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गद्यांश आधारित - प्रश्नों का उत्तर [10M]

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Question 110 Marks
यह आदर्श बहुत ऊँचा है, पर अध्यापक का पद भी कम ऊँचा नहीं है। जो वेतन का लोलुप है और वेतन की मात्रा के अनुसार ही काम करना चाहता है, उसके लिए इसमें जगह नहीं है। अध्यापक की जो कर्तव्य है उसका मूल्य रुपयों में नहीं आँका जा सकता। किसी समय जो शिक्षक होता-था, वही धर्म-गुरु और पुरोहित भी होता था और जो बड़ा विद्वान् और तपस्वी होता था, वही इस भार को उठाया करता था। शिष्य को ब्रह्म विद्या का पात्र और यजमान को दिव्यलोकों का अधिकारी बनाना सबका काम नहीं है। आज न वह धर्म-गुरु रहे न पुरोहित। पर क्या हम शिक्षक भी इसीलिए कर्तव्यच्युत हो जायें? हमको अपने सामने वही आदर्श रखना चाहिए और अपने को उस दायित्व का बोझ उठाने योग्य बनाने का निरन्तर अथक प्रयत्न करना चाहिए।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) इस अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कैसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है?
(iv) पहले के समय में शिक्षक का पदभार कौन धारण करता था?
(v) शिंष्य को किसका पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं है?
Answer
(i) पाठ का नाम - शिक्षा का उद्देश्य। लेखक का नाम - डॉ० सम्पूर्णानन्द ।
(ii) अंश की व्याख्या - लेखक वर्तमान व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहता है कि आज वैसे तपस्वी नहीं रहे, जो निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सकें, किन्तु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि आज के शिक्षक अपने कर्तव्यों से मुख मोड़ लें। हम शिक्षकों को आज भी शिक्षक के प्राचीन आदर्श को अपने सामने रखकर ही अपने दायित्वों का निर्वाह करने का निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए।
(iii) ऐसे व्यक्ति को अध्यापक बनने का कोई अधिकार नहीं है जो वेतन का लोलुप है और वेतन के अनुसार ही काम करना चाहता है।
(iv) पहले के समय में जो शिक्षक होता था वही धर्मगुरु और पुरोहित भी होता था और जो विद्वान तथा तपस्वी होता था वही इस पदभार को धारण करता था।
(v) शिष्य को ब्रह्म विद्या का पात्र बनाना सबके बस की बात नहीं हे।
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Question 210 Marks
आत्मसाक्षात्कार का मुख्य साधन योगाभ्यास है। योगाभ्यास सिखाने का प्रबन्ध राज्य नहीं कर सकता, न. पाठशाला का अध्यापक ही इसका दायित्व ले सकता है। जो इस विद्या का खीजी होगा वह अपने लिए गुरु ढूंढ़ लेगा। परन्तु इतना किया जा सकता है-और यही समाज और अध्यापक का कर्तव्य है कि व्यक्ति के अधिकारी बनने में सहायता दी जाय, अनुकूल वातावरण उत्पन्न किया जाय।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) इस अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) आत्मसाक्षात्कार का मुख्य साधन किसे बताया गया है?
(iv) समाज और अध्यापक का क्या कर्तव्य है?
(v) योगाभ्यास का खोजी किसे हूँढ़ लेगा?
Answer
(i) पाठ का नाम - शिक्षा का उद्देश्य। लेखक का नाम - डॉ० सम्पूर्णानन्द ।
(ii) अंश की व्याख्या - इन पंक्तियों में लेखक ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य छात्रों को आत्म-साक्षात्कार के योग्य बनाना होता है। यहाँ पर आत्म-साक्षात्कार से तात्पर्य है कि छात्रों को अपने ज्ञानमयस्वरूप का सही ज्ञान हो जाए। उसे अपने स्वरूप की पहचान आवश्यक है और इसके लिए योगाभ्यास मुख्य साधन है। योगाभ्यास व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है। अर्थात् इसके लिए उसे स्वयं परिश्रम करना पड़ता है। इसे सिखाने का प्रबन्ध कोई विद्यालय, शिक्षक, समाज अथवा राज्य सरकार नहीं कर सकती, क्योंकि यह बाजार में बिकने वाला भौतिक साधन नहीं है। योगाभ्यास सीखने के लिए तो व्यक्ति के मन में लगन होनी चाहिए। यदि व्यक्ति के मन में सीखने की लगन है तो योग की बारीकियों को बताने वाले गुरु की कमी कभी भी बाधा नहीं बनेगी। कहने का तात्पर्य यह है कि जब व्यक्ति में लगन होती है तो वह अपने लिए आवश्यक साधनों को स्वयं ढूंढ़ निकालता है।
(iii) आत्मसाक्षात्कार का मुख्य साधन योगाभ्यास को बताया गया है।
(iv) समाज और अध्यापक का कर्तव्य है कि व्यक्ति के अधिकारी बनने में सहायता दी जाए तथा अनुकूल वातावरण भी तैयार किया जाए।
(v) योगाभ्यास का खोजी अपने लिए गुरु ढूंढ़ लेगा।
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Question 310 Marks
पुरुषार्थ दार्शनिक विषय है, पर दर्शन का जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह थोड़े-से विद्यार्थियों का पाठ्य विषय मात्र नहीं है। प्रत्येक समाज को एक दार्शनिक मत स्वीकार करना होगा। उसी के आधार पर उसकी राजनैतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होगा। जो समाज अपने वैयक्तिक और सामूहिक जीवन को केवल प्रतीयमान उपयोगिता के आधार पर चलाना चाहेगा उसको बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। एक विभाग के आदर्श दूसरे विभाग के आदर्श से टकरायेंगे। जो बात एक क्षेत्र में ठीक हुँचेगी वही दूसरे क्षेत्र में अनुचित कहलायेगी और मनुष्य के लिए अपना कर्तव्य स्थिर करना कठिन हो जायेगा।
इसका तमाशा आज दीख पड़ रहा है।
(i) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
(ii) इस अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) किसके आधार पर राजनैतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होगा?
(iv) किस समाज को बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा?
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने क्या प्रेरणा दी है?
Answer
(i) पाठ का नाम - शिक्षा का उद्देश्य। लेखक का नाम - डॉ० सम्पूर्णानन्द ।
(ii) अंश की व्याख्या - लेखक का विचार है कि मानव-जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य पुरुषार्थ की प्राप्ति है। पुरुषार्थ चार माने गये हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें सबसे बड़ा पुरुषार्थ मोक्ष है, अतः मानव जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति करना है। पुरुषार्थ का सम्बन्ध दर्शन से है और दर्शन का जीवन से गहरा सम्बन्ध है। जीवन से सम्बन्ध रखने वाला दर्शन थोड़े-से विद्यार्थियों द्वारा पढ़ने योग्य विषय नहीं है, अपितु वह जीवन की प्रत्येक विचारधारा का नाम है।
(iii) दार्शनिक मत के आधार पर राजनैतिक, सामाजिक और कौटुम्बिक व्यवस्था का व्यूह खड़ा होगा।
(iv) जो समाज अपने वैयक्तिक और सामूहिक जीवन को केवल प्रतीयमान उपयोगिता के आधार पर चलाना चाहेगा उसको बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
(v) प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से लेखक ने मानव-जीवन के पुरुषार्थ को जानने से पहले, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक व्यापक दार्शनिक मत स्वीकार करने की प्रेरणा दी है।
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