का उपयोग करके किसी काँच के त्रिभुजाकार प्रिज्म से होने वाले प्रकाश के अपवर्तन को स्पष्ट कीजिए। इस प्रकार विचलन कोण की परिभाषा लिखिए।
Answer


ऊपर दिए गए चित्र में, प्रकाश किरण PE पृष्ठ AB पर वायु से काँच ( विरल से सघन माध्यम) में प्रवेश करती है। अतः, अभिलम्ब की ओर झुकती है। अपवर्तित किरण EF काँच से निर्गत होकर वायु (सघन से विरल माध्यम) में प्रवेश करती है। अतः अभिलम्ब से दूर हटती है। प्रिज्म की विशेष आकृति के कारण निर्गत किरण, आपतित किरण की दिशा से एक कोण बनाती है। इस कोण को विचलन कोण कहते हैं। इस स्थिति में $\angle $D विचलन कोण है।
उपर्युक्त चित्र में,

  1. ABC एक प्रिज्म है जिसका आधार BC है।
  2. PE, AB सतह पर आपतित किरण है। यह अभिलम्ब NE के साथ $\angle $PEN बनाती है। यह कोण आपतन कोण है।
  3. प्रिज्म में प्रविष्ट होने के बाद, प्रकाश किरण अभिलम्ब की ओर झुकती है। इस प्रकरण में, EF अपवर्तित किरण है। $\angle $N'EF अपवर्तन कोण है।
  4. एक बार जब अपवर्तित किरण प्रिज्म से वायु में निर्गत हो जाती है, तब यह अभिलम्ब से दूर हटती है। इस चित्र में, FS निर्गत किरण है। $\angle $SFM निर्गत कोण है।

विचलन कोण: आपतित किरण तथा निर्गत किरण के बीच बना कोण विचलन कोण कहलाता है। यहाँ, $\angle $SGH या $\angle $D विचलन कोण है।

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Question 55 Marks
हम कब यह कहते हैं कि कोई व्यक्ति निकट दृष्टि अथवा दीर्घ दृष्टि दोष से पीड़ित है? आरेखों का उपयोग करके स्पष्ट कीजिए कि निकट दृष्टि तथा दीर्घ दृष्टि दोष से संबंधित दृष्टि दोषों का संशोधन किस प्रकार किया जा सकता है?
Answer
निकट दृष्टि दोष: किसी नेत्र द्वारा दूर स्थित वस्तुओं को देखने में असमर्थता। इस दोष में प्रतिबिम्ब दृष्टि पटल से पहले बनता है।

निकट दृष्टिदोष का निवारण: इस दोष से पीड़ित व्यक्ति को दोष के निवारण के लिए उचित फोकस दूरी के अवतल लेंस की आवश्यकता होती है। अवतल लेंस अनन्त से आती हुई प्रकाश किरणों को अपसरित कर देता है। अवतल लेंस से अपवर्तन के पश्चात् किरणें उस व्यक्ति के नेत्र के दूर बिन्दु से आती हुई प्रतीत होती हैं। इस कारण से, दूर स्थित किसी वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब व्यक्ति के रेटिना पर बनता है। इस प्रकार, निकट दृष्टि दोष युक्त व्यक्ति दूर रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट देख पाता है।

दूर दृष्टिदोष: किसी नेत्र द्वारा निकट स्थित वस्तुओं को देखने में असमर्थता होती है। इस दोष में प्रतिबिम्ब दृष्टिपटल के पीछे बनता है।

दूर दृष्टिदोष का निवारण: इस दोष से पीड़ित व्यक्ति को दोष के निवारण के लिए उचित फोकस दूरी के उत्तल लेंस की आवश्यकता होती है। उत्तल लेंस निकट स्थित वस्तु से आती हुई प्रकाश किरणों को अभिसरित कर देता है। उत्तल लेंस से अपवर्तन के पश्चात्, किरणें उस व्यक्ति के नेत्र के निकट बिंदु से आती हुई प्रतीत होती हैं। इस कारण से, निकट स्थित किसी वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब व्यक्ति के रेटिना पर बनता है। इस प्रकार, दूर दृष्टि दोष युक्त व्यक्ति निकट रखी वस्तुओं को सुस्पष्ट देख पाता है।

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Question 65 Marks
मानव नेत्र की संरचना तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए। हम पास एवं दूर दोनों की वस्तुओं को देखने योग्य कैसे बन जाते हैं?
Answer
मानव नेत्र की संरचना: मानव नेत्र मे निम्नलिखित मुख्य भाग होते हैं:

  1. (अ) स्वच्छ मंडल (कॉर्निया): मानव नेत्र गोलाकार होता है। यह एक सफेद रंग की कड़ी झिल्ली होती है जो नेत्र के भीतरी भागों की रक्षा करती है। इस झिल्ली का अग्र भाग पारदर्शी होता है। जिसे कॉर्निया कहते है।
  2. परितारिका (आइरिस): यह कॉर्निया के पीछे एक गहरा पेशीय डायाफ्रेम होता है जो पुतली के आकार को नियंत्रित करता है। किसी व्यक्ति के नेत्र का विशिष्ट रंग इसी के कारण होता है।
  3. पुतली /नेत्र तारा (प्यूपिल): परितारिका में एक छोटा छिद्र नेत्र तारा कहलाता है। नेत्र तारा नेत्र में प्रवेश करने वाले प्रकाश की मात्रा को नियंत्रित करता है।
  4. लेंस: यह मध्य में मोटा होता है अर्थात् उत्तल लेंस है और पारदर्शी, रेशेदार, जेलीवत पदार्थ का बना होता है। यह विभिन्न दूरियों पर रखी वस्तुओं को रेटिना पर फोकसित करने के लिए आवश्यक फोकस दूरी में सूक्ष्म समायोजन करता है।
  5. दृष्टिपटल (रेटिना): यह एक कोमल सूक्ष्म झिल्ली है। यह एक पर्दे की भांति कार्य करती है जिस पर प्रतिबिंब बनता है।
  6. दण्ड एवं शंकु कोशिकाएँ: यह नेत्र के रेटिना पर पाई जाने वाली प्रकाश सुग्राही कोशिकाएँ हैं। प्रदीप्त होने पर प्रकाश सुग्राही कोशिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं तथा विद्युत सिग्नल पैदा करती हैं। ये सिग्नल दृक् तंत्रिकाओं द्वारा मस्तिष्क पर पहुँचा दिए जाते हैं। मस्तिष्क इन सिग्नलों की व्याख्या करता है और हम वस्तुओं को देख पाते हैं।

नेत्र में प्रतिबिम्ब का बनना: प्रकाश किरणें पुतली द्वारा नेत्र में प्रवेश करती हैं और लेंस से गुजरती हैं। लेंस प्रकाश किरणों को रेटिना पर फोकसित करता है। रेटिना पर वस्तु का वास्तविक, उल्टा तथा छोटा प्रतिबिम्ब बनता है। दृक् तत्रिकाएँ विद्युत सिग्नलों (संकेतों) को मस्तिष्क में ले जाती हैं। मस्तिष्क इन सूचनाओं की व्याख्या करता है और हमें वस्तु को देखने का ज्ञान प्राप्त होता है।
हम दूर रखी वस्तुओं तथा निकट रखी वस्तुओं को देख सकते हैं। इसका कारण नेत्र की वह योग्यता है जिसके द्वारा हमारे नेत्र, अभिनेत्र लेंस की फोकस दूरी को समायोजित कर पाते हैं। इस योग्यता को नेत्र की समंजन क्षमता कहते हैं। जब पेशियाँ शिथिल होती हैं तो अभिनेत्र लेंस पतला हो जाता है तथा उसकी फोकस दूरी बढ़ जाती है। इस स्थिति में हम दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देख पाते हैं। निकट की वस्तुओं को देखते समय पक्ष्माभ पेशियाँ सिकुड़ जाती है इससे लेंस की मोटाई बढ़ जाती है। परीणामस्वरुप, लेंस की फोकस दूरी घट जाती है और हम निकट रखी वस्तओं को स्पष्ट देख पाते हैं।

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