जीवों द्वारा उत्पन्न प्रदूषण जैविक प्रदूषण कहलाता है। मृदा, जल, कीचड़, मानव तथा पशुओं के मलमूत्र में अनेक प्रकार के विषैले जीवाणु पाये जाते हैं जिनसे विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं।
(1) क्लास्ट्रीडियम बॉट्यूलिनम - ये मिट्टी, जल, कीचड़ आदि में पाये जाते हैं तथा भोज्य पदार्थ जैसे-माँस, मछली, सीलबन्द पदार्थों को विषाक्त कर देते हैं जिनसे स्नायु तन्त्र पर प्रभाव, सिर दर्द, कब्ज, गर्दन में लकवा आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
(2) क्लास्ट्रीडियम परफ्रिजेन्स - ये मिट्टी, पशुओं के मलमूत्र तथा मनुष्य के मल में पाये जाते हैं। इनसे लगभग सभी प्रकार के भोज्य पदार्थ खराब होने की सम्भावना रहती है जिनके सेवन से उल्टी, शरीर में दर्द एवं पेचिस के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।
(3) स्टेफाइलोकॉकस तथा माइक्रोकॉकस - ये कफ, थूक, घाव आदि में उत्पन्न होते हैं। इनसे कस्टर्ड, क्रीम, दूध से बने पदार्थ, माँस, मछली आदि प्रभावित होते हैं। उल्टी आना, सिर दर्द, बुखार तथा अधिक पसीना आना इसके प्रमुख लक्षण हैं।
(4) साल्मोनेला - ये मनुष्य तथा पशुओं के मल-मूत्र में पैदा होते हैं तथा सभी प्रकार के भोजन को प्रभावित करते हैं। इनके प्रभाव से उल्टी आना, प्यास लगना, घबराहट तथा सिर दर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
(5) बैसीलस सेरियस - इसका मुख्य स्त्रोत मिट्टी है। दूध, अण्डा, कस्टर्ड आदि के सेवन से उल्टी आना, डायरिया, पेट में मरोड़ आदि इसके लक्षण हैं।
(6) कवक संदूषण - कवक भी भोज्य पदार्थों पर उगकर उन्हें हानिकारक बना देते हैं, जैसे-
(a) एस्परजिलस फ्लेवस - प्रोटीन की प्रचुरता वाले भोज्य पदार्थ, जैसे-सोयाबीन, मूँगफली आदि पर वे पनपते हैं तथा ऐसे पदार्थों के सेवन से यकृत सम्बन्धी रोग हो जाते
(b) फ्युजेरियम स्पोरोट्राइकोइड्स - ये जौ, जई, गेहूँ आदि अनाजों पर पैदा होते हैं। इस प्रकार के प्रदूषित पदार्थों के प्रयोग से हड्डियों का गलन रोग हो जाता है।
(c) पेनीसीलियम - इसकी अनेकों प्रजातियाँ यकृत रोग, ट्यूमर कैंसर आदि को फैलाती हैं।