कर्ण महादानी था। उसकी मान्यता थी कि समय आने पर शिक्षा नष्ट हो जाती है, मजबूत जड़ वाले पेड़ गिर पड़ते हैं, जल भी अपने स्थान पर जाकर सूख जाता है, परन्तु हवन किए गए एवं दान दिए गए द्रव्य यथावत् बने रहते हैं। इसीलिए जन्म के साथ उत्पन्न अपने रक्षक कवच और कुण्डल को भी उसने इन्द्र के माँगने पर निःसंकोच भाव से शल्य के मना करने पर भी दे दिया। जबकि वह जानता था कि बिना कवच और कुण्डल के युद्ध में जाने पर मैं मारा जाऊँगा तथा इंद्र मुझको मरवाने के लिए ही ब्राह्मण वेष में आकर हठपूर्वक इन्हें माँग रहा है। जान की बिना परवाह किए ही उसने इंद्र को कवच और कुंडल दे दिए और अपने वचन तथा दान धर्म की रक्षा की। यही है कर्ण की दानवीरता।