बापू के बिस्तरे को लेखक महान मानते है क्योंकि वह बिस्तर गौरवशाली है , जिसके सिरहाने दीवार से सटी काठ की तख्ती ,जिसकी कठोरता को कम करने के लिए उतना ही बड़ा तकिया | लेखक कहते है की ओ बिस्तर ; इस सादगी में भी तुम कितने महान हो , क्या इसका अनुभव तुम्हे कभी होता है ? और अरे तुम्हे देखकर कितने रत्नजडित स्वर्ण – सिंहासन भी इर्षया से जलते होंगे | क्या कभी उन पर एकएक क्षण को भी उतना बड़ा आदमी बेठा होगा जितने बड़े आदमी को कितने ही दिनों , महीनो वर्षो तक तुम्हे , अपने पर आसीन करने का गौरव प्राप्त हो सका ?