2. वर्तमान में समाज की बदली मानसिकता - वर्तमान में मध्यमवर्गीय समाज अपनी रूढ़िवादी सोच के कारण जहाँ बेटी को पराया धन मानता है वहीं पुत्र को कुल परम्परा को बढ़ाने वाला तथा वृद्धावस्था का सहारा मानता है। इसलिए बेटी को पालना - पोसना, पढ़ाना - लिखाना, उसकी शादी में दहेज देना आदि को बेवजह का भार ही मानता है। इस दृष्टि से कुछ स्वार्थी सोच वाले कन्या - जन्म को ही नहीं चाहते। इसलिए वे चिकित्सिकी साधनों के द्वारा गर्भावस्था में ही लिंग - परीक्षण करवाकर कन्या - जन्म को रोक देते हैं। परिणामस्वरूप जनसंख्या में बालक - बालिकाओं के अनुपात में अत्यधिक अन्तर दिखाई दे रहा है।
3. लिंगानुपात में बढ़ता अन्तर - वर्तमान में स्त्री - पुरुष का लिंगानुपात गड़बड़ा गया है। विभिन्न दशकों में हुई जनगणना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। सन् 2011 की जनगणना के आधार पर बालक और बालिकाओं का अनुपात एक हजार में लगभग 918 तक पहुँच गया है। इस लिंगानुपात के बढ़ते अन्तर को देखकर भविष्य में वैवाहिक जीवन में आने वाली कठिनाइयों के प्रति समाज की ही नहीं सरकार की भी चिन्ता बढ़ गयी है। इस चिन्ता से ही मुक्त होने की दिशा में सरकार ने 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा दिया है। क्योंकि बालिका को शिक्षा देने से उनमें जाग्रति और चेतना का संचार होगा, जिससे वह आत्मसम्मान करने में सक्षम होगी।
4. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ - अभियान एवं उद्देश्य - 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान की घोषणा जून, को लोकसभा के संयुक्त अधिवेशन में हमारे राष्ट्रपति द्वारा की गई। तब सरकार ने निर्णय लिया कि परिवार कल्याण मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मन्त्रालय साथ मिलकर इस कार्य को आगे बढ़ायेंगे। इस अभियान के अन्तर्गत लिंग - परीक्षण पर प्रतिबन्ध लगाकर बालिका भ्रूण - हत्याओं को रोककर बालिकाओं को पूर्ण संरक्षण तथा उनके विकास के लिए शिक्षा से सम्बन्धित सभी गतिविधियों में पूर्ण भागीदारी रहेगी। संविधान के माध्यम से लिंगाधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जायेगा। साथ ही लिंग परीक्षण प्रतिबन्धित होगा।
5. उपसंहार - 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसा अभियान आज हमारे देश के सामने एक बहुत बड़ी सामाजिक समस्या के रूप में आकर खड़ा हो गया है। इस समस्या के निदान के लिए सरकार को ही नहीं हम सबको सामाजिक दृष्टि से जागरूक होना होगा। इसके लिए हमें रूढ़िवादी सोच का परित्याग करना चाहिए। बेटे की तरह बेटी को भी पढ़ा - लिखाकर जीवन जीने का अधिकार देना चाहिए।
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