Question 110 Marks
यह आदर्श बहुत ऊँचा है, पर अध्यापक का पद भी कम ऊँचा नहीं है। जो वेतन का लोलुप है और वेतन की मात्रा के अनुसार ही काम करना चाहता है, उसके लिए इसमें जगह नहीं है। अध्यापक की जो कर्तव्य है उसका मूल्य रुपयों में नहीं आँका जा सकता। किसी समय जो शिक्षक होता-था, वही धर्म-गुरु और पुरोहित भी होता था और जो बड़ा विद्वान् और तपस्वी होता था, वही इस भार को उठाया करता था। शिष्य को ब्रह्म विद्या का पात्र और यजमान को दिव्यलोकों का अधिकारी बनाना सबका काम नहीं है। आज न वह धर्म-गुरु रहे न पुरोहित। पर क्या हम शिक्षक भी इसीलिए कर्तव्यच्युत हो जायें? हमको अपने सामने वही आदर्श रखना चाहिए और अपने को उस दायित्व का बोझ उठाने योग्य बनाने का निरन्तर अथक प्रयत्न करना चाहिए।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) इस अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कैसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है?
(iv) पहले के समय में शिक्षक का पदभार कौन धारण करता था?
(v) शिंष्य को किसका पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं है?
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) इस अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कैसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है?
(iv) पहले के समय में शिक्षक का पदभार कौन धारण करता था?
(v) शिंष्य को किसका पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं है?
Answer
View full question & answer→(i) पाठ का नाम - शिक्षा का उद्देश्य। लेखक का नाम - डॉ० सम्पूर्णानन्द ।
(ii) अंश की व्याख्या - लेखक वर्तमान व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहता है कि आज वैसे तपस्वी नहीं रहे, जो निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकें, किन्तु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि आज के शिक्षक अपने कर्तव्यों से मुख मोड़ लें। हम शिक्षकों को आज भी शिक्षक के प्राचीन आदर्श को अपने सामने रखकर ही अपने दायित्वों का निर्वाह करने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए।
(iii) ऐसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है जो वेतन का लोलुप है और वेतन के अनुसार ही काम करना चाहता है।
(iv) पहले के समय में जो शिक्षक होता था वही धर्मगुरु और पुरोहित भी होता था और जो विद्वान तथा तपस्वी होता था वही इस पदभार को धारण करता था।
(v) शिष्य को ब्रह्म विद्या का पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं हे।
(ii) अंश की व्याख्या - लेखक वर्तमान व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहता है कि आज वैसे तपस्वी नहीं रहे, जो निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकें, किन्तु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि आज के शिक्षक अपने कर्तव्यों से मुख मोड़ लें। हम शिक्षकों को आज भी शिक्षक के प्राचीन आदर्श को अपने सामने रखकर ही अपने दायित्वों का निर्वाह करने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए।
(iii) ऐसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है जो वेतन का लोलुप है और वेतन के अनुसार ही काम करना चाहता है।
(iv) पहले के समय में जो शिक्षक होता था वही धर्मगुरु और पुरोहित भी होता था और जो विद्वान तथा तपस्वी होता था वही इस पदभार को धारण करता था।
(v) शिष्य को ब्रह्म विद्या का पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं हे।