अशोक के तेरहवें शिलालेख से पता चलता है कि उसने राज्याभिषेक के पश्चात् 8वें वर्ष में कलिंग पर विजय प्राप्त की। इस युद्ध में डेढ़ लाख लोग बन्दी बनाये गये एवं एक लाख लोग मारे गये। इस भीषण नरसंहार को देखकर अशोक का कठोर हृदय द्रवित हो गया। उसने अब कभी भी शस्त्र ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा की। अब उसने युद्ध विजय के स्थान पर धम्म विजय का निश्चय किया।
अशोक बताता है कि धम्म पालन के लिये आवश्यक है-
(1) प्राणियों की हत्या न करना,
(2) माता-पिता की सेवा करना,
(3) वृद्धों की सेवा करना,
(4) गुरुजनों का सम्मान करना,
(5) मित्रों, परिचितों, ब्राह्मणों, श्रमणों एवं दासों के साथ अच्छा व्यवहार करना,
(6) अल्प व्यय एवं अल्प संचय।
अशोक ने 5 दुर्गुण बताये हैं-
(1) उग्रता, (2) निष्ठुरता, (3) क्रोध, (4) गर्व, (5) ईर्ष्या।
अशोक के धम्म का प्रचार हेतु उपाय - गिरनार से प्राप्त तृतीय शिलालेख की द्वितीय व तृतीय पंक्ति में अशोक ने धम्म के प्रचार हेतु अपनाये उपायों को इस प्रकार लिखा है कि- "मेरे सम्पूर्ण राज्य में युक्त, रज्जुक एवं प्रादेशिक प्रत्येक पाँचवें वर्ष यात्रा पर निकलें और धम्म के निर्देशों का प्रचार करें और अन्य राज्य सम्बन्धी कार्य करें।"अभिषेक के चौदहवें वर्ष अशोक ने धर्म महामात्रों की नियुक्ति की। इनका प्रमुख कार्य विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों के बीच बैर-भाव को समाप्त कर धर्म की एकता पर बल देना था। अशोक ने धम्म प्रचार हेतु भारत के विभिन्न भागों में धम्म की शिक्षाओं को शिलालेखों पर उत्कीर्ण कराया।
अशोक ने समस्त भारत के साथ-साथ विदेशों में भी धर्म प्रचारक भेजे। बौद्ध ग्रन्थ महावंश में इनके नाम इस प्रकार मिलते हैं:
| देश | धर्म प्रचारक |
| 1. कश्मीर एवं गान्धार | मज्झन्तिक |
| 2. हिमालय देश | मज्झिम |
| 3. वनवासी (उत्तरी कन्नड़) | रक्षित |
| 4. यवन देश | महारक्षित |
| 5. अपरान्तक | धर्मरक्षित |
| 6. महाराष्ट्र | महाधर्मरक्षित |
| 7. महिषमण्डल (मैसूर) | महादेव |
| 8. सुवर्ण भूमि | सोन एवं उत्तरा |
| 9. श्रीलंका | महेन्द्र एवं संघमित्रा |
इस प्रकार हम देखते हैं कि बौद्ध धर्म को एशियायी धर्म बनाने में अशोक की महत्वपूर्ण भूमिका थी।