ममता कालिया की कहानी 'दूसरा देवदास' एक प्रेमकथा है। कहानी का शीर्षक पात्र, घटना या स्थान के नाम पर रखा जाता है। वह आकर्षक, रोचक, संक्षिप्त एवं कौतूहलवर्द्धक भी होना चाहिए। संभव को जब पता चला कि जो लड़की गंगातट पर उसे पुजारी के पास मिली थी और पुजारी ने उन दोनों को भ्रम से पति-पत्नी समझकर फूलो-फलो का आशीष दिया था, उसका नाम पारो है तो उसने परिचय देते हुए अपना नाम उसे बताया संभव, संभव देवदास। पारो और देवदास शरतचन्द्र के उपन्यास देवदास के पात्र हैं। इस प्रतीकात्मक नाम से संभव ने यह बता दिया कि वह पारो का देवदास है और उससे प्रेम करने लगा है। इसलिए इस कहानी का शीर्षक 'दूसरा देवदास' पूरी तरह उपयुक्त है।